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Monday, December 28, 2020

"गिफ्ट"

 'इस बार जन्म दिन पर पूर्वी ने डॉगी ,फिश या पैरेट में से कुछ मांगा है गिफ्ट में ।" सुहानी ने चाय पीते-पीते राजीव से कहा ।

"ला देना..वह सुमित की तरह जिद्दी और झगड़ालू तो है नहीं.. तुम्हारा लाडला तो वैसे भी खेलता कम और झगड़ता अधिक है उसके साथ ।"

    राजीव ने लैपटॉप की स्क्रीन पर नज़र गड़ाए व्यस्त भाव से कहा ।

 बहुत देखभाल के बाद पूर्वी के लिए सुहानी ने एक तोता पसन्द किया और जन्म दिन पर 

 उसका गिफ्ट उसके सामने रख दिया । साथ ही सुमित को सख़्त हिदायत दी कि वह अपनी शरारतों से बाज आए और बहन और उसके तोते से छेड.-छाड़ न करे ।

        तोते का लोक प्रचलित नाम मिट्ठू रखा गया ।  

मिटठू के आने के बाद पूर्वी भाई की उपस्थिति भूल अपनी ही दुनिया में रम गई । मिटठू को मिर्च खिला कर..कभी हैल्लो.. तो कभी राम-राम बोलना सीखा कर वह बहुत खुश थी.., पढ़ाई के बाद सारा दिन पिंजरे में बंद तोते के आस-पास ही मंडराती रहती । घर में शांति और भाई-बहन के युद्ध-विराम से पति-पत्नी खुश थे ।

कुछ दिन बाद सुहानी ने महसूस किया कि मिट्ठू की मीठी बोली में कर्कशता घुल गई है । सारा दिन की उसकी टें...टें से वह परेशान हो उठी । 

"आज इस मिट्ठू की खबर लेती हूँ" मिट्ठू की चुभती आवाज से त्रस्त हो वह आवेग से उठी और आंगन में आ कर जो दृश्य देखा तो आँखें हैरत से फैल गई -- पिंजरे के पास बैठी पूर्वी बड़े आराम से मिट्ठू के पंखों में पेन की नोंक चुभा रही थी और मिटठू बैचेनी से चीख-चिल्ला रहा था ।

उसने एक चाँटा बेटी के गाल पर रसीद किया और छत पर ले जाकर पिंजरे का द्वार खोल दिया । पूर्वी का रोना सुन उसे गोद में उठा कर राजीव ने छत की सीढ़ियाँ उतरती सुहानी को कड़े स्वर में डॉटा- "बच्ची की खुशी नहीं सुहाई..क्या हुआ.. जो मिट्ठू आजकल टें..टें..कर रहा था । किस बात की सजा दे रही हो बच्ची को..इस तरह का रवैया अपने लाडले के साथ रखती तो कब का सुधर गया होता।"

"हाँ..गलती हो गई मुझसे इन दोनों को समझने में..भूल मैंने की है तो सुधारूंगी भी मैं ही ।" सोच में डूबी खाली पिंजरा डस्टबिन के पास रखती सुहानी ने जवाब दिया ।

***





Sunday, December 13, 2020

"व्यवहारिकता"

अक्सर महत्वपूर्ण दस्तावेज या कोई प्रतियोगी परीक्षा का फॉर्म भरते हैं तो एक प्रश्न होता है -- “कोई शारीरिक‎ पहचान”‎ और हम ढूंढना शुरू कर देते हैं‎ माथे पर ,हाथों पर या घुटनों पर लगे चोट के निशान जो प्राय: सभी के मिल ही जाते हैं  । मैं भी ऐसी बातों से अलग नही हूँ बल्कि “बिना देखे चलती है ।” की उपाधि आज भी साथ लेकर ही चलती हूँ । जाहिर सी बात है चोटों के निशान भी ज्यादा ही लिए घूमती हूँ ऐसे में एक घटना अक्सर मेरी आँखों के सामने अतीत से निकल वर्तमान‎ में आ खड़ी होती है जो कभी हँसने को तो कभी इन्सान की सोच पर सोचने को मजबूर कर देती है।

                                           एक बार  किसी जरुरी काम से मैं घर से निकली.. सोचा बेटे के स्कूल से आने से पहले  काम पूरा करके घर आ जाऊँगी। आसमान में बादल थे मगर इतने घने भी नही कि सोचने पर मजबूर करें कि घर से निकलना चाहिए कि नही। मगर वह महिना सावन का ठहरा घर वापसी के दौरान रास्ते में ही झमाझम बारिश

 शुरू गई । सदा अच्छी लगने वाली बारिश उस दिन आनंददायक की जगह कष्टदायक लग रही थी । मुझे घर पहुँचने की जल्दी थी कि बेटा स्कूल से निकल गया तो पक्का भीग रहा होगा और इसी सोच में कदम रूके नही बल्कि तेजी में भागने

 की स्थिति में पहुँच गए  थोड़ी सी दूरी पर घर है पहुँच ही जाऊँगी इसी सोच के साथ । घर से थोड़ी  दूरी पर एक चौराहा था जहाँ ढलान भी था और बीच से क्रॉस करती  नाली भी। वहाँ बारिश

 के पानी का बहाव ज्यादा ही था। मैंने देखा वहाँ एक कोने में हाथों में थैले लिए तीन औरतें भीगती खड़ी हैं। मैं चलते हुए सोच  रही थी --’भीग तो गई अब क्यों खड़ी हैं‎ बेवकूफ कहीं की ।’ मेरी सोच को तेज झटका लगा - धड़ाम.. एक आवाज़ ..

