Copyright

Copyright © 2026 "आहान"(https://aahan29.blogspot.com) .All rights reserved.

Friday, December 24, 2021

"कड़वा सच"

“मुझे नहीं रहना व्यवहारिकता के साथ..,इस के साथ मुझे अच्छी वाइब्स नही आती।” - स्वाभिमान कुनमुनाया ।

“तुम्हारी उच्छृंखलता पर अंकुश लगाने के लिए बहुत जरूरी है तुम्हारा इसके साथ होना…, इसके साथ रह कर कुछ सीखो।” आवेश में परम्परा चीखी ।

“मेरा दम घुटता है इसके साथ ।” स्वाभिमान बहस के

 मूड में था।

“याद रखो ! बिना व्यवहारिकता के तुम्हारा अस्तित्व शून्य है।”दहाड़ते हुए परम्परा ने कहा और आवेश में एक झन्नाटेदार थप्पड़ स्वाभिमान के चेहरे पर जड़ दिया ।

“तुम्हारी इन्हीं हरकतों से नैतिकता पहले ही घर छोड़ चुकी

है…,यही हाल रहा तो एक दिन इसको भी खो दोगी ।”

लड़खड़ा कर गिरते स्वाभिमान को संभालते हुए चेतना ने 

गंभीरता से कहा ।

इस कड़वे सच को सुन व्यवहारिकता इतरा रही थी और परम्परा 

के झुके माथे पर चिन्ता भरी सिकुड़न थी ।


***




Monday, November 8, 2021

"स्वभाव"

कुछ किस्से , कहानियाँ  और बातें कालजयी होती हैं और वे हर generation के साथ परिस्थितियों के अनुसार सटीक बैठती हैं । अक्सर सुना है generation gap के कारण बहुत सारी चीजें बदल.जाया करती हैं जैसे फैशन और विचार , सोचने -समझने की पद्धति । कई बार भारी परिवर्तन के कारण सांस्कृतिक परिवर्तन भी दिखाई देते हैं मगर संस्कृति की अपनी विशेषता है यह  नए बदलावों  को आत्मसात करती निरन्तर गतिमान रहती है । बेहतर बातें 
कालजयी और सामयिक बातें समय के साथ समाप्त हो जाती हैं ।
                आज मैं एक छोटी सी कहानी आप सब से साझा 
करना चाहूँगी जिसकी ‘सीख‘ मेरे मन को बहुत बार कठिन परिस्थितियों मे भटकने से रोकती है ।
                         एक व्यक्ति प्रतिदिन प्रातःकाल नदी में स्नान करने जाता था एक दिन उसने देखा , एक बिच्छू नदी के जल में डूब रहा है । उस व्यक्ति ने तुरन्त बिच्छू को बचाने के लिए अपनी हथेली उसके नीचे कर दी और बिच्छू को किनारे पर छोड़ने के लिए जैसे ही हथेली को ऊपर किया हथेली की सतह पर उसने डंक मार दिया ।दर्द से तड़प कर व्यक्ति ने जैसे ही हाथ झटका कि बिच्छू पुनः पानी में डुबकी खा गया । उस आदमी ने अपने दर्द को भूलकर अब की बार दूसरे हाथ से उसे बचाने का प्रयास जारी रखा । एक भला मानस 
नदी किनारे बैठा सम्पूर्ण घटनाक्रम को देख रहा था उस से 
रहा नही गया ,वह बोला - “मूर्ख इन्सान ! एक बार के डंक से 
जी नही भरा कि दूसरा हाथ आगे कर दिया ।"
                                   डूबते -उतराते बिच्छू से दूसरी हथेली में डंक खाने के बाद उसको निकालने के लिए प्रयास करते आदमी ने मासूमियत से उत्तर दिया -  “जब यह संकट की घड़ी  में अपने स्वभाव और गुण को नही भूल पा रहा तो मैं इन्सान होकर अपने गुण और स्वभाव का परित्याग कैसे करुं।"

