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Monday, August 29, 2022

“ज्ञान”

                        राजस्थान राज्य में शेखावाटी इलाके के झुन्झुनूं जिले से 70 कि॰मी॰ दूर आड़ावल पर्वत की घाटी में बसा एक सुरम्य तीर्थ स्थल लोहार्गल है । जिसका शाब्दिक अर्थ “वह स्थान जहाँ लोहा गल जाए” है ।

          भाद्रपद मास में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से अमावस्या तक प्रत्येक वर्ष लोहार्गल के पहाड़ों में हज़ारों नर-नारी 24 कोस की पैदल परिक्रमा का आरम्भ सूर्य कुंड में स्नान कर आरम्भ करते हैं । पहाड़ी क्षेत्र और हरियाली से भरपूर औषधीय गुणों से युक्त पेड़-पौधों से आती शुद्ध-ताजा हवा और  ट्रैकिंग का यहाँ अपना ही आनंद है।

                       भूमि भी प्रकृति के सानिध्य के मोह में अपने रिश्तेदारों के साथ यहाँ चली आई है यह सोच कर कि वह कुछ समय रूक कर शाम तक घर लौट आएगी ।यहाँ के मंदिरों के शिलालेखों को पढ़ते हुए भूमि की तन्द्रा तब टूटी जब उसके 

साथ आया समूह “भूमि .., भूमि ” आवाज़ देकर उसे बुला रहा 

था ।

           “चल स्नान करने ।” किसी ने यह कहते हुए उसका हाथ खींचते उसे चलने को कहा तो उसने वह स्थान देखा 

जहाँ झीलनुमा सरोवर में  असंख्य स्त्री-पुरूष डुबकियाँ लगा रहे थे बहुत से लोग दर्शक बन आनंद विभोर थे और सुरक्षा के लिए

तैनात महिला - पुरूष पुलिसकर्मी मुस्तैदी से अपने ड्यूटी पर 

तैनात थे ।

 -  “मुझे नहीं खानी कोई डुबकी-वुबकी ..,भूमि ने दृढ़ता से जवाब दिया ।”

-  “यहाँ आकर भला बिना स्नान के कोई जाता है सब पाप गल जाते हैं तीर्थ स्नान से ।पाण्डवों की बेड़ियाँ भी गल गई थी।पहाड़ों  में गोमुख से निकलता पानी बड़ा निर्मल और पवित्र है ।”

 चौबीस कोसी परिक्रमा के लिए सिर पर थैला धरे एक महिला श्रद्धालु ने भूमि को समझाया । 

“ मगर हम इस निर्मल और पावन जल को पी कर पावन क्यों 

नहीं होते । पहाड़ से निकलता निर्मल और शुद्ध जल पीने के लिए

बहुत अच्छा है ।” - उसने अपनी बात रखने की कोशिश  की ।

                     आपसी विमर्श के दौरान किसी सुरक्षाकर्मी ने 

यह सोच कर की भीड़ में किसी का कुछ खो तो नहीं गया 

इसलिए हस्तक्षेप करते हुए पूछा - “क्या हो रहा है यहाँ…,

कोई परेशानी ?”

                        “ कुछ नहीं जी .., ज्ञान बँट रहा है ।” -

खड़े हुए समूह में से बेजार भाव से किसी की अभिव्यक्ति 

अभिव्यक्त हुई ।

                   

                                ***






Monday, August 15, 2022

“स्वतन्त्रता दिवस”


15 अगस्त …, राष्ट्रीय उत्सव .. राष्ट्रीय ध्वज..,  राष्ट्रगान.., देशभक्ति गीत.., स्कूलों के दिन । कभी कार्यक्रमों में सहभागी

बन तो कभी सहयोगी बन भाग लेने के दिनों की स्मृतियाँ .., 

साँसों बीच बसी है ।

          इस अविस्मरणीय दिन को माँ भारती के अमर शहीद 

नर - नारी जिनकी क़ुर्बानियों और अथक प्रयासों से हमें स्वतंत्रता मिली उनको नमन करते हुए हम सम्पूर्ण देशवासी 15 अगस्त

के दिन राष्ट्र के उत्थान और स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखने के संकल्प के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं ।आइए हम सब अपने राष्ट्र  के गौरवपूर्ण इतिहास की स्मृतियों को संजोये गुनगुनाएँ  मुस्कुरायें । Happy Independence Day.

  सभी विज्ञ साथियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई ।         


                          जय हिन्द ! जय भारत !

