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Friday, January 31, 2025

“सवाल”

     “मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने…॥” बहुत प्यारा गाना है “आनन्द” मूवी का ।आज यूट्यूब पर गाने सुनते-सुनते मुकेश जी के गाने सामने आए और उन्हीं गानों में गुलजार साहब का यह गीत भी था जिसने उस दौर की याद दिला दी जब ख़त लिखने का मतलब कुशल क्षेम जानना ही नहीं भावनाओं का आदान-प्रदान भी हुआ करता था ।

               सात रंग के सपने.., गगनचुंबी सपनों की उड़ान और भी न जाने क्या-क्या ? वो शिकायती ख़त लिखते समय शायद उसके दिलोदिमाग़ पर इसी गाने का असर रहा होगा तभी तो उसने लिखा था - “ये सात रंग के सपने मेरे अकेले नहीं हैं कहीं न कहीं आप भी तो शामिल हैं इनमें.., जब पूरे ही नहीं करने थे तो इस बारे में सोचा ही क्यों ?” शायद नाराज़गी थी कहीं न कहीं कि मेरा सहयोग नहीं है लक्ष्य साधना में ।यहाँ अपनी सोच कुछ अलग सी थी ..,गीत के मर्म के समान और उस सोच को समझने की ज़रूरत सपनों के पीछे भागते समय भला किसको याद रहती है । हमारे बीच यह आख़िरी संवाद था ख़तों के माध्यम से एक -दूसरे की हौसला अफ़ज़ाई का । समय के साथ-साथ सोचें और रास्ते बदलते चले गए सोचने समझने के नजरिये में कमी कहाँ रह गई , समय के साथ यह  बात भी बीते समय की हो गई ॥

                         बहुत बार इन्द्रधनुष देखती हूँ तो सोचती हूँ कितनी अजीब बात है ।सात रंगों का मिलन और परिणाम - श्वेत प्रकाश ! ,कोरे काग़ज़ सा..,! मानो मूक आमन्त्रण दे 

रहा हो -  “आओ ! कुछ साकार करो मुझ पर ,कोई अल्फ़ाज़.., कोई आकृति .., कुछ भी जो तुम्हारे दिल में हो । मैं तुम्हारी ख्वाहिश को साकार करने में सक्षम हूँ अपने कलेवर पर । बस..,  कभी भी यह मत भूलना मैं अकेला एक नहीं हूँ मिश्रण हूँ सात रंगों का.., मेरा वजूद अनमोल है ।तुम्हारी सोच मुझ से ज़्यादा नहीं तो कम से कम मेरे जैसी तो होनी ही चाहिए ।”

                       खैर, अपना सवाल तो गीत के बोल , ख़त के अल्फ़ाज़ों  पर आज भी वही का वही टिका  है - रंग सात ही क्यों ? कम रंगों के मिश्रण से भी परिणाम सुखद हो सकते हैं । क्यों चाहिए सातों रंग..,सारा आसमान । जीने के लिए छोटी -छोटी बातें..,छोटी - छोटी आशाएँ और छोटी-छोटी ख़ुशियाँ क्या कम हैं ।

                           

                                      ***

Wednesday, August 7, 2024

“रहस्य”

मैं आज फिर से कल के गलियारे में हूँ ।बहुत कोशिश की खुद को आज से बाँधने की मगर मन तो बहते पानी सा चंचल ठहरा अपने लिए रास्ते ढूँढ ही लेता है किसी एक जगह उसको ठहरना भाया कब है।

