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Wednesday, October 21, 2020

"माटी की गंध"

                         

जब सूरज की तपिश तेज होती है और सूखी मिट्टी पर 

बारिश की बूँदें पहली बार टकराती है तो मिट्टी‎ के वजूद

से उठती गंध मुझे बड़ी भली लगती है। आजकल जमाना फ्रिज में रखी वाटर बॉटल्स वाला है मगर मेरे बचपन में मिट्टी‎ की सुराहियों और मटकों वाला था। मुझे याद है मैं सदा नया मटका धोने की जिद्द करती और इसी बहाने उस भीनी महक को महसूस करती  । माँ की आवाज से ही मेरी तन्द्रा टूटती । बारिश शुरु होते ही उस खुशबू का आकर्षण‎ स्कूल के कड़े अनुशासन में भी

मुझे नटखट बना देता । अध्यापिका की अनुपस्थिति में  मैं खिड़की‎ या कक्षा‎ कक्ष‎ के दरवाजे‎ तक आ कर अपनी हथेलियों को फैला कर एक लंबी गहरी सांस में उस पल को महसूस करने की कोशिश करती तो घर पर माँ के लगाए तुलसी के पौधे के समीप जाकर खड़ी हो जाती जो आंगन के बीच में था । 

 एक दिन यूं ही कुछ‎ पढ़ते‎ पढ़ते पंजाब‎ की प्रसिद्ध‎ लोक कथा‎ ‘सोनी-महिवाल’ का प्रसंग पढ़ने को मिल गया इस कहानी से अनजान तो नही थी मगर उत्सुकतावश पढ़ने बैठ गई । कहानी का सार कुछ इस तरह था --

                          “18 वीं शताब्दी‎ में चिनाब नदी के किनारे एक कुम्भकार के घर सुन्दर‎ सी लड़की का 

जन्म हुआ जिसका नाम “सोहनी” था । पिता के बनाए‎ मिट्टी‎ के बर्तनों पर वह सुन्दर‎  सुन्दर‎ आकृतियाँ उकेरती । पिता-पुत्री के बनाए‎ मिट्टी‎ की बर्तन दूर  दूर‎ तक लोकप्रिय‎ थे ।

 उस समय चिनाब नदी से अरब देशों‎  और उत्तर भारत के मध्य व्यापार हुआ‎ करता था। बुखारा (उजबेकिस्तान) के अमीर व्यापारी का बेटा  व्यापार के सिलसिले में चिनाब के रास्ते‎ उस गाँव से होकर आया और सोहनी को देख मन्त्रमुग्ध हो उसी गाँव में टिक गया । आजीविका यापन के लिए उसी गाँव‎ की भैंसों को चराने का काम करने से वह महिवाल के नाम से जाना जाने लगा । 

सामाजिक‎ वर्जनाओं के चलते सोहनी मिट्टी‎ के घड़े 

की सहायता से चिनाब पार कर महिवाल से छिप

 कर मिलने जाती । राज उजागर होने पर उसी की

 रिश्तेदार ने मिट्टी‎ के पक्के घड़े को कच्चे घड़े मे

 बदल दिया । चिनाब की धारा के आगे कच्ची मिट्टी‎ 

के घड़े की क्या बिसात ?  घड़ा गल गया और  पानी में डूबती सोहनी को बचाते हुए‎ महिवाल भी जलमग्न हो गया ।"

       कभी  कभी‎ लगता है माटी की देह में  कहीं सोहनी 

 तो कहीं  किसी और अनाम तरुणी का प्यार‎ बसा

 है  । ना जाने कितनी ही अनदेखी और अनजान कहानियों‎ को अपने आप में समेटे है यह।  तभी‎ तो मिट्टी‎ पानी की पहली बूँद के सम्पर्क‎ में आते ही सौंधी सी गमक से महका देती है सारे संसार‎ को ।

Saturday, October 10, 2020

"एक पाती "