Tuesday, October 19, 2021

"डर"

click by me

पाँच साल पहले डोनट में चॉकलेट के साथ लगा कुछ क्रंची सा ..शायद ड्राइफ्रूट का कोई टुकड़ा उसके दाँत में घुसता चला गया और बाइट के साथ तारीफ करने की जगह मुँह इरीटेशन के 

कारण खुला रह गया । हैल्थ प्रॉब्लम्स के चलते 

हॉस्पिटलस् के आजू-बाजू जिन्दगी गुजारने के बाद भी पता नहीं क्यों वह डेंटिस्ट के पास जाने से डरती है शायद माँ याद

आ जाती है और उस याद के साथ ही उसकी सारी बहादुरी 

भी उड़न छू हो जाती है । सो होम रेमीडिज़ ढूंढ़ी गई - क्लोव,

हींग, काली मिर्च और भी न जाने क्या-क्या.., हार कर 

नये शहर में डेंटिस्ट ढूंढा गया । एक्सरे के बाद राय मिली 

इसका 'रूट ट्रीटमेंट' सही रहेगा , कैविटी नसों तक पहुँच गई । डेंटिस्ट के यहां फ्लॉसिंग के बाद दर्द ठीक हो गया  तो  खुद की समझदारी ने  सिर उठा लिया - 'फ्लॉसिंग किट ढूंढी गई 

दिन में दो बार ब्रश करते तो हैं ..,अब फ्लॉसिंग भी किया 

करेंगे । अब अपने आप को इतना समझदार समझने में बुराई 

भी क्या है ?

 पाँच साल बाद…, वही डॉक्टर.., वही बैंगलुरू का इंदिरा नगर 

और वही वह …, बुखार और दर्द साथ लिए ।

 ऑन लाइन वीडियो कान्फ्रेंसिंग से बात बनती न देख फाइनली क्लीनिक की शरण लेनी पड़ी । तीन-चार घंटे में कभी ये डॉक्टर कभी वो डॉक्टर..ढेर सारे टेस्ट और चार-पाँच सीटिंगस् 

का फैसला ।

पुरानी जगह को देख पुराना डर उसके सामने  मुँह खोले खड़ा था जिस से डर कर  उसने वैसे ही आँखें बंद कर रखी थी जैसे कबूतर बिल्ली को देख कर कर लेता है । 

***


Thursday, September 23, 2021

"अन्तराल"

                          

【चित्र:-गूगल से साभार】


"कोई ढंग की थैली नहीं है तुम्हारे पास ? सामान ढंग से

नहीं डाल सकते ।" तेज और कठोर आवाज में स्नेहा ने तमतमाते हुए सामान पैक करते दुकान वाले  को कहा ।

आस-पास आते जाते लोग और  दुकानदार को देख कर

ऋतु को बड़ा अजीब लगा उसने धीरे से स्नेहा का हाथ दबाते हुए कहा - "शांत बालिके ! क्यों गुस्सा कर रही हो ? देखो

जरा माँ की तरफ कैसे मुँह उतर गया है उनका ।" स्नेहा के साथ वह भी उन्हें चाची की जगह माँ ही कहने लगी थी ।

उसने उचटती सी दृष्टि ऑटो में बैठी माँ पर डाली और पुनः लिस्ट के सामान की खरीददारी में उलझ गई और ऋतु

उलझ गई पाँच बरस पूर्व के वक्त में…., जब स्नेहा का

स्वभाव बहुत मृदुल हुआ करता था ।

                    "दीदी ! यह साड़ी कैसी लगी ?"- गुलाबी रंग

की खूबसूरत सी साड़ी को उसके सामने फहराते हुए स्नेहा

का चेहरा दमक रहा था ।

"बहुत खूबसूरत.., ब्लाउज़ पीस तो एकदम यूनिक है ।"-  ऋतु ने उसकी खुशी में शामिल होते हुए कहा ।

   "फिर ठीक है आज ही उद्घाटन करते हैं ।"  -साड़ी समेटती हुई वह बगल वाले घर में घुस गई ।

"कैसी लग रही हूँ मैं ?"-  खनकती मिठास भरी आवाज़ में लम्बा सा सुर खींचती हुई अप्सरा सी स्नेहा  शाम को खड़ी मुस्कुरा रही थी ऋतु के आगे । और वह ठगी सी देखती रह गयी उसको।

