Copyright

Copyright © 2026 "आहान"(https://aahan29.blogspot.com) .All rights reserved.
Showing posts with label लघुकथा. Show all posts
Showing posts with label लघुकथा. Show all posts

Monday, December 15, 2025

“गुलाब की टहनी”

चकले और बेलन के बीच आटे की लोई आकार ले रही थी  और हाथ चलाती नवविवाहिता पूर्णिमा खोई थी अपनी कल्पनाओं के संसार में , जहाँ अनगिनत सपनों में से कोई एक आकार लेने के लिए प्रयासरत था ।

-“कहाँ ध्यान है तुम्हारा !  दूध उबल कर नीचे गिर रहा है ? तवा खाली पड़ा है जब दो काम एक साथ नहीं होते तो कम से कम एक तो ढंग से कर लो ।” जेठानी ने गैस की नोब बंद करते हुए उसे लगभग झिड़क ही दिया ।

- “सॉरी दी ! आगे से ध्यान रखूँगी” सकपकाते हुए पूर्णिमा कल्पना लोक से यथार्थ लोक में आ गिरी ,जल्दी से चपाती सेक कर उसने जैसे ही चपाती को घी लगाने के लिए चम्मच कटोरी में डुबोई तो पुन:हिदायत गूंजी - “ एक हफ़्ते में एक किलो घी ख़त्म हो जाता है ,चपातियों पर लगाते समय यह भी दूध की तरह बिखेर देती हो क्या?” जेठानी की हँसी पूर्णिमा को गोखरू के काँटे सी चुभी ।

  रोटियों पर घी की मात्रा कम देख कर सास ने ताना मारा -“मायके में घी नहीं देखा होगा, लगाना आए भी तो कैसे ?

   बातों की गंभीरता और नये परिवेश को आत्मसात करने के लिए पूर्णिमा लगभग कामों में डूबी रहती और उसके मस्तिष्क में सक्रिय रहता उसकी कल्पनाओं का जखीरा जो अतीत और वर्तमान के साथ उसको दिन भर व्यस्त रखता ।

     दोपहर के काम समेट कर बालों में कंघी करने के उद्देश्य से वह अपने कमरे की तरफ मुड़ी ही थी कि सास ने पीछे से आवाज दी-   पूर्णिमा !

    उसने  मुड़ कर देखा तो उनके हाथ में हरी पत्तियों के बीच मिट्टी में लिपटी गुलाब की टहनी थी और आँखों में खेद भरा अपनापन ।

 -“राह चलती गाय ने मुँह मार दिया गमले में.., लॉन तक पहुँच गई थी गाय ..,बच्चों ने गेट खुला छोड़ दिया होगा बाहर जाते समय । मैं वहाँ पहुँची तब तक उसने गमला तोड़ दिया .., तुमने कितने मन से गमले में  लगाई थी यह ।”

   कोई बात नहीं माँ जी ! बालों की कंघी भूल पूर्णिमा उनके हाथ से मुड़ी-तुड़ी टहनी ले कर लॉन के कोने वाली क्यारी की ओर चल पड़ी,सास भी साथ-साथ थीं बहू के लिए अनायास ही ममत्व उमड़ आया उनके मन में ।

        खुरपी से गड्ढा खोदती पूर्णिमा सास से बोली - “लग जाएगी माँ जी ! गुलाब की टहनी है बस थोड़ा ध्यान मांगती है ।”

        पूर्णिमा की बात सुन कर सास के होंठों पर अर्थपूर्ण मुस्कुराहट खिल उठी वे अपनत्व भरी नजरों से कभी पूर्णिमा के खुरपी चलाते मिट्टी में सने हाथों को तो कभी जमीन पर पड़ी गुलाब की टहनी को निहार रही थीं ।


                                     ***


Wednesday, November 13, 2024

“इज़्ज़त”

आज कामवाली के ना आने से सुबह -सुबह रीना के बच्चों को स्कूल और पतिदेव को ऑफ़िस भेजते - भेजते पैर फिर गए थे । तरोताज़ा होने के लिए वह चाय बनाने के लिए रसोई की तरफ मुड़ी ही थी कि दीपावली पर एक हफ्ते की छुट्टी आई ननद दीपा मुस्कराती हुई दो प्याली चाय और नाश्ते की ट्रे थामे रसोई से बाहर आती हुई बोली - “चलो भाभी अब थोड़ा खा लो !  भैया और बच्चों के आने से पहले आज बाक़ी के काम पूरे कर के बाज़ार से दीपक व रसोई का कुछ सामान ले आएँ ।”