कई बार लगता है कि हम एक - दूसरे के मन मस्तिष्क को

इतना पहचानते हैं कि कौन सी सोच का प्रभाव किस बिन्दु

पर दिखेगा अक्षरशः महसूस कर लेते हैं तो कभी कभी

लगता है एक अभेद्य  दीवार के पीछे बंद हैं । साथ में रह कर

 भी कोसों दूर...एक-दूसरे के लिए एकदम अनजान ।      

 मेरे मन ने स्नेह तो बहुत किया है तुमसे बस.., परिभाषित

करना नहीं आया । समय पर प्रतिक्रिया के मामले में मैं सदा

से ही कंजूस रही हूँ ।

    जीवन के व्यस्त पलों में कितनी ही बार

 कभी आँखों की चमक ने तो कभी अश्रु बिन्दुओं

 ने नेह के नये उपमान गढ़े मगर पलट कर देखने के लिए

न तुम्हारे पास समय था और न ही शिकायत करने के

लिए मेरे पास ।

  अनमोल होते हैं वे पल जिनमें  तुम्हारे भावों की वीथियों में

अपने आपको तुम्हारे करीब महसूस किया ।  रोबोट सी

यान्त्रिक बनी हमारी जि़दगी में भावनाओं का मोल कम है

या फिर उनके लिए वक्त की कमी लेकिन बहुत बार

यह कमी खलती भी है ।

यह ख़त तुम्हें बस यही अहसास दिलाने के लिए लिखा है कि

     "मेरे मन-आंगन से नेह की निर्झरिणी के लुप्त होने से पूर्व मेरे मन की जड़ता भंग करने मेरे पास जरूर चले आना ।"

लैपटॉप की स्क्रीन पर माँ की मेल पढ़ते पढ़ते अनुराग का मन

गीला हो गया और उसे याद आया कि पिछले कितने ही

दिनों से अपने काम में उलझे रहने के कारण उसने माँ से

ढंग से बात भी नहीं की है हमेशा माँ के पास वक्त की कमी का

उलाहना देने वाला अनुराग सब कुछ

 भूल घर के किसी कोने में काम में उलझी माँ को

ढूंढ़ने भागा ।

 

***                  

Friday, October 2, 2020

"वीनस"

 गर्मियों में खुली छत पर रात में सोने से पहले खुले स्वच्छ  आसमान में झिलमिल करते तारों की चमक को निहारना, आकाश गंगा की आकृति की कल्पना करना और ध्रुव तारे को देखना आदत सी रही है मेरी । इस आदत को पंख मिले "सौर परिवार"  का पाठ पढ़ने के बाद .. जहाँ ग्रहों और ब्रह्मांड के साथ आकाश गंगाओं का परिचय था।

हर चमकते तारे को मन मुताबिक ग्रह मान लेना और आकाश गंगा के साथ  ब्लैक होल की काल्पनिक तस्वीर उस जगह बना लेना जहाँ तारे दिखाई ना दे प्रिय शगल था मेरा । कई बार ना चाहते हुए भी घर के सदस्यों की टोली मेरी चर्चा में शामिल हो जाती । तारों के स्वप्निल संसार में खोये- खोये कब नींद आ जाती पता ही नहीं चलता । कभी  मंदिरों की आरती के साथ आँख खुलती तो दिन के आरम्भ से पूर्व विदा लेते तारों में भोर का तारा टिमटिम की चमक के साथ मानों विदाई का संकेत देता कि - उठ जाओ..सांझ को फिर आऊंगा दिया-बाती की बेला के साथ ।

बचपन में खेल-कूद और शरारतों के समय सौर परिवार के एक सदस्य से अनजाने में दोस्ती हो गई और इसी के साथ दिनचर्या बन गई सांध्य तारे और भोर के तारे को देखने की । बाद में यह आदत..विशेष कर सुबह जल्दी उठने की परीक्षाओं में बड़ी मददगार साबित हुई ।

यह ग्रह सूर्य के उल्टे चक्कर लगाता है । अत्यधिक चमकीला होने के कारण रोम वासियों ने इसका नाम  वहाँ की सुंदरता