            अभी कुछ दिन पहले  “डिस्कवरी” पर “Ancient Aliens” प्रोग्राम देखने के बाद मन पुनः बीते कल के आँगन में जा खड़ा हुआ। बहुत  बार ऐसा पढ़ने में आता है कि ब्रह्माण्ड में अस्तित्व है मानव सभ्यता के अतिरिक्त अन्य सभ्यताओं का ।बात जब ब्रह्माण्ड की हो और माँ से बचपन की बहसें याद ना आए ऐसा कैसे हो सकता है ।  माँ की मोटी-मोटी पुस्तकें जिनमें उनको सदा फ़ुर्सत के लम्हों में डूबे देखा .., माँ के साथ उनकी भी याद आ ही जाती है जिनका कभी वे मौन रह कर तो कभी सस्वर वाचन किया करती थीं । कई बार सोचती थी कि माँ की किताबों में से जो अच्छी लगेंगी अब की बार  की गर्मी की छुट्टियों में ज़रूर पढूँगी पूरी नहीं तो कुछ पन्ने ही सही। लेकिन छुट्टियों में खेल-कूद के अतिरिक्त कुछ याद ही कहाँ रहता था । ख़ैर सोचने का मौक़ा ज़्यादा नहीं दिया कुदरत ने…, माँ के जाने के बाद उनकी सारी किताबें पापा ने कुछ नानाजी को और कुछ मन्दिर में भेज दी और माँ के साथ मेरी बहसों को सिलसिला भी थम गया ।

      एक बार पढ़ती हुई माँ  के किसी प्रसंग का अंश - “ईश्वर की सत्ता सृष्टि के कण-कण में समाई है वही समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त चर-अचर का स्वामी है ।” मेरे कानों में पड़ गया .., बालमन की जिज्ञासा हाथ धो कर माँ के पीछे पड़नी ही थी - माँ ईश्वर कौन

 हैं ?  और यह तुम्हारी किताबों के ब्रह्माण्ड में भी हमारी साइंस की किताब वाले अन्तरिक्ष : सोलर सिस्टम  और आकाशगंगा जैसे टॉपिक हैं क्या ? तुम्हारे भगवान जी भी सोलर सिस्टम को मानते

 हैं ? उस वक़्त माँ का मूड नहीं था मेरे से बहस करने का..,वे बड़ी  सहजता से मुझे “नास्तिक” की उपाधि प्रदान कर बुकमार्क के रूप में मोरपंख अपनी किताब में दबा कर अपने कामों में उलझ गईं।और मैं भी उस बात को भूल गई ।

     गर्मियों में एक दिन रात  में छत पर सोते हुए साफ़ आकाश में जहाँ असंख्य तारों की झिलमिलाहट थी हल्के से बादलों की लकीर की तरफ अंगुली से इशारा करते हुए माँ ने कहा - 

“देख ! आकाश गंगा !”  

“अच्छा जी ! आपकी किताबों में आकाश गंगा भी होती हैं ?”

मेरी बात को अनसुना करते हुए उन्होंने कहा -

“उधर देख ! वो सप्तऋषि मण्डल और वो ध्रुव तारा ।” 

-“अच्छा तो यह बीच का हिस्सा जहाँ तारे नहीं दिखायी दे रहे “ब्लैकहॉल” है । मैंने आँखों से दिखाई देने वाले उस छोटे से आकाश के हिस्से में मानो पूरे अन्तरिक्ष को नापने की ठान ली 

थी ।”

     अचानक एक प्रश्न  कौंधा मन में और मैं पूछ बैठी -

  -   “माँ ! क्या हमारी पृथ्वी जैसी और भी पृथ्वियाँ होंगी वहाँ भी हम जैसे लोग रहते होंगे !” 

-“जरूर होंगे” माँ का उत्तर खोया खोया सा लगा । 

मेरी जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी ।

-“माँ यह सब किसने बनाया ?” 

- “ईश्वर ने ।”

- “ईश्वर को किस ने ?

माँ की सोच रूक गई- ठहरी सी आवाज़ में बोलीं जो आज भी याद है - 

“ वह सर्वोच्च शक्ति जिसने ब्रह्माण्ड का निर्माण किया जो हमेशा हर जगह व्याप्त है वही ब्रह्मा, विष्णु और महेश है ।जगत के जन्मदाता,पालनकर्ता और संहारकर्ता । उसे ईश्वर मानते हैं हम ।”

                     माँ जानती थी मेरी तरफ़ से और प्रश्न आने वाले हैं इसलिए विषय को विराम देते हुए कहा-

“अब सो जा ! आज के लिए तेरे लिए बहुत हो गया ।”

                माँ की खामोशी के बाद आसमान में टकटकी बाँधे मेरी आँखें हर जगह व्याप्त उस असीम शक्ति की कल्पना में डूबी हुई थी जो हर जगह व्याप्त थी शायद वो मुझे भी देख रही थी ॥ मेरे लिए यह बहुत बड़ा रहस्य था जिसे मैं कभी सुलझा नहीं पाई ।