               उसका वाक्य पूरा हुआ ही था कि “डोर-बेल” घनघना उठी । ट्रे डाइनिंग टेबल पर रख आगे बढ़ गेट खोला तो सामने भाभी की मित्र खड़ी थी । भाभी और उसकी सहेली को बतियाने के लिए छोड़ दीपा रसोई में ट्रे लेकर घुस गई,एक नाश्ते की और प्लेट लगाने और दो कप चाय को तीन कप चाय में बदलने के लिए । वापसी पर दीपा ने देखा दोनों किसी गंभीर चर्चा में व्यस्त थी ।दीपा ने उन से दूर बैठना बेहतर समझा ।           

   -“अच्छा भाभी ! चलती हूँ.., इनको सोया छोड़ कर आई थी रात में खाना भी नहीं खाया था ।सोचा जल्दी से सब्ज़ी ले आती हूँ । किसी से न कहना भाभी !आपसे मन मिलता है तो जी हल्का हो जाता है, कह-सुनकर ।” व्यस्त भाव से कहते हुए उसने रीना से विदा ली ।

        “ क्या हुआ भाभी ? आपकी फ्रेंड बड़ी परेशान लग रही थी ।” “कुछ नहीं…। उसकी ननद रजनी की लड़की कल कॉलेज से घर नहीं लौटी । शाम के बाद बाद इन लोगों ने टोह-भाल की तो साथ वाले शहर के रेलवे-स्टेशन पर टिकट खरीदते मिले दोनों ।”

      पूरी बात सुनने के बाद वह रोष में भर उठी - “अपने घर की उड़ाने में इसको थोड़ी सी शर्म भी नहीं आई ।ढिंढोरा पीटने के लिए चली आई सुबह-सुबह .. कैसी औरत है यह ।”, उसका भाषण पूरा होता और भाभी कुछ कहती अपनी मित्र के पक्ष या  विपक्ष में  कि फिर से डोर-बेल बज उठी.., भाभी ने जैसे ही गेट खोला बगल के फ्लैट वाली सोना भाभी सब्ज़ी का थैला लिए खड़ी थी - पता है कल रजनी की लड़की भाग गई …, रजनी की भाभी मिली थी सब्ज़ी मंडी में । बेचारी बहुत परेशान थी ।” दुपट्टे से पसीना पोंछते हुए वह आगे निकल गईं । कुछ क्षणों के अंतराल पर दीपा के कानों में गेट का ताला खुलने की आवाज़ के साथ उनकी फिर से आवाज़ आई -

-   “प्लीज़ आप मत कहना किसी से.., किसी की इज़्ज़त का सवाल है ।”

                                        ***

Sunday, June 9, 2024

“सपने और उम्मीद”

सपने”


सपने देखना बुरी बात नही.., गहरी नींद के सपने जागती आँखों के सपने । कई  बार सपने की अनुभूति ताजे गुड़ 
की मिठास सी होती है  । 
            कई बार टूटे काँच की कीर्चियों सी बिखर जाती हैं अन्तर्मन के आस-पास और टीस पैदा करती हैं जिनका अहसास पूरा दिन और कई बार तो कई दिनों तक बना रहता है । अन्तर्मन पर चादर के समान लिपटी सपनों की अनुभूतियाँ धीरे-धीरे ही धूमिल हो पाती हैं  । सोचती हूँ  यह भी ठीक है - कल्पना से यथार्थ में आने में वक़्त तो लगता ही है ।

                                   ***
“उम्मीद”


मौसम विभाग के अनुसार मानसून अच्छा है अब की 
बार। पानी की आवक बढ़ने से नदियों और तालाबों में  कछुओं , बड़ी मछलियों के साथ छोटी मछलियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है ।मानसून अच्छा है तो वर्षा भी अच्छी होगी वर्षा अच्छी होने से  भूमि की उर्वरा शक्ति में भी अभिवृद्धि होगी ।वैसे दुनिया में उम्मीद पर सब कुछ 
क़ायम है और उम्मीद यही है कि इस बार शक्ति -सन्तुलन 
बना रहेगा ।