और इसी आवाज के साथ मैं चारों खाने चित्त.. नाली में मेरा पैर अटक गया था ।

 मैं संभलकर खड़ी होने की कोशिश कर ही रही थी  

कि कानों में आवाज  गूंजी

--”ऐ …,जल्दी से आ जाओ! नाली यहाँ पर है।” 

और वे लगभग मेरे आसपास की जगह को फलांगती हुई आगे निकल गईं और अपने छीले हुए घुटने और हथेली के साथ लड़खड़ाती हुई‎  मैं अपने घर की ओर। बारिशों के दौर में सड़कों पर बहते पानी के वेग को देख कर अक्सर मैं उस घटना को  याद करती हूँ तो तय नही कर पाती उन औरतों के व्यवहार को मासूमियत का नाम दूँ या

 समझदारी का ।

---

Tuesday, December 1, 2020

"कुरजां" ।। हाइबन।।

 


【चित्र गूगल से साभार】



शीतकाल में साइबेरिया से भारत के राजस्थान प्रान्त

 में प्रवासी पक्षी साइबेरियन सारस (डेमोइसेल क्रेन)

प्रवास के लिए आते हैं । इनको राजस्थानी भाषा में कुरजां

कहते हैं।  मरूभूमि की महिलाएँ  कुरजां के साथ सहेली

जैसा रिश्ता मानती हैं । लोक गीतों में विरहिणी

और कुरजां के बीच आपसी संवाद

के रूप में भावनाओं का निरूपण होता है जिसमें कुरजां

संदेश वाहक के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन करती है । "कुरजां गीत" अपने वियोग श्रृंगार भावों के साथ

राजस्थान के लोक जीवन में रचा बसा हैं ।

थार रेगिस्तान के जलवायु की खास विशेषता है कि यहाँ

सदियों से देसी परिन्दों के अलावा अनेक प्रजातियों के

प्रवासी पक्षियों का आवागमन बना ही रहता है जो यहाँ

की जैव विविधता को बनाए रखने में अहम् भूमिका

निभाते हैं। लेकिन प्रवासी पक्षियों की प्रजाति में साइबेरियन

सारस पर्यटकों के लिए आकर्षण केन्द्र होने के साथ साथ

यहाँ के जन मानस का भी अभिन्न अंग है ।


झील किनारे ~

धूप में पांखें सेंके

द्वय कुरजां ।



***

Monday, November 16, 2020

"यादें"【हाइबन】

【 चित्र गूगल से साभार】


कई बार कुछ लम्हें स्थायी रूप से बैठ जाते हैं

 मन के किसी कोने में । सोचती हूँ मन क्या है - हृदय...

जिसकी धड़कन ही जीवन है । बचपन में पढ़ा था कि हर

मनुष्य का हृदय उसकी बंद मुट्ठी जितना होता है । इस छोटे से

अंग में सागर सी गहराई और आसमान सी असीमता है यह

बात बड़े होने के बाद समझ आई ।   

असम का एक मझोला शहर बरपेटा रोड ..वहीं से मुँह

अंधेरे गाड़ी में बैठते सुना कि सुबह तक पहुंच जाएंगे गुवाहाटी ।  कार की खिड़की से नीम अंधेरे में भागते पेड़ों को देखते

देखते कब नींद आई पता ही नहीं चला । आँख खुली तो

लगा पुल से गुजर रहे हैं --

 "उगता सूरज... ब्रह्मपुत्र का सिंदूरी जल और नदी में

बहती छोटी-मझोली जाल लादे नावें और साथ

ही स्टीमर्स की घर्र-घर्र । "

इस अनूठे दृश्य को देख कर मैं मंत्रमुग्ध सी अपलक

अपने लिए निन्तात अजनबी से दृश्य को निहारने में इतनी

मगन हुई कि वह दृश्य  कस कर बाँध लाई अपनी

मन मंजूषा में । आज भी यदा-कदा बंद दृग  पटलों में

वह दृश्य जीवन्त हो उठता है और महसूस होता है कि

मैं वहीं तो हूँ ब्रह्मपुत्र के पुल पर.. और जैसे ही आँखें

खोलूंगी अगले ही पल वहीं दृश्य साकार हो उठेगा --

 

भोर लालिमा~

ब्रह्मपुत्र में जाल

फेंकते मांझी।

***

Thursday, November 5, 2020

"इस रात की सुबह.."

एक अजनबी सा शहर और उसकी अपरिचित सी इमारत जो चार वर्षो में अजनबी से परिचित बन गई। उसमें मार्निंग वॉक के समय "पाथ वे" में खड़े पेड़ों की प्रजातियों के बारे में सोचना बड़ा भला लगता था मुझे । नये शहर में इन्सानों से परिचय सीमित लेकिन पेड़-पौधों से मेरी दोस्ती प्रगाढ़ होती चली गई । किस वनस्पति में कौन से गुण हैं हम इन्सानों की तरह इनका भी समाज है और रहने वालों के व्यवहार में भी सज्जनता, आवेश, कड़वाहट सभी गुण समाये हैं इसी सोच के साथ 

घूमते हुए पैंतालीस मिनिट कब पूरे हुए पता ही

 नहीं चलता ।

  चलते - चलते वनस्पति जगत के बारे में सोचते हुए मैं खुद को भूल जाती ।  किस आम की डाल कब आम्र मंजरियों से लदी है कौन से पौधे में कब फूल आते हैं और कब नहीं भलीभाँति जानने लगी थी

 मैं । आमों की  झुकी शाखाओं पर  मेरे अतिरिक्त बच्चों की पैनी नजर भी रहती कि वे सब से नजर बचा कर कब कच्चे आमों को तोड़ने का श्री गणेश करें ।

बच्चों की टोलियाँ चाहे कहीं की भी हो आदतों से लगभग समान गुण- धर्म वाली होती है "Don't pluck the plants" के टैग लगे होने के बावजूद बच्चे कब आम तोड़ कर भाग जाते  सिक्योरिटी गार्डस् को भी पता नहीं चलता । बाद में बिल्डिंग के रख-रखाव का ध्यान रखने वाले अपने सीनियर्स की बेचारों को नाराजगी झेलनी पड़ती इस बार की सीजन में उनको भी आराम रहा होगा । वैसे बच्चों की पहुंच से दूर कहीं कहीं नारियल जरूर पूरी शान से अकड़े खड़े दिखते मानो बच्चों को चिढा़ रहे हो कि दम है तो हमें तोड़ के दिखाओ । लेकिन नारियल अधिकतर सिक्योरिटी गार्डस् ही तोड़ते दिखते ।

सोचती हूँ जहाँ बच्चोँ की प्रंशसा का कोना बचे तो वो भी होनी चाहिए.. फूल पत्तियों को तोड़ना उनकी आदतों में कहीं भी शामिल नहीं होता। यहाँ जगह-जगह लगी सूचना का ध्यान वे खेलते समय भी रखते हैं ।

 पेड़ -पौधों को देखते और घूमते हुए मेरी कब हरसिंगार, गुलमोहर और अमलतास से  दोस्ती हुई यह तो ठीक से याद नहीं मगर कोरोना काल में इनको ना देख पाने की कमी को मैं एक शिद्दत से महसूस करती हूँ । 