                            “Ancient Aliens” की डॉक्यूमेंट्री देखने के बाद लगा उस रात माँ के साथ चर्चा में माँ  सही थी कि कोई 

असीम शक्ति की सत्ता तो है जो ब्रह्माण्ड को नियन्त्रित करती है । और मैं भी कि पृथ्वी जैसी और पृथ्वियाँ भी  हैं जहाँ हम जैसे प्राणी रहते होंगे ।यह अलग बात है कि वे हमारी पृथ्वी पर रहने वाले लोगों जैसे भी हो सकते हैं और उनसे अधिक उन्नत और विकसित अवस्था में भी हो सकते हैं ।


                                       ***


Friday, May 31, 2024

“आदतें अपनी-अपनी”

 


                              ( Click by me )


उसने पूछा - लिख नहीं रही आज कल ? बहुत दिन हुए कुछ लिखते नहीं देखा..!! मन किया कि कहूँ - आज कल गुजरे 

कल और आने वाले कल को दरकिनार कर आज को जीना 

सीख रही हूँ और वो आज मुझे हर जगह अनफ़िट किये दे रहा 

है जिसके तार पैदाइश से ही जुड़े हैं मेरे साथ .., कम से कम  

मुझे अपने बारे में ऐसा ही लगता है । मैं बस एक ही काम तो अच्छे से कर पाती हूँ सब से सामंजस्य बिठाने की कोशिश लेकिन यहाँ भी झोल है  जब तक वह बैठता है तब तक दुनिया और से और हो जाती है ।बस गुजरे पलों का सूत्र ही रह जाता है हाथ में ।ज़िद्द है मन की कि ज़िन्दगी के गुणा-भाग के बाद शेष बचे अंश से तारतम्य बिठाने के लिए एक ईमानदार कोशिश तो  कम से कम होनी ही चाहिए ।बाकी कल का क्या…?  वो तो सांसों के साथ जुड़ा है जब जी चाहेगा स्मृतियों के गलियारों के दरवाजे खुद के लिए ख़ुद बख़ुद खुल जायेंगे ।


                                      ***

Monday, April 22, 2024

“आज कल”

गेटेड सोसायटी के अपार्टमेंटस् में रहना मुझे बहुत पसन्द रहा 

है हमेशा से ही सब कुछ बन्द -बन्द और सेफ । खुलेपन और ताज़गी के लिए खिड़कियाँ और बालकॉनियाँ काफ़ी हैं , कुछ कुछ यही नज़रिया रहा है मेरा घर के मामले में । बचपन के घर 

के आँगन की उपयोगिता भी मेरे लिए केवल आने-जाने भर के लिए हुआ करती थी । उम्र के साथ शायद सोच बदलने लगी 

है । आँगन वाले घर और घनी छाँव वाले पेड़ बहुत भाने लगे हैं आज कल ।

                          बहुत बार बहुत सारी जगहों पर अलहदा से विचार कौंधते हैं मन में ..,सोचती हूँ लिखूँगी । मगर टाइपिंग के लिए पेज़ खोलते - खोलते खुद पर खुद ही हावी हो जाती हूँ  

और ख़्याल हल्के-फुल्के बादल बन तिरोहित हो जाते 

हैं अनजान गलियों में ।अँगुलियाँ अपने लिए शग़ल ढूँढ लेती 

हैं और ‘कुछ कुछ सर्च करने में व्यस्त हो जाती हैं । घण्टे भर  

की माथापच्ची के बाद दिमाग़ अचेतन सा शून्य में गोते लगाता महसूस होता है । 

        ज़िन्दगी की सरसता में नीरसता बैंगलोर के तापमान की तरह बढ़ने लगी है।जिसकी हवा तो अब भी पहले सी है मगर ठण्डक कहीं खो गई है ।दिन एक कप चाय जैसे लगने लगे हैं जो आदतानुसार फीकी चाय में भी मिठास के साथ ताजगी ढूँढने से बाज़ नहीं आते । कप में छनते समय अपने भूरे से रंग और भाप 