                                          ***

Sunday, December 17, 2023

“दहलीज़”


                                 

अक्सर वे व्यस्तता की दहलीज़ पार कर वक़्त को छलावा देकर फोन पर अपने -अपने दुख- सुख साझा करती हैं और ऐसा करते-करते भूल जाया करती हैं वक़्त को । उस वक़्त.., वक्त ही कहाँ होता है उनके पास कि वे वक्त को याद करें । कभी-कभी तो अवसर मिलता है उन्हें अपने आपको रिक्तता की सरहद पर खड़े हो कर खुद को पहचानने के लिए ।

      कितनी ही स्मृतियों की गठरियाँ .., स्मृतियों की अटारियों में से  धूल और जालों के बीच से निकाल कर वे उन्हें खोलती हैं और कड़वे-मीठे पलों को आज और कल के साथ जीते हुए कभी बेलौस हँसती हैं तो कभी स्वर अवरुद्ध भी कर बैठती हैं  । अपनेपन की संजीवनी को आँचल में समेट कर दुबारा मिलने का वादा करके लौट जाती हैं अपनी -अपनी सीमाओं में,जहाँ उनका अपना-अपना संसार हैं ।कमाल की बात यह है कि सब कुछ भरा-भरा होने के बावजूद भी रिक्तता का खाली कोना कहीं शेष रह जाता है ।जो वे गाहे-बगाहे इस फ़ुर्सत नाम की दहलीज़ पर आकर भरती हैं ।


                                                  *** 

Thursday, May 11, 2023

“अख़बार”

गेट में घुसते ही अफरा-तफ़री का माहौल देख उसका माथा ठनका और वह मन ही मन बुदबुदाई - “देर तो नहीं हुई ..,ना ही कोई इंस्पेक्शन होने वाला था आज ।”

अजीब सा तनाव महसूस करती हुई वह ऑफिस में घुसी कि हेड ने उससे सवाल किया- “आज का अख़बार देखा ?” 

 -“नहीं मैम ! सुबह-सुबह भाग-दौड़ में कई बार हैडिंग देखनी ही मुश्किल हो जाती है..,न्यूज़ पेपर की बारी छुट्टी के बाद शाम की चाय के साथ ही आती है ।” अभिवादन के साथ उसने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया और उन्हें व्यस्त देख सिग्नेचर के बाद पेन को उँगलियों के बीच घुमाती हुई स्टाफ़ रूम की तरफ़ बढ़ गई । 

                   वहाँ उसे अपने दो-चार साथी  किसी गंभीर चर्चा मे व्यस्त लगे । उन्हीं के बीच जगह बनाती वह दीवार से लगी अपनी आलमारी की ओर बढ़ी लेकिन हेड की बात और टेबल पर पड़े पेपर ने उसके कदम रोक दिए  ।  जिज्ञासा से उसने पन्ने पलटने आरम्भ किये ही थे कि एक पेज पर छपी फोटो देख कर वह सन्न रह गई ।

 कॉलम का शीर्षक और अंदर छपे शब्दों के साथ उसके लिए  सहयोगियों के संवाद भी कानों में पड़ी कई दिन पूर्व  की आवाज़ों की धमक में गौण होते चले गए । 

     - “आगे रेगुलर पढ़ाने के लिए घर वाले तैयार नहीं हैं मैम ! खुद तो गई सो गई घर की बाकी लड़कियों के रास्तों में काँटे बो गयी वीरां । घर की लड़कियाँ पढ़ना चाहेंगी तो  प्राइवेट ही पढ़ सकेंगी अब ।” टीसी के लिए एप्लिकेशन उसे थमाते हुए महिला  ने डबडबाई आँखों के साथ भरे गले से कहा था ।

            - “पता नहीं क्यों किया उसने ऐसा..,लड़की तो बहुत अच्छी और होशियार थी ।”  महिला के हाथ से पानी का  ख़ाली ग्लास  ट्रे में रख वहाँ से निकलती बाईजी बोलीं ।

        हाथ में पकड़े अख़बार में वीरां की खिलखिलाती तस्वीर देख उसकी आँखें छलछला उठीं ।

      

                                       ***

Thursday, December 8, 2022

“धुआँ”

 