कई बार इस विषय पर चर्चा भी होती है कि बाहर बिना रूकावट के घूमने की कमी को कौन सब से अधिक महसूस करता है तो वहाँ मैं सब से पहले मुखर होती हूँ कमी महसूस होने की खातिर..यूं तो आदत हो गई है सात महिनों से घर पर ही रहने की मगर बहुत सारे पौधे और फूल जिनके नाम भी मैं नहीं जानती सोचती हूँ कि सूर्य की लालिमा में डूबे याद तो करते होंगे मुझे या फिर भूल गए होंगे । राह में बिछे हरसिंगार शायद राह तकते होंगे मेरी.. किसी फूल पर भूल कर भी भूल से पैर ना पड़ जाए मेरा इसका ध्यान रखती थी मैं । 

रोज कुछ फूल घर आते समय हथेलियों में करीने से भर लाना आदत में शुमार था कहीं न कहीं । कॉर्नर की टेबल का खाली कोना बरबस उनकी बहुत याद दिलाता है । 

अभी तक कोई ठोस कारगर इलाज कोरोना महामारी के लिए हुआ नहीं । समाचारों में विश्व के कुछ देशों में कोरोना की दूसरी लहर से पुनः लॉकडाउन जैसे फैसलों की सुनती हूँ । सामान्य गतिविधियों में लोगों की भीड़ और रैलियों के बारे में देखते - सुनते  मानव समुदाय की चिन्ता मन में लिए एक लम्बी गहरी सांस सकारात्मकता

 से भरती हूँ दिलोदिमाग में कि इस रात की सुबह कभी तो होगी ।

****

【चित्र-गूगल से साभार】

Wednesday, October 21, 2020

"माटी की गंध"

                         

जब सूरज की तपिश तेज होती है और सूखी मिट्टी पर 

बारिश की बूँदें पहली बार टकराती है तो मिट्टी‎ के वजूद

से उठती गंध मुझे बड़ी भली लगती है। आजकल जमाना फ्रिज में रखी वाटर बॉटल्स वाला है मगर मेरे बचपन में मिट्टी‎ की सुराहियों और मटकों वाला था। मुझे याद है मैं सदा नया मटका धोने की जिद्द करती और इसी बहाने उस भीनी महक को महसूस करती  । माँ की आवाज से ही मेरी तन्द्रा टूटती । बारिश शुरु होते ही उस खुशबू का आकर्षण‎ स्कूल के कड़े अनुशासन में भी

मुझे नटखट बना देता । अध्यापिका की अनुपस्थिति में  मैं खिड़की‎ या कक्षा‎ कक्ष‎ के दरवाजे‎ तक आ कर अपनी हथेलियों को फैला कर एक लंबी गहरी सांस में उस पल को महसूस करने की कोशिश करती तो घर पर माँ के लगाए तुलसी के पौधे के समीप जाकर खड़ी हो जाती जो आंगन के बीच में था । 

 एक दिन यूं ही कुछ‎ पढ़ते‎ पढ़ते पंजाब‎ की प्रसिद्ध‎ लोक कथा‎ ‘सोनी-महिवाल’ का प्रसंग पढ़ने को मिल गया इस कहानी से अनजान तो नही थी मगर उत्सुकतावश पढ़ने बैठ गई । कहानी का सार कुछ इस तरह था --

                          “18 वीं शताब्दी‎ में चिनाब नदी के किनारे एक कुम्भकार के घर सुन्दर‎ सी लड़की का 

जन्म हुआ जिसका नाम “सोहनी” था । पिता के बनाए‎ मिट्टी‎ के बर्तनों पर वह सुन्दर‎  सुन्दर‎ आकृतियाँ उकेरती । पिता-पुत्री के बनाए‎ मिट्टी‎ की बर्तन दूर  दूर‎ तक लोकप्रिय‎ थे ।

 उस समय चिनाब नदी से अरब देशों‎  और उत्तर भारत के मध्य व्यापार हुआ‎ करता था। बुखारा (उजबेकिस्तान) के अमीर व्यापारी का बेटा  व्यापार के सिलसिले में चिनाब के रास्ते‎ उस गाँव से होकर आया और सोहनी को देख मन्त्रमुग्ध हो उसी गाँव में टिक गया । आजीविका यापन के लिए उसी गाँव‎ की भैंसों को चराने का काम करने से वह महिवाल के नाम से जाना जाने लगा । 

सामाजिक‎ वर्जनाओं के चलते सोहनी मिट्टी‎ के घड़े 

की सहायता से चिनाब पार कर महिवाल से छिप

 कर मिलने जाती । राज उजागर होने पर उसी की

 रिश्तेदार ने मिट्टी‎ के पक्के घड़े को कच्चे घड़े मे

 बदल दिया । चिनाब की धारा के आगे कच्ची मिट्टी‎ 

के घड़े की क्या बिसात ?  घड़ा गल गया और  पानी में डूबती सोहनी को बचाते हुए‎ महिवाल भी जलमग्न हो गया ।"

       कभी  कभी‎ लगता है माटी की देह में  कहीं सोहनी 

 तो कहीं  किसी और अनाम तरुणी का प्यार‎ बसा

 है  । ना जाने कितनी ही अनदेखी और अनजान कहानियों‎ को अपने आप में समेटे है यह।  तभी‎ तो मिट्टी‎ पानी की पहली बूँद के सम्पर्क‎ में आते ही सौंधी सी गमक से महका देती है सारे संसार‎ को ।

Saturday, October 10, 2020

"एक पाती "

कई बार लगता है कि हम एक - दूसरे के मन मस्तिष्क को

इतना पहचानते हैं कि कौन सी सोच का प्रभाव किस बिन्दु

पर दिखेगा अक्षरशः महसूस कर लेते हैं तो कभी कभी

लगता है एक अभेद्य  दीवार के पीछे बंद हैं । साथ में रह कर

 भी कोसों दूर...एक-दूसरे के लिए एकदम अनजान ।      

 मेरे मन ने स्नेह तो बहुत किया है तुमसे बस.., परिभाषित

करना नहीं आया । समय पर प्रतिक्रिया के मामले में मैं सदा

से ही कंजूस रही हूँ ।

    जीवन के व्यस्त पलों में कितनी ही बार

 कभी आँखों की चमक ने तो कभी अश्रु बिन्दुओं

 ने नेह के नये उपमान गढ़े मगर पलट कर देखने के लिए

न तुम्हारे पास समय था और न ही शिकायत करने के

लिए मेरे पास ।

  अनमोल होते हैं वे पल जिनमें  तुम्हारे भावों की वीथियों में

अपने आपको तुम्हारे करीब महसूस किया ।  रोबोट सी

यान्त्रिक बनी हमारी जि़दगी में भावनाओं का मोल कम है

या फिर उनके लिए वक्त की कमी लेकिन बहुत बार

यह कमी खलती भी है ।

यह ख़त तुम्हें बस यही अहसास दिलाने के लिए लिखा है कि

     "मेरे मन-आंगन से नेह की निर्झरिणी के लुप्त होने से पूर्व मेरे मन की जड़ता भंग करने मेरे पास जरूर चले आना ।"