के साथ चाय बाँधती तो है अपने आकर्षण में लेकिन मिठास के अभाव में होठों तक आते -आते मुँह में बेस्वादीपन घोल कर ज़ायक़े का आनन्द छीन लेती है  ।समय को अपने ढंग से अपने लिए काटने का फ़ितूर अपने लिए तो कबीर की ‘माया महाठगिनी हम जानी’ की जगह ‘समय महाठग’ बन गया है ।


***

Sunday, October 22, 2023

“उलझन”

 ( Click by me )

                 लिखना-पढना अब उन साड़ियों की तरह हो गया जो न जाने कब से बंद पड़ी हैं पारदर्शी पन्नियों में.., विचार आते हैं और अन्तस् की गहराइयों को स्पर्श करते हुए न जाने कैसे शून्य में खो जाते हैं ।मेरे लिए सलीके से जीने के लिए खुद को चाहना और अभिव्यक्त करना बड़ा ज़रूरी होता है  और वो कहीं खो सा गया है ।शब्द-शब्द बिखरे हैं चारों तरफ। चुन कर माला गूँथनी भी चाहूँ तो फिसल जाते हैं मोतियों की मानिन्द । उदासीनता का भाव आसमान की घटाओं सा घिर आया है पढ़ने -लिखने के मामले में ।

                                  जानती हूँ अभिव्यक्ति के प्रकटीकरण में जड़ता कम से कम मेरे लिए व्यक्तित्व में कहीं न कहीं अपूर्णता है जिसे पूर्ण बनाने का दायित्व भी इन्सान का स्वयं का ही है । इस जड़ता के समापन के लिए खुद की खुद से जंग जारी है ।

                                            ***

Friday, August 11, 2023

“संदूक"

बहुत दिनों के बाद आज समय मिला है ..आलमारी ठीक करने का । कितनी ही अनर्गल चीजें रख देती हूँ इसमें और फिर साफ करते करते सलीके से  ना जाने कितना समय लग जाता है ।  कितनी स्मृतियाँ जुड़ी होती है हर चीज के साथ ..और मन है कि  डूबता चला जाता है उन गलियारों में और जब काम पूरा होता है तो सूर्यदेव अस्ताचलगामी हो जाते हैं । ऐसे समय में  अक्सर बचपन का घर और माँ का करीने से जँचा कमरा घूम जाता है नज़रों के आगे । इस आकर्षण का कारण माँ के सलीकेदार होने की प्रंशसा का होना मुख्य है जो घर के सदस्यों के अतिरिक्त रिश्तेदारों से भी सुनने को मिलती थी । माँ के कमरे में दीवारों में बनी आलमारियों में एक आलमारी पर सदा ताला लगा देखती थी हमेशा और उसकी चाबी का गुच्छा माँ की साड़ी के छोर से बंधा हुआ…,अगर पल्लू के छोर पर नहीं तो पक्का रसोईघर के सामान के बीच रखा ,जिसे वे प्रायः भूल जाया करती थीं काम करते हुए । और उसे ढूंढने का श्रेय मेरे हिस्से में सबसे अधिक आता था । माँ जब भी आलमारी खोलती सूटकेसों के साथ करीने से रखी पुरानी बेडशीट पर लोहे की प्रिटेंड संदूक को जरूर अपलक निहारती दिखती और मैं उनके गले में हाथ डाल कर झूलती हुई पूछती --'तुम्हारी तिजोरी है माँ ?'  स्नेह में डूबा लरजती आवाज में उनका जवाब होता -- हाँ.. तेरी नानी की भेंट है यह ।और मैं उलझा देती उन्हें बहुत सारे प्रश्नों में..जिनकी उलझन से बचने के लिए वे सदा ही  मुझे-- जा पढ़ाई कर.. कह कर चुप करा देती ।