राधिका शाम को अक्सर छत पर चली आती है । सांझ के तारे 

को देखने के साथ पास-पड़ौस के घरों से उठता धुआँ देखना उसे 

बड़ा भला लगता है । वह अनुमान  लगाया करती है कि कौन से घर 

में सबसे पहले खाना बनना शुरू होगा । उसकी सहपाठिन सहेलियाँ क्या कर रही होंगी अपने घरों में । वह दो दिन से देख रही थी श्यामा काकी के घर से किसी तरह की सुगबुगाहट नहीं थी ।कल स्कूल से आते वक़्त उनके घर का दरवाज़ा भी खुला देखा मगर सांझ के समय उठता धुआँ  नहीं देखा छत की मुँडेर थामे वह यह सोच ही रही 

होती है कि माँ की आवाज़ आती है - “अब आ भी जा नीचे., 

अंधेरा हो रहा है !” 

-  “आई माँ !” कहते हुए वह सीढ़ियों से फुर्ती से उतर कर माँ के आगे आ खड़ी हुई ।

- “ स्वेटर पहन ले ! तेरा नया कार्डिगन बन गया , देखूँ तो कैसा लग रहा है ।रोज पूछती है कब पूरा होगा और आज बन कर तैयार हो 

गया तो एक बार भी नहीं पूछा ।” माँ की बात पूरी होती उससे पूर्व राधिका गाजरी रंग के कार्डिगन में माँ के आगे फिर से आ खड़ी हुई ,चमकती आँखों से वह मानो माँ से पूछ रही थी -“कैसी लग रही 

हूँ माँ !” 

   - “खाने में क्या बना रही हो माँ.., भूख लगी है जोर से ।” 

नमकीन चावल …, छत पर खड़ी थी तब नहीं लगी ।” मुस्कुराती हुई माँ बोली और गोभी , आलू काटने के लिए स्वयं के आगे और मटर की टोकरी के साथ प्याला उसकी ओर बढ़ा दिया मटर छिलने के लिए । 

अचानक उसे जैसे ही कुछ याद आया छिले मटर के दाने प्याले में डालते हुए बुदबुदा उठी -“ माँ श्यामा काकी है तो यही मगर उनके 

घर से धुआँ नही उठ रहा शायद उनके घर गैस का कनेक्शन लग 

गया है ।”

 उसकी बात सुनते ही माँ की आँखें सोच में डूब गईं और वे गहरी साँस लेते हुए उठी -  “जहाँ बिजली के कनेक्शन की बात दूर की कौड़ी हो वहाँ गैस कनेक्शन की बात करती है लड़की !” कहने के साथ ही उन्होंने छिले आलू और गोभी पानी में डाले और राधिका से कहा -मेरे साथ चल ।”

        थोड़ी देर बाद  तौलिए से ढकी अनाज की भरी बाल्टी और भगौने भर आटे के साथ चिन्ता में डूबी माँ के साथ  गाजरी कार्डिगन की जेबों में हाथ डाले चलती राधिका नमकीन चावल की बात भूलकर श्यामा काकी के घर की ओर कदम बढ़ाते हुए खुश थी कि कल शाम छत पर सांझ के तारे के साथ उनके घर से उठता 

धुआँ देख सकेगी ।

                                 ***

Tuesday, November 8, 2022

“मंदी”



- “कैसे हो ? बहुत दिन हुए तुमसे बात नहीं हुई ?

हाल - चाल.., ठीक -ठाक ?” आदित्य के फ़ोन उठाते ही दूसरी ओर से उसके मित्र अनुज ने कुशल - क्षेम पूछी ।

   आदित्य - “सब कुछ ठीक -ठाक मगर न जाने क्यों .., आजकल सूरज की रोशनी में नहाई  SNN की झील में पड़ती परछाई और उसमें तैरते पक्षी मन में ऊर्जा नहीं भरते । सड़क पर दौड़ती गाड़ियों की तरह मन में विचारों का ट्रैफ़िक जाम सा रहता है । तुम सुनाओ.., तुम्हारे क्या हाल है?”