लैपटॉप की स्क्रीन पर माँ की मेल पढ़ते पढ़ते अनुराग का मन

गीला हो गया और उसे याद आया कि पिछले कितने ही

दिनों से अपने काम में उलझे रहने के कारण उसने माँ से

ढंग से बात भी नहीं की है हमेशा माँ के पास वक्त की कमी का

उलाहना देने वाला अनुराग सब कुछ

 भूल घर के किसी कोने में काम में उलझी माँ को

ढूंढ़ने भागा ।

 

***                  

Friday, October 2, 2020

"वीनस"

 गर्मियों में खुली छत पर रात में सोने से पहले खुले स्वच्छ  आसमान में झिलमिल करते तारों की चमक को निहारना, आकाश गंगा की आकृति की कल्पना करना और ध्रुव तारे को देखना आदत सी रही है मेरी । इस आदत को पंख मिले "सौर परिवार"  का पाठ पढ़ने के बाद .. जहाँ ग्रहों और ब्रह्मांड के साथ आकाश गंगाओं का परिचय था।

हर चमकते तारे को मन मुताबिक ग्रह मान लेना और आकाश गंगा के साथ  ब्लैक होल की काल्पनिक तस्वीर उस जगह बना लेना जहाँ तारे दिखाई ना दे प्रिय शगल था मेरा । कई बार ना चाहते हुए भी घर के सदस्यों की टोली मेरी चर्चा में शामिल हो जाती । तारों के स्वप्निल संसार में खोये- खोये कब नींद आ जाती पता ही नहीं चलता । कभी  मंदिरों की आरती के साथ आँख खुलती तो दिन के आरम्भ से पूर्व विदा लेते तारों में भोर का तारा टिमटिम की चमक के साथ मानों विदाई का संकेत देता कि - उठ जाओ..सांझ को फिर आऊंगा दिया-बाती की बेला के साथ ।

बचपन में खेल-कूद और शरारतों के समय सौर परिवार के एक सदस्य से अनजाने में दोस्ती हो गई और इसी के साथ दिनचर्या बन गई सांध्य तारे और भोर के तारे को देखने की । बाद में यह आदत..विशेष कर सुबह जल्दी उठने की परीक्षाओं में बड़ी मददगार साबित हुई ।

यह ग्रह सूर्य के उल्टे चक्कर लगाता है । अत्यधिक चमकीला होने के कारण रोम वासियों ने इसका नाम  वहाँ की सुंदरता

और प्रेम की देवी के नाम पर वीनस 【Venus】 रखा ।

सुबह उठते ही आसमान को निहारते भोर का तारा दिख

जाए तो दिन बन जाता था मेरा ।

 व्यस्त दिनचर्या के बाद भी आसमान में ऊषाकाल और सांध्य

बेला में एक खोजी दृष्टि डालना मेरे स्वभाव का हिस्सा रही हैं। 

समय के साथ-साथ छोटे शहर बड़े शहरों में तब्दील हो रहे हैं जहाँ आसमान में शाम को तारों को देखने के लिए खुली छतों और आंगन की जरूरत 

महसूस हो रही है । खुली छतें और आंगन बढ़ती जरूरतों के साथ सिमटने लगे हैं । बड़े शहरों की तो बात ही क्या.. यहाँ गोधूलि और रात्रिबेला में इमारतों से तारे जमीं पर देखने का भान होता है । आज भी कभी बालकनी तो कभी कमरे खिड़की से मन और आँखें भोर के तारे और सांध्य तारे को  को ढूंढती हैं। समय के बदलते रूख के साथ बाल सखा भी व्यस्त हो गया शायद या फिर मेरे जैसे ही किसी और बाल सखा की दुनियां में रम गया । जो मेरी ही तरह भोर और सांझ में उसकी प्रतीक्षा करता होगा ।


✴️

Saturday, September 19, 2020

"अन्तर"

 स्कूल से आकर अपना बैग पटकते हुए दिशा ने शिकायती लहज़े में माँ से कहा - “तुम मुझ में और भाई में भेद-भाव रखती हो , उसको शाम तक भी घर से बाहर आने-जाने की छूट और मुझे नही?” माँ ने निर्लिप्त भाव से उसकी ओर देखते हुए पूछा-”आज यह सब कहाँ से भर लाई कूड़ा-कबाड़ दिमाग में।’ 

              “ आज स्कूल में “समाज में लिंगभेद’ पर स्पीच थी , उसमें यह बात भी थी कि लड़कियों को लड़कों से कम समझा जाता है । लड़कों को ज्यादा सुविधाएँ मिलती हैं। और यह बात सच भी है मुझे बाहर कहाँ खेलने जाने देती हो तुम ?"

                                                      माँ ने बड़ी सहजता से कहा-”भाई के हर महिने बाल कटाती हूँ , तेरे बाल लम्बे हैं ,भरी दोपहरी या शाम को गलियाँ सुनसान होती हैं ऐसे समय-कुसमय में बुरी आत्माएँ घूमती हैं इसलिए लड़कियों को बाहर जाने से रोका जाता है । बाकी तू जानती है मैंने खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने में कभी भेद नही किया तुम भाई-बहनों में। "बाल-सुलभ जिद्द वही की वही रुक गई क्योंकि दिशा को भूतों-प्रेतों के नाम से ही डर लगता था यूं भी लाईट जाते ही वह उल्टा-सीधा जैसा भी याद था हनुमान-चालीसा बुदबुदाना शुरु कर देती थी।

                      दिशा सोच रही थी कि कुछ हद तक             माँ की बात सही भी थी माँ को उसने अपने परीक्षा-परिणाम पर सदा खुश होते ही देखा। छोटे भाई और बहन को बड़े भइया की बजाय अच्छे से वह रखेगी इस बात का विश्वास था उन्हें। कई बार वाद-विवाद तो कई बार निबन्ध प्रतियोगिताओं में दहेज-प्रथा और लड़के-लड़की के मध्य असमानता जैसे विषय उठ जाया करते थे । नारी जाति के प्रति उपेक्षित व्यवहार की चर्चा कक्षा-कक्षों में भी होती थी और वह स्कूल से आते ही राम चरित मानस या गीता-पाठ करती माँ के पास अपना रोष व्यक्त करने पहुँच जाती मानो उसकी जिद्द है कि वह माँ को साबित कर दिखाएगी कि अन्तर है समाज में नारी और पुरुष वर्ग में ।