                      अपने घर में जब भी फुर्सत से आलमारियां ठीक

करती हूँ ...माँ की आलमारी और प्रिटेंड सा संदूक याद आ जाता

 है । माँ का संदूक को सावधानी से रखना , करीने से खोलना ,  कपडों की तहों में चिट्ठियाँ रखना ...कुछ ननिहाल से मिली भेंटों को अपलक तांकना ; बालमन को तो समझ नहीं आता था पर अब समझ आता है ।  संदूक का छोर पकड़ती माँ  मानो हाथ पकड़ती थी अपनी माँ का .., उसमें रखे सामान को सहेजती माँ का बालमन भी अपने बचपन के गलियारों में विचरण करता ही होगा मगर  उनके एकान्तिक अहसासों की एकाग्रता को भंग करती कभी मैं  तो कभी भाई -बहन उनको उनके बचपन से बड़प्पन के संसार में ले आया करते थे मानो कह रहे हो -- "तुम 'लाइट हाउस' हो हमारा … कहाँ जा रही हो माँ?"   आज माँ नहीं हैं.. मैं आलमारी ठीक करते करते मन से माँ की तरह भटक रही हूँ यादों की उन विथियों में … जहाँ माँ का संदूक  है ..और अब है भी या नहीं पता नही...जिसमें ना जाने कितने अनकहे अहसास बंद थे माँ के करीने से सजाये हुए .. उन्हीं को याद करती मैं वापस लौट आती हूँ अपनी आलमारी के पास बिखरे यादों के संदूक के साथ ।


                                        *

Wednesday, May 3, 2023

“उधेड़बुन”

 

                                             

किसी बात के चलते किसी घनिष्ठ ने कभी कहा कि -“एक वक़्त के बाद लोग जम नहीं पाते किसी जगह..।” और मैंने हँसते हुए प्रतिवाद किया था -  “अच्छा !! बरगद ,पीपल , नीम नहीं रहते ..,मनी प्लांट हो जाते हैं कहीं भी लगा दो .., बस लग ही जाते हैं ।” 

       शायद उन्हें मेरी बात पसन्द नहीं आई और चुप्पी साध ली ।   मौन अंतराल को भरने के लिए हमारे बीच कोई दूसरा विषय छिड़ गया और इसी के साथ बातों का सिलसिला भी कहीं और मोड़ पर मुड़ गया । मगर उनका वाक्य और अपना संवाद रह-रह कर कानों में गूंजता है जब भी मन भटकता है ।

     रमता जोगी जैसा स्वभाव बहुत काम का है रोज़ी-रोटी की ख़ातिर यहाँ-वहाँ प्रवास कर रहे लोगों के लिए या फिर बन जाता है आवश्यकतानुसार । इसीलिए कहा जाता रहा होगा “आवश्यकता आविष्कार की जननी है” यहाँ रिसर्च जैसी कोई बात नहीं बस मानव व्यवहार की बात है ।उसमें भी समयानुसार परिवर्तन आम है । परिस्थितियों के अनुसार पानी की तरह ढल जाता है आदमी भी ।

          आजकल मेरा मन असीम से ससीम के बीच चक्कर घिन्नी में बँधे लट्टू सा घूमता रहता है । कठिन समय के भंवर से बाहर निकलने के लिए कई बार ढलती साँझ में नीड़ में लौटते परिन्दों सा वह अपनी जड़ों को ढूँढता है तो कई बार लौट आता उसी थान के खूँटें पर जहाँ ढलती साँझ और नीड़ के परिन्दों का अस्तित्व कल्पनामात्र है । जीवन का यही शाश्वत सत्य हम अक्सर जीते हैं । जिसे न छोड़ते बन पाता है और न पकड़ते बन पाता है ।


                                       ***

Friday, March 3, 2023

“बीस साल बाद”


                               ( Click by me )

 धीरे-धीरे गोधूली  के धुँधलके से ढकता आसमान और  प्रदूषण रहित हवाओं में हल्की सी ठंडक । उदयपुर की धरती पर कदम रखते ही गुजरे वक़्त ने मानो दौड़ कर उन्हें अपनी बाहों में समेट कर स्वागत किया ।

         कुनकुनी सी ठंडक के स्नेहिल स्पर्श और अपनेपन की सौंधी 

महक में डूबे तीन सहयात्री न जाने मन की  कौन-कौन सी वीथियों के कोने स्पर्श करने मे मगन थे कि मौन की तन्द्रा भंग करते हुए एक ने दूसरे से कहा- “ चलो तुम्हारा अपने आप से किया वादा पूरा हुआ यहाँ अपना एक साथ आने का । जब भी पुराना एलबम खुलता है.., तुम्हारी ढलते सूरज की फोटो के साथ यहाँ मेरे साथ आने की बात ज़रूर चलती है ।” 

