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Monday, November 8, 2021

"स्वभाव"

कुछ किस्से , कहानियाँ  और बातें कालजयी होती हैं और वे हर generation के साथ परिस्थितियों के अनुसार सटीक बैठती हैं । अक्सर सुना है generation gap के कारण बहुत सारी चीजें बदल.जाया करती हैं जैसे फैशन और विचार , सोचने -समझने की पद्धति । कई बार भारी परिवर्तन के कारण सांस्कृतिक परिवर्तन भी दिखाई देते हैं मगर संस्कृति की अपनी विशेषता है यह  नए बदलावों  को आत्मसात करती निरन्तर गतिमान रहती है । बेहतर बातें 
कालजयी और सामयिक बातें समय के साथ समाप्त हो जाती हैं ।
                आज मैं एक छोटी सी कहानी आप सब से साझा 
करना चाहूँगी जिसकी ‘सीख‘ मेरे मन को बहुत बार कठिन परिस्थितियों मे भटकने से रोकती है ।
                         एक व्यक्ति प्रतिदिन प्रातःकाल नदी में स्नान करने जाता था एक दिन उसने देखा , एक बिच्छू नदी के जल में डूब रहा है । उस व्यक्ति ने तुरन्त बिच्छू को बचाने के लिए अपनी हथेली उसके नीचे कर दी और बिच्छू को किनारे पर छोड़ने के लिए जैसे ही हथेली को ऊपर किया हथेली की सतह पर उसने डंक मार दिया ।दर्द से तड़प कर व्यक्ति ने जैसे ही हाथ झटका कि बिच्छू पुनः पानी में डुबकी खा गया । उस आदमी ने अपने दर्द को भूलकर अब की बार दूसरे हाथ से उसे बचाने का प्रयास जारी रखा । एक भला मानस 
नदी किनारे बैठा सम्पूर्ण घटनाक्रम को देख रहा था उस से 
रहा नही गया ,वह बोला - “मूर्ख इन्सान ! एक बार के डंक से 
जी नही भरा कि दूसरा हाथ आगे कर दिया ।"
                                   डूबते -उतराते बिच्छू से दूसरी हथेली में डंक खाने के बाद उसको निकालने के लिए प्रयास करते आदमी ने मासूमियत से उत्तर दिया -  “जब यह संकट की घड़ी  में अपने स्वभाव और गुण को नही भूल पा रहा तो मैं इन्सान होकर अपने गुण और स्वभाव का परित्याग कैसे करुं।"

16 comments:

  1. मीना दी, यह कहानी मेरी पढ़ी हुई है। लेकिन मुझे लगता है कि यहां पर उस व्यक्ति की गलती है। बिच्छू अपने स्वभाव से लाचार है। उसे इतनी समझ नही की बचानेवाले को नही काटना चाहिए। लेकिन इंसान को तो इतनी समझ होना ही चाहिए कि जो हमे काट रहा है उसके साथ नरमी न बरते।

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    1. बचपन में अपनी दादी से यह कहानी सोते समय सुनी थी तो मैंने कुछ कुछ ऐसा ही कहा था । दादी का उत्तर आज भी थोड़ा बहुत याद है । उन्होंने जीवमात्र के लिए दयाभाव की बात कही थी और भी कुछ कहा था जो नींद के आगोश में खो गया । आपकी अपनत्व भरी प्रतिक्रिया के लिए स्नेहिल आभार ज्योति बहन ।

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  2. सॉरी दी, उझेजो लगा वो मैं नेलिख दिया।

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    1. कृपया ऐसा न कहे... आपका स्नेह सदैव यूं ही बना रहे ।

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  3. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार
    (9-11-21) को बहुत अनोखे ढंग"(चर्चा अंक 4242) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है..आप की उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी .
    --
    कामिनी सिन्हा

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  4. सृजन को स्थान देने के लिए हृदयतल से धन्यवाद कामिनी जी।

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  5. कहानी का संदेश जन्तु के हिसाब से अच्छा है, परंतु आज के समय में अगर ऐसा करो तो लोग मूर्ख कहने लगते हैं । लोग जैसे को तैसा करने में ज्यादा यकीन रखते हैं । क्षमा,दया का कहीं कोई भाव ही नहीं है ।

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    1. गुण-दोष स्वभाव जिसका जैसा है वैसा है । स्वभाव में परिवर्तन तो जन्तुओं में भी देखने को मिलता है ।मानव अपने मूल्यों के कारण ही प्रकृति का श्रेष्ठ प्राणी है ,ऐसा मेरा मानना है जिज्ञासा जी । बाकी सबके अपने विचार हैं । आपकी स्नेहिल और मान भरी उपस्थिति के लिए आभारी हूँ।

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  6. कहानी बहुत अच्छी है ।

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    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ । हृदयतल से आभार मधुलिका जी !

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  7. बचपन की सुनी कहानियां और सीख धीरे धीरे जीवन में उतरती चली जाती है पर आज ऐसे लोगों को मूर्ख माना जाता है अब कोई मूर्ख माने तो माने ऐसी सीखे संस्कार बन गहरी जड़ें पकड़ चुकी हैं कभी-कभी लगता है काश ऐसी सीख न ली होती....बस अब आगे की पीढ़ी को ये सिखा रहे हैं कि परिस्थिति के अनुकूल व्यवहार करें....।
    गहन मंतव्य दर्शाती सुन्दर एवं सार्थक कहानी।

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    1. वर्तमान परिस्थितियों का आकलन करती आपकी सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से आभारी हूँ सुधा जी!
      आपकी स्नेहिल उपस्थिति से लेखनी को मान मिला ।

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  8. समय कितना भी बदल जाते मानवीय मूल्य कभी नहीं बदलते ।
    बहुत पुरानी कहानी है सबने पढ़ी सुनी होगी ,आज के संदर्भ में उसे सटीक मानों या न मानों पर शाश्वत शाश्वत ही होता है।
    सुंदर मानवीय मूल्यों की सुंदर कथा।

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    1. सस्नेह आभार कुसुम जी आपकी सारगर्भित सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया से सृजन को मुखरता मिली और लेखनी को ऊर्जा।
      सुंदर सार्थक सकारात्मक ऊर्जा के लिए हृदय से आभार।
      सस्नेह।

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  9. बहुत ही सुंदर आदरणीय मीना दी सच कहा आपने स्वभाव सहज ही नहीं बदलता। बदलते परिवश में चाहे इसे भोलापन कहे या नादानी परंतु सच यही है।
    मेरे दादाजी की कही अनेक कहानियाँ मेरे भी जीवन का संबल बनती है।
    सादर

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  10. सत्य बात कही अनीता जी । कठिन परिस्थितियों से उबरने को सम्बल मिले वो विचार मन को छू जाते हैं । आपकी स्नेहिल उपस्थिति के लिए हृदय से आभार ।

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