                      माँ शान्ति से बात सुनती और समझाती कि अवसर की समानता लड़कियों पर भी निर्भर है।वैदिक काल में मैत्रेयी,अपाला, गार्गी और विश्ववारा जैसी विदुषियाँ ऋषियों के समकक्ष थीं। माँ दुर्गा,लक्ष्मी और सरस्वती भी स्त्रियाँ ही हैं ना….,और तू ये गाती फिरती है -”खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।” यह भी तो लड़की ही थी ना ।"

कई बार वह उनके सामने हथियार डाल देती तो कई बार अपनी बुध्दि अनुसार नए तर्क खोजने लगती। मगर मकसद एक ही रहता कि माँ से अपनी बात मनवा कर छोड़ेगी ।

               आज दिशा बड़ी हो गई है , माँ भी नही रही। घर - बाहर लड़कियों को देखती है , कुछ बड़ी हैं  तो कुछ बड़ी हो रही हैं । नौकरियाँ कर रही हैं स्वावलंबी भी हैं मगर सवाल आज भी वही हैं। जिद्द भी वही है कि समाज में लिंगभेद असमानता है । लड़कियों के लिए विकास के अवसर कम है वगैरा-वगैरा ।

     ऐसे समय में दिशा को माँ के समझाने का ढंग याद आ जाता है। असमय निर्जन स्थानों पर होने वाली महिलाओं के साथ दुर्घटनाएँ..  ,अक्सर माँ के द्वारा समय- कुसमय बाहर जाने से रोकने के तर्कों की याद  दिलाती है। 

               आज की भागती-दौड़ती दुनियाँ में शायद वक्त ही नही है किसी के पास बालमन की जिज्ञासाओं को शान्त करने का।

                        “Don’t argue . चुप्प कर , ये कौन सा project है ?अपनी tuition-teacher.से पूछ लेना ।" जैसे जुमले व्यस्त भाव से सुनने को मिल जाते हैं। सवाल आज भी वही हैं बस जवाब देने के ढंग में अन्तर आ गया है शायद ।


                          ×××××

Sunday, September 6, 2020

"5 सितम्बर"

 कल-कल बहते झरने सी हँसी थी उसकी । भूमिका अक्सर स्कूल के गेट में घुसती तो वो हँस कर गुड मार्निंग कह अपनी हथेली भूमिका की तरफ फैला देती । स्कूल में किसने बनाया होगा यह नियम पता नहीं लेकिन ग्यारहवीं कक्षा की लड़कियां नियम से स्कूल आने वाली शिक्षिकाओं की स्कूटी या साइकिल गेट से लेकर साइकिल स्टैंड पर खड़ी कर के आती ..लड़कियों की ड्रेस साफ-सुथरी है ना..लेट आने वाली लड़कियों को लाइन में खड़ा करना सब उन्हीं के जिम्मे होता ।अगले वर्ष ड्यूटी अगली ग्यारहवीं की होती ।

      भूमिका के भुलक्कड़ स्वभाव में था दिनांक भूल जाना..वह चॉक उठा कर बोर्ड की तरफ मुड़ते हुए पूछती - डेट ? उसकी क्लास में से शरारती सुर उठता ..हमारे रिवीजन.. होमवर्क की डेट कभी नहीं भूलते आप ? भूमिका मुस्कुरा भर देती । एक दिन वह भूमिका की क्लासमेट नेहा के साथ सकुचाई सी उसके घर के गेट पर थी । नेहा से बातचीत में पता चला वो उसकी भांजी

 है । राजनीति  विज्ञान में मदद चाहिए उसे यदि वह पढ़ा सके … अपने सिद्धांतों के कारण भूमिका ने उसे ट्यूशन की हामी तो नही भरी लेकिन वादा किया कि वो जब भी परेशानी हो स्कूल के अतिरिक्त घर आकर पढ़ सकती

 है । अपने मिलनसार स्वभाव के कारण धीरे -धीरे वह भूमिका के परिवार के सदस्य जैसी बन गई ।  सबके जन्मदिन पर हंगामा मचाने वाली लड़की  का जन्मदिन अप्रैल में आता है उसने ठोक-पीट कर भूमिका को रटा दिया था । जन्मदिन वाले दिन उसने आँखों में अनोखी चमक के साथ भूमिका मैम से स्कूटी की चाबी ली..स्टैंड पर खड़ी की । क्लास में भी चॉक-डस्टर ,बुक निकाल कर मेज़ पर रखी ।भुलक्कड़ मैम को 'डेट" भी बताई ।

                चार-पाँच दिन के अन्तराल पर वह घर आई तो  उदास सी थी । उदासी का कारण पूछने पर जवाब

भूमिका की  मम्मी ने दिया - 'तूने उसको बर्थडे तक विश नहीं किया और अब पूछ रही है क्या हुआ ?' भूमिका ने

सिर पकड़ लिया अपना..पता नहीं अंकों के साथ उसका

क्या आकड़ा था ..हर बात याद रखने वाली भूमिका कभी भी डेट , फोन नम्बर याद नहीं रख पाती थी । भूमिका को सिर पकड़े देख उसने मासूमियत से हँसते हुए कहा - 'कोई बात नहीं आंटी जी हम इनको डेट याद रखना भी सीखा देंगे ।'

            कॉलेज में जाने के बाद भी उसने घर आना नहीं छोड़ा यदि कुछ दिन नहीं आती तो वह समझ जाती अपने घर गई होगी पेरेंट्स के पास । एक बार की यूं ही गई वह नहीं लौटी ...नेहा से पता चला रोड एक्सीडेंट में उसने 5सितम्बर को आखिरी सांस ली ।

                      हर 5 सितम्बर को भूमिका के कानों में एक आवाज़ गूंजती है - 'कोई बात नहीं आंटी जी हम इनको डेट याद रखना भी सीखा देंगे ।' 


                                     ***

Wednesday, September 2, 2020

क्षमा बड़न को चाहिए...