       “तुम्हें पता है बरसों से चली आ रही हर बार की यही कहानी थी हमारी ।”तीसरे साथी को वार्तालाप में सम्मिलित करते हुए पहला साथी बोला ।”  

                 “मुझे क्रेडिट मिलना चाहिए प्लान मेरा था। बहुत बार इस अधूरे वादे के बारे में तुम दोनों से सुना, सोचा तुमसे तो पूरा होने से रहा 

मैं ही तुम दोनों का पेंडिग काम पूरा कर दूँ ।” - मुस्कुराट के साथ बोलते समय उसकी नज़रें अभी भी खिड़की के बाहर भागते पेड़ों और इमारतों 

पर टिकी थी ।

          “हाँ भई हाँ !! बात तो सही है तुम बिन हम भाग ही तो रहे थे जीवन में। जीने की कला बस सीख रहे हैं तुमसे !” दूसरे साथी ने हँसते हुए कहा ।

      हल्की-फुल्की बातों का सिलसिला गाड़ी के रूकने और “घणी खम्मा” के अभिवादन के साथ रूक गया ।

        गंतव्य आ गया था लेक “पिछोला” से दूर अरावली श्रृंखला की पहाड़ियों के पीछे छिपता सूरज आज भी हुबहू वैसा ही था जैसा 

बीस साल पहले था । 


                                     ***

Tuesday, February 14, 2023

“ऋतुराज वसंत”

फरवरी से अप्रैल के मध्य वसंत ऋतु में प्रकृति अपने सौंदर्य की 

अद्भुत छटा बिखेरती है । ऐसा माना गया है कि माघ महीने की 

शुक्ल पंचमी से वसंत ऋतु का आरंभ होते ही मौसम सुहावना हो 

जाता है, पेड़ों में नए पत्ते आने लगते हैं, आम के पेड़ बौरों से लद 

जाते हैं । खेत सरसों के फूलों और गोधूम की बालियों से महमहा उठते हैं  । 

                 वसन्तोत्सव से होली तक राग- रंग से सरोबार इस 

समय को  ऋतुराज कहा गया है । इसके प्रभाव से तो गोपेश्वर  भगवान  श्री कृष्ण भी अछूते नहीं रहे तभी तो कुरुक्षेत्र समर भूमि में अर्जुन को विराट स्वरूप के दर्शन करवाते हुए   गीता उपदेश में कहा था  - “मैं ऋतुओं में वसंत हूँ।” 

       वसंत के आगमन का अनुभव मेरी दृष्टि में एक अलग सी 

पहचान लिए है - “बाल्यावस्था में रात्रि काल में हल्की सी सर्दियों में चंग की थाप के साथ मन-मस्तिष्क पर सदैव वार्षिक परीक्षा की दस्तक  कानों में मृदंग लहरियों सी बज उठा करती थी और वसंत पंचमी के दिन पीले फूलों की सुगंध और केसरिया रंगों के रस में 

डूबी मिठाइयों की महक से आप्लावित मंदिर प्रांगण में सरस्वती आराधना में बन्द दृगपटलों में पूरे साल की कमाई अर्थात् अंक-तालिका के विषयवार अंकों  का लेखा-जोखा साकार हो 

उठता था।”

                       ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती गई त्यों-त्यों बोर्ड परीक्षाओं 

की फिर  यूनिवर्सिटी की परीक्षाओं की चिंता पर्वत सी अचलता के साथ कलेजे पर बैठी रहती । युवावस्था में शिक्षा-व्यवसाय की अति व्यस्तताओं के बीच वसंतोत्सव पर्वों का हर्षोल्लास और प्रकृति का सौन्दर्य मेरा ध्यान अपनी ओर खींचने में सदा ही असमर्थ रहता । 

                  अति व्यस्तताओं से दूर फ़ुर्सत के पलों में सागर 

किनारे अठखेलियाँ करती लहरों के सानिध्य में पीले फूलों से सरसी सरसों और स्वर्ण सदृश गोधूम की पकती बालियों को देखे बिना मैं

कैसे कह दूँ-

               “ओह !! ऋतुराज वसंत !! मधुमास वसंत !!”