      “फॉल्सम आजकल अपना नही बेगाना लगने लगा है 

आदित्य ! चारों ओर बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों  को खा रही 

हैं ।” उधर से आती आवाज गहरी हो गई ।

         फ़ोन डिस्कनेक्ट नहीं हुए मगर दोनों के बीच  संवाद का स्थान नीरवता ने ले लिया और चिन्ता में डूबी उनकी सांसें  मानो वार्तालाप में सेतु का काम कर रही थीं । सुरसा के मुँह सरीखी फैलती महंगाई के बीच “आर्थिक मंदी” की भयावहता की सुनामी उनके बीच पसरी पड़ी थी ।


    

                                   ***





Friday, October 7, 2022

“फैशन”



-“आज तेरी एक चोटी बना देती हूँ .., अभी बहुत काम पड़े 

हैं ।”  कान पर कंघी रखे माँ रेवा की चोटियाँ खोलती हुई व्यस्त भाव से कहती हैं ।

          “नहीं.., दो चोटी और वह भी झूले वाली जो इन्टरवल में सीनियर्स खोल न सके । स्केल से नापती हैं चोटी और पूछती हैं क्या खिलाती हैं तेरी माँ ? तेल कौन सा..,शैम्पू का नाम ..,और देर हो जाएगी तो प्रीफेक्टस रोक लेंगी प्रेयर हॉल के बाहर .., फैशन बना के आती है लम्बे बाल हैं  तो .., टीचर की डॉंट अलग से।  कम्पलसरी है गुँथी चोटियाँ ।” 

         रेवा कटर से पेन्सिल छिलती हुई एक साँस में बात पूरी करने की कोशिश कर ही रही होती है कि माँ बालों में कंघी चलाती हुई कहती हैं -  अच्छा बाबा ! साँस ले ले …, अभी आधा घण्टा बाकी है दस बजने में .., पहुँच जाएगी स्कूल ।”

       “ओय रेवा ! दस मिनट बचे हैं दस बजने में.., चल भागते हैं जल्दी से नहीं तो लेट हो जाएगी ।” भाई की आवाज़ से उसकी तन्द्रा टूटी और आईने के सामने कंघी रख वहाँ रखा हेयर बैंड बालों पर डालते हुए उसने जल्दी से कंधे पर बैग डालते हुए कमरे का गेट बन्द किया ।

                 रोटी बनाते हाथों पर लगा रह गया आटा खुरच कर अंगुलियाँ झटकती रेवा आंगन से गुजरते हुए आँखों में आया पानी भी उतनी ही निर्ममता और लापरवाही से झटक देती है जब चाची को दादी से यह कहते सुनती है - “लड़की के पर निकल आए हैं .., फैशन में डूब कर कैसे छोटे छोटे बाल करवा आई है लड़कों सरीखे । बिना रोक -टोक बच्चे हाथ से निकल जाते हैं ।”


                                    ***

Monday, August 29, 2022

“ज्ञान”

                        राजस्थान राज्य में शेखावाटी इलाके के झुन्झुनूं जिले से 70 कि॰मी॰ दूर आड़ावल पर्वत की घाटी में बसा एक सुरम्य तीर्थ स्थल लोहार्गल है । जिसका शाब्दिक अर्थ “वह स्थान जहाँ लोहा गल जाए” है ।

          भाद्रपद मास में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से अमावस्या तक प्रत्येक वर्ष लोहार्गल के पहाड़ों में हज़ारों नर-नारी 24 कोस की पैदल परिक्रमा का आरम्भ सूर्य कुंड में स्नान कर आरम्भ करते हैं । पहाड़ी क्षेत्र और हरियाली से भरपूर औषधीय गुणों से युक्त पेड़-पौधों से आती शुद्ध-ताजा हवा और  ट्रैकिंग का यहाँ अपना ही आनंद है।

                       भूमि भी प्रकृति के सानिध्य के मोह में अपने रिश्तेदारों के साथ यहाँ चली आई है यह सोच कर कि वह कुछ समय रूक कर शाम तक घर लौट आएगी ।यहाँ के मंदिरों के शिलालेखों को पढ़ते हुए भूमि की तन्द्रा तब टूटी जब उसके 

साथ आया समूह “भूमि .., भूमि ” आवाज़ देकर उसे बुला रहा 

था ।

           “चल स्नान करने ।” किसी ने यह कहते हुए उसका हाथ खींचते उसे चलने को कहा तो उसने वह स्थान देखा 

जहाँ झीलनुमा सरोवर में  असंख्य स्त्री-पुरूष डुबकियाँ लगा रहे थे बहुत से लोग दर्शक बन आनंद विभोर थे और सुरक्षा के लिए