Tuesday, July 19, 2022

“सावन”


सावन के आते ही रिमझिम बारिश के साथ तीज-सिंधारा

 पर्व , जगह जगह पेड़ों पर पड़े झूले  और माँ का चेहरा

 स्मृतियों में साकार हो उठता है उस समय लहरियों के कपड़ों के साथ मेहन्दी की महक एक अलग सा समां बाँध देती थी सावन 

माह में । तब मैं इतनी बड़ी नहीं थी या फिर समझ नहीं थी कि 

माँ से कभी फ़ुरसत में यह सवाल करूँ  कि - “ आप कितना 

प्यार करती हो मुझे ।”

मेरा यह प्रश्न पूछना और माँ से उत्तर पाना शायद समय की 

लकीरों में नहीं था मगर उन्हीं लकीरों में वो पल ज़रूर निहित  थे जिनमें रिमझिम बारिश के साथ माँ की वात्सल्य युक्त स्मृतियाँ 

दिल की ज़मीन को हर सावन में भिगोये रखतीं हैं ।

            माँ की ममता की गागर मेरे लिए पहली बार मैंने तब छलकती अनुभव की जब बड़े प्यार से उन्होंने झूले पर बैठाते हुए 

मुझे सतर्क किया “डोर कस कर पकड़ना ।” झूले पर बैठते ही दूसरी लड़की ने जैसे ही पेंग बढ़ाने को पैरों से जोर लगाया मेरा कलेजा डर के मारे बाहर और मेरी चीख से पहले माँ जोर से चिल्लाईं -“झूला रोको ।” 

झूले से मुझे उतार कर गले लगा आँसू पोंछते हुए हैरानी से माँ ने पूछा - “तुझे डर लगता है झूले से..!”  मेरे बालमन को अपनी 

हमउम्र लड़कियों के बीच शर्मिंदगी भी महसूस हो रही थी अपने डरपोक होने पर …, सो सफ़ाई देते हुए मैंने कहा - “हाथ से डोर छूट रही थी ।” घर आने पर भाई ने हँसी उड़ाई -

“डरपोक कहीं की ।”

    अगले दिन स्कूल से आई तो आँगन में बल्लियों के आधार पर स्कूलों के मैदानों जैसा झूला मानों इन्तज़ार कर रहा था मेरा । 

मैं विस्फारित नज़रों से झूले को निहार रही थी कि पीछे से माँ की खनकती आवाज़ सुनाई दी -“धूप ढलने दे…,धीरे-धीरे झूलना ।

जब झूले पर बैठेगी तो डोर पर हाथों की पकड़ अपने आप 

मज़बूत होती चली जाएगी ।” मानो वह अपनी लाडली को 

किसी भी क्षेत्र में कमजोर नहीं देखना चाहती थी ।

                 माँ नहीं रहीं और न ही झूले वाला आँगन रहा , बस यादें हैं  जो आज भी सावन की रिमझिम बरसती बूँदों के रूप में टिपर..,टिपर..,टापुर..,टापुर.., करती मनमष्तिक के कपाटों पर दस्तक देने लगती हैं ।

                                     ***

Friday, July 1, 2022

वैश्विक धरोहर



दुनिया में बहुत से ऐसे पुल हैं जिनको बनाने वाले इंजीनियरों की तारीफ़ सभी करते हैं ।उनकी खूबसूरती और मज़बूती की 

चर्चाएँ भी अक्सर हुआ करती है । गोल्डन गेट ब्रिज, सनफ्रांसिस्को, यूनाइटेड स्टेट्स , टॉवर ब्रिज, लंदन, इंग्लैंड और सिडनी 

हार्बर ब्रिज, सिडनी, ऑस्ट्रेलिया ऐसे ही विश्व प्रसिद्ध पुलों के उदाहरण हैं ।

            भारत में भी एक ऐसा ब्रिज है जो अपने आप में अद्भुत है इस पुल की खास बात ये है कि यह पेड़ की जड़ों बना हुआ है  । 

यह पुल पेड़ों की जिंदा जड़ों से धागे की तरह बुनकर बनाया 

गया है । मेघालय की खासी और जयंतिया जनजाति के लोगों 

को यह कला सदियों से अपने पूर्वजों द्वारा विरासत में मिलती 

चली आ रही  है ।चेरापूंजी में इन्हीं लोगों द्वारा बनाये गये 

डबल डेकर पुल को यूनेस्को द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज साइट भी 