              

***

Saturday, February 11, 2023

“घर”



  अलविदा कहने का वक्त आ ही गया आखिर.. मेरे साथ रह कर तुम भी मेरी खामोशी के आदी हो गए थे । अक्सर हवा की सरसराहट तो कभी गाड़ियों के हॉर्न कम से कम मेरे साथ तुम्हें भी अहसास करवाते

रहते कि दिन की गतिविधियां चल रहीं हैं कहीं न कहीं ।'वीक-एण्ड' पर मैं बच्चों के साथ अपने मौन का आवरण उतार फेंकती तो तुम भी मेरी ही तरह व्यस्त और मुखर हो कर चंचल हो जाते ।समय पंख 

लगा कर कैसे उड़ता भान ही  नहीं होता। ख़ैर.., अपना साथ इतने समय का ही था ।

          चलने का समय करीब आ रहा है । सामान की पैकिंग हो रही है सब चीजें सम्हालते हुए मैं एक एक सामान  सहेज रही

 हूँ । महत्वपूर्ण सामान में तुम से जुड़ी सब यादें भी स्मृति-मंजूषा में करीने से सजा ली हैं । फुर्सत के पलों में जब मन करेगा यादों की गठरी खोल कर बैठ जाया करूँगी.., गाड़िया लुहारों की सी आदत 

हो गई है मेरी ..,आज यहाँ तो कल वहाँ। जो आज बेगाना है वह 

कल अपना सा लगेगा..मुझे भी..तुम्हे भी । मेरी यायावरी में तुम्हारा साथ मुझे याद रहेगा सदा सर्वदा ।


                                   ***

Monday, August 15, 2022

“स्वतन्त्रता दिवस”


15 अगस्त …, राष्ट्रीय उत्सव .. राष्ट्रीय ध्वज..,  राष्ट्रगान.., देशभक्ति गीत.., स्कूलों के दिन । कभी कार्यक्रमों में सहभागी

बन तो कभी सहयोगी बन भाग लेने के दिनों की स्मृतियाँ .., 

साँसों बीच बसी है ।

          इस अविस्मरणीय दिन को माँ भारती के अमर शहीद 

नर - नारी जिनकी क़ुर्बानियों और अथक प्रयासों से हमें स्वतंत्रता मिली उनको नमन करते हुए हम सम्पूर्ण देशवासी 15 अगस्त

के दिन राष्ट्र के उत्थान और स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखने के संकल्प के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं ।आइए हम सब अपने राष्ट्र  के गौरवपूर्ण इतिहास की स्मृतियों को संजोये गुनगुनाएँ  मुस्कुरायें । Happy Independence Day.

  सभी विज्ञ साथियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई ।         


                          जय हिन्द ! जय भारत !

Tuesday, July 19, 2022

“सावन”


सावन के आते ही रिमझिम बारिश के साथ तीज-सिंधारा पर्व , जगह जगह पेड़ों पर पड़े झूले  और माँ का चेहरा स्मृतियों में साकार हो उठता 

है उस समय लहरियों के कपड़ों के साथ मेहन्दी की महक एक अलग सा समां बाँध देती थी सावन माह में । तब मैं इतनी बड़ी नहीं थी या फिर समझ नहीं थी कि माँ से कभी फ़ुरसत में यह सवाल करूँ  कि - “ आप कितना प्यार करती हो मुझे ।”

मेरा यह प्रश्न पूछना और माँ से उत्तर पाना शायद समय की लकीरों में नहीं था मगर उन्हीं लकीरों में वो पल ज़रूर निहित  थे जिनमें रिमझिम बारिश के साथ माँ की वात्सल्य युक्त स्मृतियाँ दिल की ज़मीन को हर सावन में भिगोये रखतीं हैं ।

            माँ की ममता की गागर मेरे लिए पहली बार मैंने तब छलकती अनुभव की जब बड़े प्यार से उन्होंने झूले पर बैठाते हुए मुझे सतर्क किया “डोर कस कर पकड़ना ।” झूले पर बैठते ही दूसरी लड़की ने जैसे ही 