तैनात महिला - पुरूष पुलिसकर्मी मुस्तैदी से अपने ड्यूटी पर 

तैनात थे ।

 -  “मुझे नहीं खानी कोई डुबकी-वुबकी ..,भूमि ने दृढ़ता से जवाब दिया ।”

-  “यहाँ आकर भला बिना स्नान के कोई जाता है सब पाप गल जाते हैं तीर्थ स्नान से ।पाण्डवों की बेड़ियाँ भी गल गई थी।पहाड़ों  में गोमुख से निकलता पानी बड़ा निर्मल और पवित्र है ।”

 चौबीस कोसी परिक्रमा के लिए सिर पर थैला धरे एक महिला श्रद्धालु ने भूमि को समझाया । 

“ मगर हम इस निर्मल और पावन जल को पी कर पावन क्यों 

नहीं होते । पहाड़ से निकलता निर्मल और शुद्ध जल पीने के लिए

बहुत अच्छा है ।” - उसने अपनी बात रखने की कोशिश  की ।

                     आपसी विमर्श के दौरान किसी सुरक्षाकर्मी ने 

यह सोच कर की भीड़ में किसी का कुछ खो तो नहीं गया 

इसलिए हस्तक्षेप करते हुए पूछा - “क्या हो रहा है यहाँ…,

कोई परेशानी ?”

                        “ कुछ नहीं जी .., ज्ञान बँट रहा है ।” -

खड़े हुए समूह में से बेजार भाव से किसी की अभिव्यक्ति 

अभिव्यक्त हुई ।

                   

                                ***






Saturday, June 4, 2022

“सर्वे”


पिछले तीन घण्टे से स्नेहा अपने दो सहयोगियों के साथ 

तपती धूप में फाइल थामे कभी इस दुकान तो कभी उस दुकान,छोटे-मंझोले रेस्टोरेन्टस् में चक्कर लगा रही थी बाल 

श्रमिक सर्वे हेतु बच्चों के नाम सूचीबद्ध करने के लिए । हमेशा 

की तरह आज किसी भी दुकान पर चाय पकड़ाते और कप 

धोते उसे एक भी बच्चा नज़र नहीं आया । धूप में उसका सिर 

तप रह था और आँखों में रोशनी के झपाके लग रहे थे ।गर्मी से सड़कों की स्थिति कर्फ़्यू लगने जैसी थी । प्यास बुझाने के लिए उसने कंधे पर टंगे बैग से पानी की बोतल निकाली तो खाली 

बोतल मानो मुँह चिढ़ा रही थी ।

                  तभी एक सहयोगी ने कहा - “कल का दिन भी है हमारे पास, बाकी का एरिया कल कवर कर लेंगे । आप थक 

गई हैं अभी आपका घर जाना ठीक रहेगा।” उसको भी यही ठीक लगा । आपसी सहमति से तीनों ने कल दोपहर का समय न 

चुनकर सुबह जल्दी आना तय किया । दोनों सहयोगियों ने 

अपनी-अपनी राह ली और वह जैसे ही मुड़ी सामने से रिक्शा 

आता देख ज़ोर से चिल्लाई-“रिक्शा” ! 

                 रिक्शा चालक ने सिर कैप से और मुँह तौलिए से 

ढका था ।रिक्शे के चलने से लू के थपेड़े भी स्नेहा को सुकून 

भरे लगे थोड़ा आराम मिलने पर उसे कदकाठी से रिक्शा चालक किशोर लगा तो उसने पूछा - “कहाँ से हो भाई ! नाम क्या है 

तुम्हारा ?”

        चालक ने पूर्ववत अपना काम करते हुए कहा - “आप

क्या करेंगी जानकर …, मेरी उम्र अट्ठारह साल है । आज 

गली-गली कुछ लोग फ़ाइलें लिए घूम रहे हैं । कहते हैं - 

“बालश्रम अपराध है ।” मज़दूरी नहीं करेंगे तो खायेंगे क्या ? 