घोषित किया हुआ है ।

                   कहते हैं ये पुल रबर के पेड़ की जड़ों से बनते हैं 

एक पुल को सही आकार देने में दस से पन्द्रह साल तक 

लग जाते हैं  ।ये पुल घने जंगलों में नदियों के ऊपर आवाजाही 

के लिए बनाए जाते हैं ।खासी-जयंतिया जनजाति के वंशज 

अपनी प्राचीन  कला कौशल को संरक्षित रखने के साथ-साथ सीमित संसाधनों में आत्मनिर्भर जीवन यापन का अनूठा 

आदर्श प्रस्तुत करते हैं ।


विटप सेतु ~

वैश्विक धरोहर

मेघालय में ।

Friday, June 17, 2022

“बढ़ता तापमान बदलता जीवन”

जलवायु परिवर्तन मौसमी दशाओं में  आए उस परिवर्तन को कहते हैं  जिसका प्रभाव सम्पूर्ण प्रकृति पर दृष्टि गोचर होता

 है । सामान्यतः इन परिवर्तनों का अध्ययन पृथ्वी के इतिहास को बाँट कर किया जाता है। जलवायु की दशाओं में यह  परिवर्तन प्राकृतिक होने से अधिक मानव के क्रियाकलापों

 का परिणाम अधिक लगता है ।

                    बढ़ते तापमान के लिए संयुक्त राष्ट्र ने भी चेतावनी दी है कि - “ग्लोबल वार्मिंग तेज हो रही है और इसके लिए साफ़ तौर पर मानव जाति ही ज़िम्मेदार है. इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पृथ्वी की औसत सतह का तापमान, साल 2030 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा।”

             मौजूदा हालात को देखते हुए इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस शताब्दी के अंत तक समुद्रों और महासागरों का जलस्तर बढ़ सकता है । बढ़ते तापमान

 के कारण हिमग्ले़शियरों का पिघलना ,धरती पर बाढ़ों की संख्या में बढ़ोतरी के साथ तूफ़ानों  की संख्या में वृद्धि  होना और मौसम मे भारी बदलाव जैसे :-  सर्दियों में अधिक सर्दी,गर्मी में अत्यधिक गर्मी और वर्षा का अधिक या अल्प मात्रा में होना निश्चित  है ।

              वैज्ञानिकी तरक़्क़ी और औद्योगिक क्रांति की सफलताओं के बीच प्रकृति की अनदेखी करना मानव के स्वयं के अस्तित्व के साथ साथ पृथ्वी के अस्तित्व के लिए भी संकट का विषय है ।बढ़ते शहरीकरण के प्रभाव में जंगलों की अंधाधुंध कटाई और औद्योगिक कल कारख़ानों से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड व अन्य विषैली गैसों के कारण  ग्रीनहाउस इफ़ेक्ट से असामान्य  रूप से तापमान वृद्धि की स्थिति जलवायु की विषमता का प्रमुख  घटक बनती है वही अपनी  सुख सुविधाओं के लिए प्राकृतिक घाटों व पहाड़ी इलाक़ों का क्षरण, बाँधों का निर्माण मानव जाति के लिए खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है जिसके दूरगामी परिणाम निःसंदेह भयावह है । 

         वर्तमान काल में अनियमित वर्षा के कारण हर वर्ष बाढ़ों की त्रासदी, चक्रवाती तूफ़ानों के कारण अपार जन-धन हानि, थार प्रदेश का विस्तार , पेयजल की मात्रा में भारी कमी और कठोर जल की बढ़ती समस्या के बाद भी पर्यावरण संतुलन की उपेक्षा मानव के लिए चिन्ताजनक है । बुद्धिजीवी मानव प्रजाति को अपनी आगामी पीढ़ियों  के चहुँमुखी उत्थान और उज्जवल भविष्य के लिए प्रकृति के संवर्द्धन हेतु इस तरह 

के प्रयास करने होंगे जिनके सफल क्रियान्वयन पर ब्रह्माण्ड के

दुर्लभ ग्रह पृथ्वी पर जीव जगत का जीवन सुरक्षित रह सके ।


                                  ***

स्रोत :-

[ भौगोलिक जानकारी पर आधारित ]

 प्रकृति दर्शन- जून अंक में प्रकाशित 


Saturday, June 4, 2022

“सर्वे”


पिछले तीन घण्टे से स्नेहा अपने दो सहयोगियों के साथ 

तपती धूप में फाइल थामे कभी इस दुकान तो कभी उस दुकान,छोटे-मंझोले रेस्टोरेन्टस् में चक्कर लगा रही थी बाल 