पेंग बढ़ाने को पैरों से जोर लगाया मेरा कलेजा डर के मारे बाहर और 

मेरी चीख से पहले माँ जोर से चिल्लाईं -“झूला रोको ।” 

झूले से मुझे उतार कर गले लगा आँसू पोंछते हुए हैरानी से माँ ने पूछा - “तुझे डर लगता है झूले से..!”  मेरे बालमन को अपनी हमउम्र लड़कियों के बीच शर्मिंदगी भी महसूस हो रही थी अपने डरपोक होने पर …, सो सफ़ाई देते हुए मैंने कहा - “हाथ से डोर छूट रही थी ।” घर आने पर 

भाई ने हँसी उड़ाई - “डरपोक कहीं की ।”

    अगले दिन स्कूल से आई तो आँगन में बल्लियों के आधार पर स्कूलों के मैदानों जैसा झूला मानो इन्तज़ार कर रहा था मेरा । मैं विस्फारित नज़रों से झूले को निहार रही थी कि पीछे से माँ की खनकती आवाज़ सुनाई दी -“धूप ढलने दे…,धीरे-धीरे झूलना ।जब झूले पर बैठेगी तो 

डोर पर हाथों की पकड़ अपने आप मज़बूत होती चली जाएगी ।” मानो वह अपनी लाडली को किसी भी क्षेत्र में कमजोर नहीं देखना चाहती थी ।

                 माँ नहीं रहीं और न ही झूले वाला आँगन रहा , बस यादें हैं  जो आज भी सावन की रिमझिम बरसती बूँदों के रूप में

टिपर..,टिपर..,टापुर..,टापुर.., करती मनमस्तिष्क के कपाटों पर दस्तक देने लगती हैं ।

                                     ***

Tuesday, October 19, 2021

"डर"

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पाँच साल पहले डोनट में चॉकलेट के साथ लगा कुछ क्रंची सा ..शायद ड्राइफ्रूट का कोई टुकड़ा उसके दाँत में घुसता चला गया और बाइट के साथ तारीफ करने की जगह मुँह इरीटेशन के 

कारण खुला रह गया । हैल्थ प्रॉब्लम्स के चलते 

हॉस्पिटलस् के आजू-बाजू जिन्दगी गुजारने के बाद भी पता नहीं क्यों वह डेंटिस्ट के पास जाने से डरती है शायद माँ याद

आ जाती है और उस याद के साथ ही उसकी सारी बहादुरी 

भी उड़न छू हो जाती है । सो होम रेमीडिज़ ढूंढ़ी गई - क्लोव,

हींग, काली मिर्च और भी न जाने क्या-क्या.., हार कर 

नये शहर में डेंटिस्ट ढूंढा गया । एक्सरे के बाद राय मिली 

इसका 'रूट ट्रीटमेंट' सही रहेगा , कैविटी नसों तक पहुँच गई । डेंटिस्ट के यहां फ्लॉसिंग के बाद दर्द ठीक हो गया  तो  खुद की समझदारी ने  सिर उठा लिया - 'फ्लॉसिंग किट ढूंढी गई 

दिन में दो बार ब्रश करते तो हैं ..,अब फ्लॉसिंग भी किया 

करेंगे । अब अपने आप को इतना समझदार समझने में बुराई 

भी क्या है ?

 पाँच साल बाद…, वही डॉक्टर.., वही बैंगलुरू का इंदिरा नगर 

और वही वह …, बुखार और दर्द साथ लिए ।

 ऑन लाइन वीडियो कान्फ्रेंसिंग से बात बनती न देख फाइनली क्लीनिक की शरण लेनी पड़ी । तीन-चार घंटे में कभी ये डॉक्टर कभी वो डॉक्टर..ढेर सारे टेस्ट और चार-पाँच सीटिंगस् 

का फैसला ।

पुरानी जगह को देख पुराना डर उसके सामने  मुँह खोले खड़ा था जिस से डर कर  उसने वैसे ही आँखें बंद कर रखी थी जैसे कबूतर बिल्ली को देख कर कर लेता है । 

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