हम ग़रीबों के यहाँ तो हर बंदा काम करता है तो ही बसर होती

 है रिक्शे का किराया भी रोज़ाना इसके मालिक को देना होता

 है ।”

            निरुत्तर सी  स्नेहा रिक्शा रूकवा किशोर के हाथ में 

बीस रूपये थमा कर पैदल ही घर की ओर चल पड़ी । चलते 

वक़्त वह श्रमिकों की व्यथा के साथ उस फाइल के बारे में भी 

सोच रही थी जो आते समय वह अपने सहयोगी को दे आई थी।


                                    ***


Wednesday, April 27, 2022

"एक कप चाय" (लघुकथा)



दिसम्बर की कोहरे में ठंड से कड़कड़ाती रात और दूर की 

रिश्तेदारी में विवाह । अचानक खबर आई कुछ लोग 

रात भर रुकेंगे उनके यहाँ.. बरसों बाद मिले सगे-सम्बन्धियों

 में जब बातें शुरू होती हैं तो थमती कहाँ हैं और समय

 ठंड का हो तो गर्म चाय के साथ गर्मजोशी से स्वागत करना तो बनता ही है।

                चाय बनाने की जिम्मेदारी उसकी थी और बातों के 

दौर के मध्य कुछ कुछ अन्तराल के बाद 'एक कप चाय' की फर्माइश भी आ ही रही थी अतः वह चट्टाई बिछा कर रसोईघर 

में ही बैठ गई ।मेहमान उसके लिए अपरिचित होते हुए भी 

परिचित थे तभी तो साधिकार नाम के साथ बिटिया का संबोधन और साथ ही 'एक कप चाय' की मांग भी कर रहे थे। उन 

परिचितों के बीच एक जोड़ी अपरिचित आँखें और भी थी 

जिनकी मुस्कुराहट कहीं न कहीं उसे असहज करने में सक्षम थी ।

                रात भर के जागरण  के बाद भोर से पूर्व मंदिरों 

की आरती की घंटियों ने प्रभात-वेला होने की सूचना दी कि सभी जाने की तैयारी में लग गए । उसने कमरे की दहलीज पर 

पहुँच कर पूछा---'एक कप चाय और'… । कई स्नेहिल 

आशीर्वाद से भरे ठंडे हाथ उसके ठंडे बालों पर स्वीकृति से 

टिके ही थे कि  कानों में एक आवाज गूंजी --'जी हाँ …,चलते 

चलते एक कप चाय और …, हो ही  जाए।’

              सर्दियाँ हर साल आती हैं और मंदिरों की आरती भी नियत समय पर ही होती  है ।आरती के समय पौ फटने से पूर्व उसकी दिन की शुरुआत  करने की आदत भी वैसे की वैसी

 है । आरती की साथ शंख की आवाज़ सुनते हुए उसके अभ्यस्त  हाथ भाप उड़ाती चाय की प्याली को उठा कर ठंड से सुन्न पड़ी अंगुलियों में गर्माहट महसूस करते हुए  होठों से लगा लेते हैं .., 

और  दिमाग़ में अतीत दस्तक देते हुए  कहता है - “एक कप 

चाय और….।”


                                  ***

           

Thursday, April 7, 2022

एक फैसला ऐसा भी…,


घर के आँगन में नीम के पेड़ के नीचे कुछ लोग दरी पर तो कुछ चारपाई पर बैठे थे । एक कोने में घूंघट निकाले सात-आठ औरतें थी । हुक्के की गुड़गुड़ाहट और विचार-विमर्श के बाद उनमें से 

एक गंभीर आवाज़ उभरी - “नाथूराम तुम क्या चाहते हो ?”

             परेशान नाथूराम ने गंभीरता से गर्दन झुकाए हुए कहा - “समधी रामलाल सा और समधन जी कहते हैं कि सन्तोष से भारी चूक हुई है । पूरा एक दिन गायब रही ,पुलिस की गाड़ी घर छोड़कर गई है हम नहीं रखेंगे सन्तोष को । अब आप ही बताओ मैं ग़रीब आदमी अपनी इज़्ज़त कैसे बचाऊँ । बच्ची है जी ! पहली बार निकली थी घर से ।” कहते कहते नाथूराम की आँखें भर आई।

         नाथूराम की बात पूरी होते ही रामलाल ने आवेश में 

आ कर कहा - “हम क्या जाने पहली बार निकली है या आदत है। बिरादरी में हमारी भी इज़्ज़त है कैसे रख ले हम इसको।”

          तभी घूँघट मे रोती नाथूराम की पत्नी अपनी बेटी को दोहत्थड़ जड़ते हुए चिल्लाई - “करमजली ! सास थी तेरी