श्रमिक सर्वे हेतु बच्चों के नाम सूचीबद्ध करने के लिए । हमेशा 

की तरह आज किसी भी दुकान पर चाय पकड़ाते और कप 

धोते उसे एक भी बच्चा नज़र नहीं आया । धूप में उसका सिर 

तप रह था और आँखों में रोशनी के झपाके लग रहे थे ।गर्मी से सड़कों की स्थिति कर्फ़्यू लगने जैसी थी । प्यास बुझाने के लिए उसने कंधे पर टंगे बैग से पानी की बोतल निकाली तो खाली 

बोतल मानो मुँह चिढ़ा रही थी ।

                  तभी एक सहयोगी ने कहा - “कल का दिन भी है हमारे पास, बाकी का एरिया कल कवर कर लेंगे । आप थक 

गई हैं अभी आपका घर जाना ठीक रहेगा।” उसको भी यही ठीक लगा । आपसी सहमति से तीनों ने कल दोपहर का समय न 

चुनकर सुबह जल्दी आना तय किया । दोनों सहयोगियों ने 

अपनी-अपनी राह ली और वह जैसे ही मुड़ी सामने से रिक्शा 

आता देख ज़ोर से चिल्लाई-“रिक्शा” ! 

                 रिक्शा चालक ने सिर कैप से और मुँह तौलिए से 

ढका था ।रिक्शे के चलने से लू के थपेड़े भी स्नेहा को सुकून 

भरे लगे थोड़ा आराम मिलने पर उसे कदकाठी से रिक्शा चालक किशोर लगा तो उसने पूछा - “कहाँ से हो भाई ! नाम क्या है 

तुम्हारा ?”

        चालक ने पूर्ववत अपना काम करते हुए कहा - “आप

क्या करेंगी जानकर …, मेरी उम्र अट्ठारह साल है । आज 

गली-गली कुछ लोग फ़ाइलें लिए घूम रहे हैं । कहते हैं - 

“बालश्रम अपराध है ।” मज़दूरी नहीं करेंगे तो खायेंगे क्या ? 

हम ग़रीबों के यहाँ तो हर बंदा काम करता है तो ही बसर होती

 है रिक्शे का किराया भी रोज़ाना इसके मालिक को देना होता

 है ।”

            निरुत्तर सी  स्नेहा रिक्शा रूकवा किशोर के हाथ में 

बीस रूपये थमा कर पैदल ही घर की ओर चल पड़ी । चलते 

वक़्त वह श्रमिकों की व्यथा के साथ उस फाइल के बारे में भी 

सोच रही थी जो आते समय वह अपने सहयोगी को दे आई थी।


                                    ***


Saturday, May 7, 2022

“किताबें” [हाइबन]



दिसम्बर की कड़ाके ठंड और उस पर ओस भरी हवाओं के साथ रुकती थमती बारिश…पिछले एक हफ़्ते  से बिछोह की कल्पना मात्र से ही आसमां के साथ मानो बादल भी ग़मगीन हैं ।       

                              जीवन का एक अध्याय पूरा हुआ । दूसरे चरण के आरम्भ के लिए बहुत कुछ छोड़ना है । जिसकी कल्पना 

हर पल छाया की तरह मेरे साथ रही । गृहस्थी के गोरखधंधे भी अजीब हैं  पिछले पाँच सालों से कम से कम सामान रखने के 

फेर में न जाने कितनी ही चीजों को  देख कर अनदेखा करती 

आई  हूँ कि जब इस शहर में रहना ही नहीं तो सामान भी बढ़ाना क्यों ? मगर सामान है कि सिमटने का नाम ही नहीं लेता । 

और अब सब से बड़ी समस्या जो मेरी प्रिय भी है मुँह खोले खड़ी 

है  मेरे सामने वह है मेरी किताबें …, कितनी ही किताबें  संगी 

साथियों को देने के बाद भी मेरे आगे रखी हैं जिनको साथ ले 

जाना या छोड़ कर जाना दोनों ही काम दुष्कर है मेरे लिए ।जान-पहचान  और संगी- साथियों से विदा के समय मेरी प्रतिक्रिया 

कल क्या होगी कल पर छोड़ती हूँ । मगर आज मेरे हाथों बक्से 

में बन्द होती मेरे एकान्तिक क्षणों की  संगिनी अपनी समग्रता के साथ उपालम्भ भाव से जैसे मुझ से सवाल करती  हैं -

बोली अबोली  ~

काहे चली बिदेस

निष्ठुर संगी ।


***