सुबह और शाम खुली हवा में घूमना बचपन से ही बहुत प्रिय रहा है मुझे । इसका कारण शायद पहले खुले आंगन‎ और खुली‎ छत वाले घर में रहना रहा होगा । शहर में आ कर अपना यह शौक  मैं‎ अपने आवासीय कैंपस के 'पाथ वे' में घूम‎ कर पूरा कर लेती हूँ । आज कल वैश्विक महामारी के चलते घूमना बंद है मगर कमरे की खिड़की से दिखते 'पाथ वे' को देखते समय एक दिन की घटना का स्मरण हो आता है । कैंपस में बने बॉस्केटबॉल ,फुटबॉल या टेबल टेनिस कोर्ट में शाम के समय अक्सर‎ बच्चों की टोलियां मिल जाती थी क्योंकि शाम के बाद तो वहाँ उनके अभिभावकों का आधिपत्य होता था अतः शाम का समय उनके शोर-शराबे से गुलज़ार रहता । उस दिन बच्चों‎ के ग्रुप के बीच एक औरत खड़ी मोबाइल पर कुछ करती दिखाई‎ दी, दूसरे राउंड में भी उसे वहीं‎ खड़े देखकर कुछ अजीब‎ सा लगा कि क्यों बच्चों‎ का रास्ता‎ रोके खड़ी है दूर‎ खड़ी होकर भी बात कर ही सकती है मगर कैंपस में रहने वालों के लिए सार्वजनिक‎ जगह जो ठहरी और उस पर किशोरवय  के बच्चे खेल रहे हो तो किसी का भी उस जगह का उपयोग करने का समान हक है यहाँ‎ वर्जना अस्वीकार्य सी है । अगले राउंड तक माहौल अन्त्याक्षरी जैसा हो गया बच्चों‎ का झुण्ड एक तरफ और महिला दूसरी तरफ मगर जो कानों ने सुना वह अप्रत्याशित था , बच्चे‎ ---  “But aunty , we are  seniors .और महिला बराबर टक्कर दे रही ही थी----  O…, excellent . listen to me you are also kids. गर्मा गर्म बहस सुन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची  कि महिला का बेटा जो उन बच्चों‎ से बेहद छोटा था बास्केट बॉल खेलना चाह रहा था  जिसके चलते  बड़े बच्चों‎ को परेशानी हो रही थी‎ और समस्या यह थी कि दोनों पक्षों‎ में से  कोई भी पीछे हटने को कोई तैयार नही था । बच्चों का महिला से इस तरह बहस करना सही भी नहीं लग रहा था ।
 घर की तरफ लौटती मैं सोच रही थी कि अधिकार भाव के लिए सजगता कहाँ अधिक‎ थी । Morality के मानदण्ड पर तो दोनों पक्ष ही गलत थे ऐसे में चलते चलते रहीम जी का दोहा ----छमा बड़न को चाहिए ,छोटन को उत्पात …याद आ गया और उसी के साथ बच्चों‎ का पलड़ा भारी हो गया ।

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Sunday, August 30, 2020

"बरफी"【समापन किश्त】

लगभग महिने भर बाद भुआ ने एक दिन अचानक आकर कहा -’पाँच-सात दिन के लिए गाँव जाना है  ,कुछ पैसे चाहिए छुट्टी के साथ ; अगले महिने पगार से कटा लेंगी।’
इस घटना के दस दिन बाद उनके लौटने पर जो बातें मैंने जानी उन्हें सुनकर मेरा मन उनके प्रति आदर से भर उठा वहीं उनकी आँखों की गहराई और सूनेपन का राज भी समझ में आ गया। बरफी भुआ एक भले घर से ताल्लुक रखती थी उनके पिता और पति दोनों की अपने-अपने गाँवों में अच्छी जमीनें थी। शादी के बाद दुर्भाग्यवश उन्हें कोई सन्तान नही हुई और देवरानी-जेठानी से बच्चा गोद मांगने पर ताना मिला -  “काठ के बच्चे बनवा कर खिला लो।” उस ताने को सुनने के बाद बरफी भुआ ने कुल्हाड़ी पर पैर नही रखा बल्कि कुल्हाड़ी उठाकर पूरी मजबूती के साथ अपने पैरों पर दे मारी। पति के लिए दुल्हन लाई और दोनों से अपने लिए एक बच्चा मांगा मगर नसीब में सुख होता तो अपना ही न हो जाता। बेटे की जगह रोजाना की कलह और अपमान झोली भर-भर के मिलने लगा। पीहर में माता-पिता का निधन हो चुका था ,बहन-भाइयों की अपनी-अपनी गृहस्थी थी ऐसे में कौन उनकी पीड़ा सुनता। पति के देहान्त के बाद आधी रात पति के बेटों और पत्नी द्वारा अपमानित होकर भुआ ने घर छोड़ दिया और एक अनजान कस्बे में आकर मेहनत मजदूरी करने को मजबूर हुई। उस अनजान से गाँव के अपरिचित से मोहल्ले के सभी घरों के बड़े और बच्चों के बीच अपने आत्मीय स्वभाव से कारण वह बरफी भुआ कब बन गई
उन्हें भी पता नही चला।
काल का पहिया यूं ही धीरे-धीरे सरक रहा था कि एक दिन उनके पति के बड़े पुत्र की विधवा गोद में बच्चा लिए उनके सामने आ खड़ी हुई अभागिन का नाम देकर घरवालों ने उसे ठुकरा दिया था । उसकी व्यथा से द्रवित भुआ को अपने प्रति हुआ अन्याय भी याद हो आया। सन्तान को तरसती दुखियारी माँ ने उस बालक को अपना पोता मानते हुए उसके हक के लिए  मुकदमा दायर कर दिया अपने पति के बेटों और पत्नी पर। पूरी बात सुनने के बाद मैंंने भारी मन से कहा - भुआ आपका समय तो आपने यूं ही निकाल दिया अब ..., मेरी बात काटते हुए उन्होने कहा - ‘उस महारानी को संतान के  लिए लाई थी ,खुद को तीन हुए तो दूसरों की बेक़दरी करेगी। मैं समझ लूंगी जो नही रहा वो मेरा था। मैं समझ गई भुआ का पुराना दबा रोष, संतान मोह और स्वाभिमान एक साथ जाग उठे हैं। और अब उन्हें रोकने वाला कोई हो ही नहीं सकता ।  महिने  दर महिने बीतते रहे वो जब भी छुट्टी मांगती मैं समझ जाती कि केस की सुनवाई की तारीख पर जा रही होंगी । धीरे-धीरे मोहल्ले वालों ने आलोचना शुरु कर दी - ‘बरफी का दिमाग खराब हो  गया अब इस उम्र में क्या करेगी जमीन-जायदाद का।' वो जब भी ऐसी बातें सुनती बैचेन हो जाती, काम करते समय स्वभाव में उतावलापन देखते ही मैं समझ जाती कि आज कुछ हुआ है।
      हमेशा की तरह इस बार भुआ गाँव का नाम ले कर गई और वापस आई तो चेहरे की झुर्रियाँ और माथे की सलवटें अधिक ही गहरा गईं थीं और आँखों का सूनापन भी बढ़ गया था । डरते-डरते पूछा तो जवाब कुछ यूं  मिला - 'वकील कहता है- घर की लड़ाई है मिल-बैठ कर सुलझा लो और इन लोगों को माफ कर दो ।' वो महारानी सामने खड़ी थी…, मैंंने भी कह दिया सब के बीच - ' तीस बरस अपने सिर पर घास के गट्ठर और गाय-भैंसों का गोबर ढोया है इस महारानी से तीस बरस नही तीन महिने ही सही यह काम करवा दो मैं माफ कर दूंगी।' बाहर आकर काले कोट वाला बोला -' तेरा दिमाग खराब है बरफी!' सुना दिया उसको भी - 'वही तो खराब है नही तो मैं भी तुम्हारी तरह काला कोट पहनती या इसकी तरह महारानी बन के रहती।'
       कुछ महिनों बाद फिर उन्होने गाँव जाने की बात कही। मैं भी उनका चेहरा देखते ही समझ गई कि केस की तारीख पर जा रही है। पूछने पर बीड़ी पीते हुए हाँ में सिर हिलाया। अब की बार गई भुआ वापस नही लौटी, कुछ महिनों बाद मेरा तबादला कहीं और हो गया। दो-तीन बार काम वश उधर जाना हुआ तो वहाँ भी पहुंची जहाँ वे रहती थीं । उजाड़ खण्डहर घर भुआ के चेहरे की झुर्रियों और सूनी आँखों जैसा ही दिख रहा था उस पर जंग खाया ताला उनके न लौटने की गवाही दे रहा था । आस-पास के लोगों से पूछने पर जवाब मिला - पता नही गाँव गई थी वापस नही लौटी, उम्र भी हो ही रही थी……, कहीं मर-खप गई होगी ।
 मन में उनकी व्यथा की गठरी लिए मैं वापस लौट आई । अक्सर मुझे बरफी भुआ की याद आ ही जाती है और उनके दुखों और कड़वाहटों को याद कर के मन भी उदास हो जाता है।

