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Friday, June 17, 2022

“बढ़ता तापमान बदलता जीवन”

जलवायु परिवर्तन मौसमी दशाओं में  आए उस परिवर्तन को कहते हैं  जिसका प्रभाव सम्पूर्ण प्रकृति पर दृष्टि गोचर होता

 है । सामान्यतः इन परिवर्तनों का अध्ययन पृथ्वी के इतिहास को बाँट कर किया जाता है। जलवायु की दशाओं में यह  परिवर्तन प्राकृतिक होने से अधिक मानव के क्रियाकलापों

 का परिणाम अधिक लगता है ।

                    बढ़ते तापमान के लिए संयुक्त राष्ट्र ने भी चेतावनी दी है कि - “ग्लोबल वार्मिंग तेज हो रही है और इसके लिए साफ़ तौर पर मानव जाति ही ज़िम्मेदार है. इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पृथ्वी की औसत सतह का तापमान, साल 2030 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा।”

             मौजूदा हालात को देखते हुए इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस शताब्दी के अंत तक समुद्रों और महासागरों का जलस्तर बढ़ सकता है । बढ़ते तापमान

 के कारण हिमग्ले़शियरों का पिघलना ,धरती पर बाढ़ों की संख्या में बढ़ोतरी के साथ तूफ़ानों  की संख्या में वृद्धि  होना और मौसम मे भारी बदलाव जैसे :-  सर्दियों में अधिक सर्दी,गर्मी में अत्यधिक गर्मी और वर्षा का अधिक या अल्प मात्रा में होना निश्चित  है ।

              वैज्ञानिकी तरक़्क़ी और औद्योगिक क्रांति की सफलताओं के बीच प्रकृति की अनदेखी करना मानव के स्वयं के अस्तित्व के साथ साथ पृथ्वी के अस्तित्व के लिए भी संकट का विषय है ।बढ़ते शहरीकरण के प्रभाव में जंगलों की अंधाधुंध कटाई और औद्योगिक कल कारख़ानों से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड व अन्य विषैली गैसों के कारण  ग्रीनहाउस इफ़ेक्ट से असामान्य  रूप से तापमान वृद्धि की स्थिति जलवायु की विषमता का प्रमुख  घटक बनती है वही अपनी  सुख सुविधाओं के लिए प्राकृतिक घाटों व पहाड़ी इलाक़ों का क्षरण, बाँधों का निर्माण मानव जाति के लिए खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है जिसके दूरगामी परिणाम निःसंदेह भयावह है । 

         वर्तमान काल में अनियमित वर्षा के कारण हर वर्ष बाढ़ों की त्रासदी, चक्रवाती तूफ़ानों के कारण अपार जन-धन हानि, थार प्रदेश का विस्तार , पेयजल की मात्रा में भारी कमी और कठोर जल की बढ़ती समस्या के बाद भी पर्यावरण संतुलन की उपेक्षा मानव के लिए चिन्ताजनक है । बुद्धिजीवी मानव प्रजाति को अपनी आगामी पीढ़ियों  के चहुँमुखी उत्थान और उज्जवल भविष्य के लिए प्रकृति के संवर्द्धन हेतु इस तरह 

के प्रयास करने होंगे जिनके सफल क्रियान्वयन पर ब्रह्माण्ड के

दुर्लभ ग्रह पृथ्वी पर जीव जगत का जीवन सुरक्षित रह सके ।


                                  ***

स्रोत :-

[ भौगोलिक जानकारी पर आधारित ]

 प्रकृति दर्शन- जून अंक में प्रकाशित 


Saturday, June 4, 2022

“सर्वे”


पिछले तीन घण्टे से स्नेहा अपने दो सहयोगियों के साथ 

तपती धूप में फाइल थामे कभी इस दुकान तो कभी उस दुकान,छोटे-मंझोले रेस्टोरेन्टस् में चक्कर लगा रही थी बाल 

श्रमिक सर्वे हेतु बच्चों के नाम सूचीबद्ध करने के लिए । हमेशा 

की तरह आज किसी भी दुकान पर चाय पकड़ाते और कप 

धोते उसे एक भी बच्चा नज़र नहीं आया । धूप में उसका सिर 

तप रह था और आँखों में रोशनी के झपाके लग रहे थे ।गर्मी से सड़कों की स्थिति कर्फ़्यू लगने जैसी थी । प्यास बुझाने के लिए उसने कंधे पर टंगे बैग से पानी की बोतल निकाली तो खाली 

बोतल मानो मुँह चिढ़ा रही थी ।

                  तभी एक सहयोगी ने कहा - “कल का दिन भी है हमारे पास, बाकी का एरिया कल कवर कर लेंगे । आप थक 

गई हैं अभी आपका घर जाना ठीक रहेगा।” उसको भी यही ठीक लगा । आपसी सहमति से तीनों ने कल दोपहर का समय न 

चुनकर सुबह जल्दी आना तय किया । दोनों सहयोगियों ने 

अपनी-अपनी राह ली और वह जैसे ही मुड़ी सामने से रिक्शा 

आता देख ज़ोर से चिल्लाई-“रिक्शा” ! 

                 रिक्शा चालक ने सिर कैप से और मुँह तौलिए से 

ढका था ।रिक्शे के चलने से लू के थपेड़े भी स्नेहा को सुकून 

भरे लगे थोड़ा आराम मिलने पर उसे कदकाठी से रिक्शा चालक किशोर लगा तो उसने पूछा - “कहाँ से हो भाई ! नाम क्या है 

तुम्हारा ?”

        चालक ने पूर्ववत अपना काम करते हुए कहा - “आप

क्या करेंगी जानकर …, मेरी उम्र अट्ठारह साल है । आज 

गली-गली कुछ लोग फ़ाइलें लिए घूम रहे हैं । कहते हैं - 

“बालश्रम अपराध है ।” मज़दूरी नहीं करेंगे तो खायेंगे क्या ? 

हम ग़रीबों के यहाँ तो हर बंदा काम करता है तो ही बसर होती

 है रिक्शे का किराया भी रोज़ाना इसके मालिक को देना होता

 है ।”

            निरुत्तर सी  स्नेहा रिक्शा रूकवा किशोर के हाथ में 

बीस रूपये थमा कर पैदल ही घर की ओर चल पड़ी । चलते 

वक़्त वह श्रमिकों की व्यथा के साथ उस फाइल के बारे में भी 

सोच रही थी जो आते समय वह अपने सहयोगी को दे आई थी।


                                    ***