 दो लात मार भी दी तो मर तो नहीं गई थी तू ! घर से बाज़ार तो कभी गई नहीं , सकूल का मुँह माथा देखा नहीं और चल पड़ी 

सीधी दिल्ली ।”

     आँगन का वातावरण पहले से भी ज़्यादा भारी हो गया ।  बड़े बुजुर्गों में से एक बन्दे ने कहा - देखो समधी सा ! अब आपका हमारा जमाना तो रहा नहीं…,समधन सा को अपनी बहू पर हाथ नहीं उठाना था ।” 

-“काम की न काज की दुश्मन अनाज की” सिर पर धर के नाचती इसको .. ,कोई काम शऊर से तो करती नहीं ।” पहली बार समधन सा के मुँह से तानों के रूप में फूल झरे ।

               -  “आप क्या बोलते हो कंवर सा ! कोई रास्ता दिखता है तो कुछ तो कहो ।” नाथूराम ने कातर भाव से दामाद की ओर देखा ।

       -“बोलना  क्या है ? वो पत्नी है मेरी .., मेरे पास आ रही थी । रास्ता भटक गई क्योंकि आपने उसे रास्ता दिखाया ही नहीं ।एक काम करो …, आप सब आराम से चाय-पानी

 पीयो । मेरी बस का समय हुआ  जा रहा है । चल सन्तोष !  चार बजे की बस है दिल्ली के लिये ।” कहते हुए सन्तोष का पति वहाँ से उठ गया और उसके पीछे सन्तोष भी ।

               निस्तब्धता के बीच हुक्के की गुड़गुड़ाहट गहन चिन्तन में डूब गई और इसी के साथ सभा में सन्नाटा पसर गया ।


                                    *** 

Tuesday, March 22, 2022

“प्रतिदान”




“महीप आप भगत सिंह सर्किल तक छोड़ देना प्लीज…,मैं

आदि को स्कूल छोड़ते हुए ऑफिस निकल जाऊँगी ।” - रश्मि 

ने आदि की टाई की नॉट ठीक करते हुए कहा ।

“मैं नहीं जाऊँगा स्कूल..,” जिद्द करते हुए आदि ठुनक रहा था।

“ऋतु जल्दी करो देर हो जाएगी..,संभालो न इसे । आदि क्या 

हुआ तुम्हें ।” - अपना बैग ठीक करते हुए महीप बोले ।

“बेटे क्या हुआ ? जिद्द मत करो अब की वीकेंड पर तुम्हारी फ़ेवरेट जगह चलेंगे ।”- ऋतु ने मनुहार की।

- “मम्मी वो स्कूल के एक पेड़ में भूत रहता है।लंच में बड़े भईया 

और दीदी लोग हमें बता रहे थे जब हम उधर खेलने गए ।”

            ऋतु बेटे की तरफ मुड़ी और प्यार से समझाते हुए 

बोली  -  “तू तो मेरा बहादुर बच्चा है..ये सीनियर्स शैतान होते 

हैं जो यूं ही तंग करते और डराते हैं ।मेरा शेर बच्चा कोई 

डरता थोड़े ही है ।” ऋतु अपने और आदि के बैग और बॉटल

उठाए उसके साथ बाहर निकली , तब तक महीप गाड़ी स्टार्ट 

कर चुके थे ।

              सर्किल पर गाड़ी से उतर कर जैसे ही माँ - बेटे स्कूल 

की तरफ बढ़ ही रहे थे कि सामने से आते साँड को भागते देख 

कर घबराहट और अफ़रातफ़री ऋतु के हाथ से  आदि का हाथ 

छूट गया । दौड़ती ऋतु ने आदि को स्कूल  के गेट की तरफ भागते देखा जो बच्चों और पेरेंटस की भीड़ में घुस चुका था मगर डर 

और घबराहट से उसके चेहरे की हवाइयाँ उड़ रही थी ।

स्कूल बैग और वॉटर बॉटल आदि को पकड़ा कर ऋतु जैसे 

ही मुड़ी, आदि ने माँ का दुपट्टा खींचा । अब की बार ज्ञान लेने 

की बारी ऋतु की थी आदि बड़ों की तरह  उसे समझा रहा था - 

“ आप यूं डरा मत किया करो ! बहादुर बच्चे की मम्मी हो ,मेरी शेरनी मम्मी !”


                                   🍁🍁🍁