                                ***  
                                                     【 समाप्त 】

Thursday, August 27, 2020

"बरफी" 【प्रथम किश्त】

पिछले कुछ दिनों से रह-रह कर मेरी स्मृति में ‘बरफी भुआ” का चेहरा कौंध रहा है। एक दिन अचानक घर की महरी ने काम करते-करते कहा -तुम्हारा सुबह जल्दी काम पर जाने का समय और शाम को सर्दियों में देर हो जाने से काम का हिसाब नही बैठ रहा, मेरे घर में छोटा बच्चा भी है तुम्हारे यहाँ बरफी काम कर दे क्या?
            पहले के समय में घरों पर काम करने आने वालियों को आज की तरह ‘मेड’ या नाम लेकर कम ही पुकारा जाता धा । उम्र में बड़ी हो तो ताई-चाची का सम्बोधन और उनके घर की बहू-बेटी से भाभी,बहन और भुआ का रिश्ता स्वमेव ही जुड़ जाया करता था यहाँ मेरी हमउम्र माँ से बड़ी औरत को बरफी ही कह रही थी जो मेरी नजरो में अशिष्टता थी । मगर वो ही क्या सभी पीठ पीछे बरफी और मुँह पर ‘बरफी भुआ’ बुलाते थे । बचपन में  मैंंने भुआ को अक्सर मोहल्ले के घरों में जिनके यहाँ गाय-भैसें थी घास के गट्ठर लाते और फुर्सत में घर के सामने की खण्डहरनुमा हवेली के चबूतरे पर बैठकर बीड़ी फूंकते देखा था। मेरा बाल मन उनकी बीड़ी की लत को सहज ही स्वीकार नही कर पाता था , अपनी गहरी सोचती आँखों के साथ उस समय वे मुझे एक ‘पहेली’ जैसी नजर आती थीं। उनके लिए मेरे हाँ करते ही बरसों पुरानी महरी ने चैन की सांस ली।
अगले दिन सुबह-सुबह एक दुबली-पतली बूढ़ी सी औरत ने मेरा नाम पुकारा। झुर्रियों भरा चेहरा जहाँ जीवन में उठाए कष्टों का परिचय दे रहा था वहीं धंसी हुई आँखों में आज भी उतनी ही गहराई थी और चिर परिचित आदत भी आज भी वही की वही थी।मुड़ी-तुड़ी साड़ी के कोने में बंधे बीड़ी के बण्डल को खोलते हुए बोली-’तुझे बुरा ना लगे तो एक बीड़ी पी लूं ,लत लग गई अब छूटती ही नही।’ मैंंने कहा- छोड़ दो भुआ सेहत खराब होती है । तो जवाब मिला - 'तेरी तरह किसी ने ना की सेहत की फिक्र नही तो कब की छोड़ दी होती' यह कह कर फीकी सी हँसी हँस दी और बोली - ‘कमली ने बोला है तुम्हारे यहाँ काम करने को।’  झिझकते हुए मैंने पूछा -झाड़ू-बर्तन का काम है भुआ, करोगी ? क्योंकि बालपन से  ही उन्हें केवल गाय-भैसों की देखभाल करते ही देखा था।
      ‘हाँ बेटा ! अब पहले की तरह लोगों ने पशु पालने बन्द कर दिए तो पापी पेट के लिए तो कुछ करना ही पड़ेगा,ये तो बखत पर खर्चा-पानी  मांगता है ।' यह कहते हुए बरफी भुआ ने उसी दिन से घर का काम संभाल लिया। सर्दियों में दिन छोटे होने के कारण और बर्तन-सफाई के अतिरिक्त वह और भी दो काम कर देती जिसे मुझे बड़ी राहत मिली। 
       निर्धारित गतिविधियों के अनुसार मैं और भाई अपने काम पर पर चले जाते। घर पर मेरा बेटा रहता जो स्कूल से आने के बाद अपनी कॉमिक्स या होमवर्क जैसे कामों में लग जाता। कई बार तो मेरे आने से पहले ही वे काम कर के चली जाती। उनकी व मेरी बोल-चाल बड़ी सीमित मात्रा में थी ,छुट्टी वाले दिन मैं अतिरिक्त कामों में लगी रहती। कुछ महिनों बाद अचानक एक दिन भुआ का स्नेहिल स्वर सुना -’आज बच्चे की हँसी सुनी है ,आज घर में रौनक आई है ; तुम तीनों तो सदा घर के कोनों में रखी चीजों जैसे लगते हो।’ हुआ यूं कि मेरी बहन कुछ दिनों के लिए ससुराल से आई थी और उसके आते ही मैं भाई और मेरा बेटा सचमुच सक्रिय हो उठे थे।दरअसल सच यह भी था कि बरसों से साथ रहने के आदी हम अपनी बहन की कमी एक शिद्दत से महसूस करते थे। उसके आने से हमारा घर सचमुच चहक उठा था।
             बरफी भुआ का ममतामयी रुप तब और भी गहरेपन सॆ दिखा जब बहन वापस ससुराल जा रही थी, भुआ ने अपने पुराने अन्दाज में साड़ी का पल्लू टटोला तो मुझे बड़ी खीज हुई कि अब सब के सामने बीड़ी पीयेंगी लेकिन देखा तो उनके हाथ में बीड़ी के बण्डल की जगह पाँच रुपये का नोट था। बहन के हाथ में रखती हुई बोली - “बेटी सास को माँ, ननदों को बहन समझना और देवरानी-जेठानी को सदा सवाई रखना। “बहन ने झिझकते हुए कभी हथेली में रखे पाँच रुपये के नोट को तो कभी मेरी ओर देखा मगर भुआ के अपनेपन को अस्वीकार करने की हिम्मत मुझ से नही हुई।
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【अगले अंक में समाप्त】