              "न तीज न त्यौहार…,इसको तो बस सजने संवरने

के बहाने चाहिए होते हैं और एक तुम.., बहुत सुन्दर, बहुत सुन्दर कह चने के झाड़ पर चढ़ा देती हो इसे ।" - छत से

कपड़े उतारती उसकी माँ ने आंगन में झांकते हुए  कहा।

               "कहाँ खो गई दीदी अब चलो भी !" उसकी तन्द्रा

भंग करते हुए स्नेहा ने कुछ पैकेट ऋतु को भी पकड़ा दिये । ऑटो में  बैठते हुए माँ की दुख में डूबी आवाज़ कानों में

पड़ी  - "लड़की कैसी नीम सी खारी हो गई है तू !" स्नेहा की थोड़ी देर पहले की तल्ख़ी याद करते हुए ऋतु ने माँ को समझाते हुए कहा -"नीम भी बुरा नहीं होता माँ.., आजकल

तो उसकी गुणवत्ता सभी मानते हैं ।"

ऑटो चल पड़ा स्नेहा  माँ को जवाब दिये बिना निर्लिप्त भाव से सामान की लिस्ट पर पैसों का हिसाब लगाने में लग गई

और माँ न जाने किस सोच में डूबी हुई ऑटो से बाहर देख

रही थी। ऋतु  उस खामोशी में स्नेहा के मृदुलता से खारेपन

के सफर का अन्तराल नापने का प्रयास कर रही थी।

Monday, August 23, 2021

"कटु यथार्थ"

"यहाँ पर तो एक फैमिली रहती थी पहले अभी तो बड़ी

सुनसान लग रही है यह हवेली ।" 

बहुत समय के बाद बाहर से लौटे अंशुमन ने अपने दोस्त समीर

से चाय पीते हुए पूछा । वैसे उसे याद तो 'एक फैमिली' की

इकलौती लड़की का नाम भी था और उसके पिता का नाम

भी मगर दोस्त और उसकी पत्नी के आगे बोलना नहीं

चाहता था ।

   "पता नही क्या झगड़ा था आपस में परिवार का…,एक दिन

सुबह -सुबह चीख-चिल्लाहट की आवाज़ें आईं । हम लोगों ने

छत से देखा तो  चार-पाँच आदमी सामान बाहर फेंकते दिखे

उसके बाद से यह हवेली बंद ही पड़ी है ।" अपने बच्चे को पत्नी

की गोद में देते हुए समीर ने जवाब दिया।

         "ऐसे-कैसे कोई किसी के साथ कर सकता है ?

तुमने खामोशी कैसे ओढ़ ली ?" घटनाक्रम जान कर अंशुमन

आवेश में आ गया ।सफाई देते हुए बड़ी गंभीरता से समीर

बोला- "देख सीधी सी बात है हम तो नये आए लोग हैं यहाँ..,,

पूरे मोहल्ले में सब घर बंद थे पता तो सभी को था मगर एक

भी बंदा बाहर नहीं निकला । बाद में सभी ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि आपस में भाई-भाई का झगड़ा था ।  पता

नहीं कल को वे एक हो जाएँ ,हमें क्यों टांग अड़ानी किसी के 

फटे में ।"

            हाथ की चाय का आखिरी घूंट अंशुमन को कड़वा 

लगा कटु यथार्थ जैसा ।

                               ***

Saturday, August 7, 2021

"टेढ़ी मुस्कुराहट"

सगाई समारोह की गहमागहमी में  सांवली सलोनी 

पीहू खुश थी अपनी मनपसन्द ड्रेस के साथ । 

आज की स्कूल से छुट्टी का वह पूरा फायदा उठाएगी अपनी पसन्दीदा आइसक्रीम खा कर । फिर से भूख लगेगी तो वही स्ट्राबेरी फ्लेवर वाली आइसक्रीम ही खाएगी मैन्यू देख कर उसने फैसला कर लिया था । 

