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Sunday, January 17, 2021

"बुकमार्क सा ख़्वाब"

                       

(This photo has been taken from Google)


 अनवरत भाग-दौड़  भरी दिनचर्या में कभी खुद के पैरों पर खड़े होने की जद्दोजहद तो कभी सब की अंगुली थाम कारवाँ के साथ चलने की मशक्कत में जीवन बीता जा रहा रहा था गाड़िया लुहारों जैसा.. आज यहाँ-कल वहाँ ।  मेरे साथ मेरे  हम कदम बन भागते दौड़ते तुम ….., कब  मरूभूमि में Oasis की पहचान करना खुद सीख गए और कब उनकी उपयोगिता मुझे सीखाते चले गए भान ही नही हुआ । 

  मैंने कभी फुर्सत के पलों में किसी उपन्यास में खुद को

डुबोये एक ख्वाब देखा था इन्द्रधनुषी तितली सा ...जो कल्पित होते हुए भी मेरी आँखों में जीवन्त था अपनी पूरी

सम्पूर्णता के साथ ।

        उस ख्वाब को मैं भूल भी गई थी किसी उपन्यास के बीच दबाये  बुकमार्क की तरह । वहीं ख़्वाब कभी बातों बातों में तुमसे  साझा करके भी भूल गई थी ।

   आज वही पुराना उपन्यास और उसमें बुकमार्क सा दबा मेरा ख़्वाब तुमने मेरी खुली हथेली पर रख दिया है…और वह इन्द्रधनुषी तितली सा पंख फैलाये मेरी आँखों के सामने साकार है अपनी पूरी जीवन्तता के साथ । थैंक्यू…... !!!  

तुम्हारे नेह की मैं ऋणी रहूँगी युगों… युगों तक ।


***

36 comments:

  1. कोई ख्वाब कोई सपना जिसे हरदम देखा ओर पूर्ण न कर पाये उसे जिसने लाकर हथेली पर रख दिया हो उसके आभार कैसे जताएं....सच में ऋणी ही हो जाते हैं ऐसे सदस्य के...
    बहुत ही खूबसूरती से पिरोया है मनोभावों को।

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    1. आपकी ऊर्जावान समीक्षा से सृजन को मान मिला ।हार्दिक आभार सुधा जी ।

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  2. बहुत ही खूबसूरती से अपने एहसासों को शब्दों में पिरोया है आपने,भुले हुए सपने जब हकीकत बन सामने आते हैं तो हम उस शख्स के ऋणी हो ही जाते है जिसने उस स्वप्न को साकार किया है,मन के भावों को उजागर करती सुन्दर रचना,सादर नमन मीना जी

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    1. सादर नमस्कार कामिनी जी 🙏 सृजन के मर्म को सार्थकता देती प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से आभार ।

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  3. सुंदर मनोभावों को शब्द देती यह रचना बार-बार पढ़ने वाली है। आपके सपने ऐसी ही हकीकत में बदलते रहे। आपको ढेरों शुभकामनाएं और बधाई। सादर।

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    1. आपकी मान भरी प्रतिक्रिया और शुभकामनाओं के लिए हृदय से असीम आभार वीरेंद्र सिंह जी 🙏

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  4. बहुत ही सुन्दर ही लिखा है आपने।

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    1. उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक आभार शिवम् जी !

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  5. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार 18 जनवरी 2021 को 'यह सरसराती चलती हाड़ कँपाती शीत-लहर' (चर्चा अंक-3950) पर भी होगी।--
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

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    1. चर्चा मंच पर सृजन को मान देने के लिए सादर आभार रवींद्र सिंह जी 🙏

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  6. बहुत सुन्दर

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    1. सराहना भरी प्रतिक्रिया से लेखन सार्थक हुआ,हार्दिक आभार सर !

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  7. बहुत ही खूबसूरत भावपूर्ण अभिव्यक्ति सखी।

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    1. आपकी ऊर्जावान समीक्षा से सृजन को मान मिला ।हार्दिक आभार सखी🙏🌹🙏

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    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार सर!

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  9. सुन्दर अभिव्यक्ति....आभार...

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    1. बहुत बहुत आभार विकास जी !

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  10. "आज वही पुराना उपन्यास और उसमें बुकमार्क सा दबा मेरा ख़्वाब तुमने मेरी खुली हथेली पर रख दिया है…"

    अनुभूतियों के वर्तमान को अतीत से जोड़ती हुई बहुत ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति..🌹🙏🌹

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    1. आपकी मान भरी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ शरद जी🙏🌹🙏

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  11. बहुत ही सुन्दर व दिल को हौले से छूता हुआ एहसास, गाड़िया लुहारों जैसा.. आज यहाँ-कल वहाँ - - उस ख्वाब को मैं भूल भी गई थी किसी उपन्यास के बीच दबाये बुकमार्क की तरह - - नाज़ुक व शबनमी अभिव्यक्ति - - बुकमार्क की तरह ज़ेहन में घर कर जाती है आपकी रचना - - साधुवाद सह।

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    1. सृजन के मर्म को सार्थकता देती अनमोल प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से आभार 🙏🙏 नमन सह ।

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  12. कहीं मन में गहरी उतर गई मीना जी आपकी ये कोमल एहसासो से भरी अभिव्यक्ति,जो हाल ही की की किसी सुंदर सुखद अनुभूति का परिणाम है शायद ,सदा आपके जीवन में वो इन्द्रधनुषी तितलियां मोहक उड़ान भरती रहे आपका आंगन सदा महकता रहे ।
    अप्रतिम अहसास।
    सच मरुभूमि की बगिया सा।

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    1. आपकी स्नेहसिक्त शुभकामनाओं से ओत-प्रोत उपस्थिति मेरे लिए और मेरी लेखनी के लिए सुखद मान भरा अहसास है कुसुम जी 🙏🌹🙏 इसके लिए बहुत बहुत आभार 🌹🙏

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  13. उस ख्वाब को मैं भूल भी गई थी किसी उपन्यास के बीच दबाये बुकमार्क की तरह ।


    हृदयग्राही पंक्ति
    सुंदर सृजन

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  14. आपकी मान भरी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ वर्षा जी🙏🌹🙏

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    1. सुस्वागतम् प्रिय मीना जी 🙏

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  15. अरमान को मान किसी भी उम्र में कभी भी, कहीं भी मिल जाय तो उसकी अनुभूति के क्या कहने ?..सुन्दर सृजन..

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    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार जिज्ञासा जी।

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  16. बहुत सुंदर रचना

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    1. हार्दिक आभार मनोज जी!

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  17. उस ख्वाब को मैं भूल भी गई थी किसी उपन्यास के बीच दबाये बुकमार्क की तरह । वहीं ख़्वाब कभी बातों बातों में तुमसे साझा करके भी भूल गई थी ।
    वाह, लाजवाब अंदाज बहुत सुंदर मीना जी

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    1. आपकी अनमोल प्रतिक्रिया पा कर अभिभूत हूँ ज्योति जी! हार्दिक आभार।

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  18. बुक मार्क की ऊपस्धिति बहुत सार्थक लगी | बहुत सुन्दर |

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    1. सराहना भरी प्रतिक्रिया से सृजन को मान मिला..हार्दिक आभार सर!

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  19. कृतज्ञ मन की प्रेमिल अनुभूतियों का सरस राग है ये शब्द चित्र प्रिय मीना जी। काश! मैं भी इतनी बेबाकी और सुघड़ता से लिख पाती ऐसे विषय पर। हार्दिक शुभकामनाएं🙏🙏🙏🙏

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