Thursday, August 13, 2020

"स्वतंत्रता दिवस की स्मृतियाँ" 【संस्मरण】

        
     【 चित्र : गूगल से साभार 】

स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस का एक अनूठा आकर्षण
रहा है मेरे मन में । बचपन में स्कूली मार्चपास्ट में भाग लेना
और बैंड के साथ कदम से कदम मिलाते राष्ट्रीय ध्वज को
सलामी देते हुए मंच के सामने से गुजरना रोम रोम में पुलकन
भर देता था । मगर नहीं भूल पाती शिक्षिका बनने के बाद का
बैंड की इंचार्ज के रूप में अपना पहला पन्द्रह अगस्त जब
स्कूल की प्रिन्सिपल ने यह दायित्व मुझे सौंपा । दरअसल
हमारे यहाँ स्कूलों की परम्परा थी कि हर शिक्षक को शिक्षण
कार्य के अतिरिक्त एक सहायक गतिविधि का दायित्व भी
वहन करना है ।
 वहाँ अपने हिस्से में बैंड की जिम्मेदारी आई । बैंड की
प्रैक्टिस करवाने हफ्ते में तीन दिन आर्मी के रिटायर्ड बैंड सर
आते थे सो परेशानी कुछ खास थी भी नहीं लेकिन शीघ्र ही
उन परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ा । हुआ ये कि बैंड
सर  इस्ट्रूमेंट्स की सफाई वाले दिन यानि पन्द्रह अगस्त से
पहले दिन अनुपस्थित हो गए । हमें लगा कोई नहीं … आसान
सा काम ही तो है साफ - सफाई ।
        बड़े जोश से सब छात्राओं ने ब्रासो और प्राइमर के
साथ इस्ट्रूमेंट्स चमकाये और अगले दिन के लिए  सहायक
सर्वेंट से रखवा दिये । पन्द्रह अगस्त की सुबह...चार स्कूलों
का स्टाफ और मार्चपास्ट के ट्रुपस् नियत स्थानों पर..,यह पहले
से ही तय था कि मुख्य अतिथि द्वारा ध्वजारोहण के साथ
ही राष्ट्रगान हमारे स्कूल के बैंड द्वारा ही बजना है । जैसे
ही ध्वजारोहण के साथ राष्ट्रगान शुरु हुआ अधिकांश
ट्रमपेंटस् के सुर गायब और फूंक मारती 'की' चलाती लड़कियों
की आँखें हैरत से बाहर..चंद बारीटोनस् और ट्रमपेंटस्
की आवाज़ बिल्कुल धीमी.. और इसी के साथ मेरे माथे पर
ठंडा पसीना.. लेकिन  एक सेकेंड की देरी किये बिना फ्लूट्स
ग्रुप ने आँखों ही आँखों मुझे आश्वस्त कर स्थिति की गंभीरता
को बहुत अच्छे से संभाला । पूरा  राष्ट्रगान लगभग
फ्लूट्स ,बेसड्रम और साइड ड्रमस के सहारे बजा । तब तक
बैंड सर भी मंच छोड़ ग्रुप के पास पहुंच चुके थे । मुख्य
अतिथि महोदय के भाषण के दौरान उन्होंंने स्थिति संभाली
और सभी ट्रमपेंटस् की चाबियां दुरूस्त की । लड़कियों का
मूड तब सुधरा जब उनका समूह अन्त में  ...सारे जहां
से अच्छा..बजाता मंच के सामने से गुजरा और उनके लिए
खूब तालियां बजी और वाहवाही हुई । बैंड सर की भी नये
प्रयोग के लिए प्रशंसा हुई  जिसको स्वीकारते वे थोड़े
असहज थे ।
        बाद में पता चला कि फ्लूट्स की मधुर ध्वनि और ड्रमस
की बीट्स पराम्परागत बैंड में एक अभिनव प्रयोग समझी गई ।  मेरे अनजान होने और छात्राओं के जोश के कारण सफाई
के दौरान ट्रमपेंटस् की चाबियों के नंबर उल्टे-सीधे डल गए
जिनके चलते उनसे आवाज़ निकलनी बंद हो गई । मैं भी जब
तक वहाँ कार्यरत रही कसम खा ली कि इस्ट्रूमेंट्स के
रख- रखाव और सफाई कार्यक्रम के बाद कम से कम दो
प्रैक्टिस तो जरूर होगी ।
     यद्यपि बैंगलोर में भी आवासीय परिसरों में राष्ट्रीय पर्व
बड़ी धूमधाम से मनाये जाते हैं मगर मुझे टी.वी. पर ही
स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम देखना 
व अतीत की वीथियों में विचरण करना अच्छा लगता है । मैं
जब भी बैंड की धुन पर ध्वजारोहण के साथ राष्ट्रगान सुनती हूँ
तो सावधान की मुद्रा में खड़ी हो जाती हूँ और मेरे साथ घर के
सदस्य भी । उस मधुर गूंज के साथ बचपन की मार्चपास्ट
और स्कूल के बैंड के साथ मेरे राष्ट्रीय पर्वों के शुभ अवसरों
पर गौरवान्वित करने वाले पलों के दृश्य उस वक्त मेरी आँखों के आगे साकार हो उठते हैं ।

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