"सुनो !" - अचानक अपने पीछे से आवाज सुन पीहू ने पलट कर देखा ।

-" वो अंकल जो सामने खड़े हैं उन्हें बोलो मैं बुला रहा हूँ उनको .., देखो धीरे से कहना कोई सुने नहीं ।"

"आपके हाथ में मोबाईल है ..आप बात क्यों नहीं कर लेते ।"

 हाजिर जवाब पीहू का मूड नहीं था संदेश वाहक बनने का।

कुछ देर इधर-उधर अपनी हमउम्र रिश्तेदार लड़कियों के साथ घूम कर वह अपनी फेवरिट आइसक्रीम के साथ इतेफ़ाक से  उसी जगह आ खड़ी हुई जहाँ वह परेशान लड़का उन्हीं अंकल के साथ सरगोशी भरी बहस में उलझ रहा था -   'आपने कहा था लड़की बहुत सुन्दर है बस रंग थोड़ा सा दबा है जोड़ी अच्छी लगेगी तुम दोनों की लेकिन यहाँ तो दिन-रात का अन्तर दिख रहा है..आप भी बस पापा ! मैं नहीं पहननाने वाला उसे अंगूठी ।'

- "चुप कर.., बहुत  दे रहे हैं वे । तुम दोनों को भी तो भेज रहे है  यू.एस.ए. … और क्या चाहिए ।" उनकी बहस सुन कर पीहू हट गई वहाँ से... 'बड़ों की बात नहीं सुननी चाहिए ।' यही सोच कर 

लेकिन मन परेशान हो गया सौम्या दीदी के लिए ...अगर कुछ गड़बड़ हो गई तो ? सोचते हुए उसने आइसक्रीम वही रख दी मेज पर ।

 थोड़ी देर बाद  बाद रिंग सेरेमनी आरम्भ हो गई ।

 मंत्रोच्चार के बीच सौम्या दीदी और वही परेशान लड़का मुस्कुराते हुए एक दूसरे को अंगूठी पहना रहे थे।मेहमान और मेज़बान  उत्साहित हो कर जोड़ी को सराह रहे थे-- लवली कपल.., मेड फॉर इच अदर…, लाखों में एक...,और बधाई लेने और देने का सिलसिला जारी हो गया । 

 पीहू  भी एक टेढ़ी मुस्कुराहट के साथ स्ट्राबेरी फ्लेवर की आइसक्रीम के स्टॉल की तरफ बढ़ गई ।



                                    ***

Tuesday, July 27, 2021

"खुशी"

             

अपना वजूद भी इस दुनिया का एक हिस्सा है उस पल को

महसूस करने की खुशी , आसमान को आंचल से बाँध

लेने का  हौंसला , आँखों में झिलमिल -झिलमिलाते  सपने

और आकंठ हर्ष आपूरित आवाज़ - “ मुझे नौकरी मिल गई है , कल join करना है वैसे कुछ दिनों में exam भी हैं…,

 पर मैं सब संभाल लूंगी।” कहते- कहते उसकी आवाज

शून्य में खो सी गई ।

 मुझे खामोश देख वो फिर चहकी - “ मुझे पता है 

आप अक्सर मुझे लेकर चिन्तित होती हो , मैंने सोचा सब

से पहले आप से खुशी बाँटू। “

           उसकी बात सुनते हुए  मैं सोच रही थी अधूरी पढ़ाई ,

गोद में बच्चा ,घर की जिम्मेदारी और ढेर सारे सामाजिक

दायित्व । ये भी नारी का एक रुप है कभी बेटी , कभी पत्नी

तो कभी जननी । हर रूप में अनथक परिश्रम करती है और

अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए अवसर की तलाश

में रहती है ।अवसर मिलते ही पल्लवित होती है अपनी  पूर्ण सम्पूर्णता के साथ।

                उसके  दमकते चेहरे और बुलन्द हौंसलों को

देखकर मुझे बेहद खुशी हुई और यकीन हो गया कि एक

दिन फिर वह निश्चित रूप सेे इस से भी बड़ी खुशी मुझसे

बाँट कर मुझे चौंका देगी ।

          

                                ***