और प्रेम की देवी के नाम पर वीनस 【Venus】 रखा ।

सुबह उठते ही आसमान को निहारते भोर का तारा दिख

जाए तो दिन बन जाता था मेरा ।

 व्यस्त दिनचर्या के बाद भी आसमान में ऊषाकाल और सांध्य

बेला में एक खोजी दृष्टि डालना मेरे स्वभाव का हिस्सा रही हैं। 

समय के साथ-साथ छोटे शहर बड़े शहरों में तब्दील हो रहे हैं जहाँ आसमान में शाम को तारों को देखने के लिए खुली छतों और आंगन की जरूरत 

महसूस हो रही है । खुली छतें और आंगन बढ़ती जरूरतों के साथ सिमटने लगे हैं । बड़े शहरों की तो बात ही क्या.. यहाँ गोधूलि और रात्रिबेला में इमारतों से तारे जमीं पर देखने का भान होता है । आज भी कभी बालकनी तो कभी कमरे खिड़की से मन और आँखें भोर के तारे और सांध्य तारे को  को ढूंढती हैं। समय के बदलते रूख के साथ बाल सखा भी व्यस्त हो गया शायद या फिर मेरे जैसे ही किसी और बाल सखा की दुनियां में रम गया । जो मेरी ही तरह भोर और सांझ में उसकी प्रतीक्षा करता होगा ।


✴️

Saturday, September 19, 2020

"अन्तर"

 स्कूल से आकर अपना बैग पटकते हुए दिशा ने शिकायती लहज़े में माँ से कहा - “तुम मुझ में और भाई में भेद-भाव रखती हो , उसको शाम तक भी घर से बाहर आने-जाने की छूट और मुझे नही?” माँ ने निर्लिप्त भाव से उसकी ओर देखते हुए पूछा-”आज यह सब कहाँ से भर लाई कूड़ा-कबाड़ दिमाग में।’ 

              “ आज स्कूल में “समाज में लिंगभेद’ पर स्पीच थी , उसमें यह बात भी थी कि लड़कियों को लड़कों से कम समझा जाता है । लड़कों को ज्यादा सुविधाएँ मिलती हैं। और यह बात सच भी है मुझे बाहर कहाँ खेलने जाने देती हो तुम ?"

                                                      माँ ने बड़ी सहजता से कहा-”भाई के हर महिने बाल कटाती हूँ , तेरे बाल लम्बे हैं ,भरी दोपहरी या शाम को गलियाँ सुनसान होती हैं ऐसे समय-कुसमय में बुरी आत्माएँ घूमती हैं इसलिए लड़कियों को बाहर जाने से रोका जाता है । बाकी तू जानती है मैंने खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने में कभी भेद नही किया तुम भाई-बहनों में। "बाल-सुलभ जिद्द वही की वही रुक गई क्योंकि दिशा को भूतों-प्रेतों के नाम से ही डर लगता था यूं भी लाईट जाते ही वह उल्टा-सीधा जैसा भी याद था हनुमान-चालीसा बुदबुदाना शुरु कर देती थी।

                      दिशा सोच रही थी कि कुछ हद तक             माँ की बात सही भी थी माँ को उसने अपने परीक्षा-परिणाम पर सदा खुश होते ही देखा। छोटे भाई और बहन को बड़े भइया की बजाय अच्छे से वह रखेगी इस बात का विश्वास था उन्हें। कई बार वाद-विवाद तो कई बार निबन्ध प्रतियोगिताओं में दहेज-प्रथा और लड़के-लड़की के मध्य असमानता जैसे विषय उठ जाया करते थे । नारी जाति के प्रति उपेक्षित व्यवहार की चर्चा कक्षा-कक्षों में भी होती थी और वह स्कूल से आते ही राम चरित मानस या गीता-पाठ करती माँ के पास अपना रोष व्यक्त करने पहुँच जाती मानो उसकी जिद्द है कि वह माँ को साबित कर दिखाएगी कि अन्तर है समाज में नारी और पुरुष वर्ग में ।

                      माँ शान्ति से बात सुनती और समझाती कि अवसर की समानता लड़कियों पर भी निर्भर है।वैदिक काल में मैत्रेयी,अपाला, गार्गी और विश्ववारा जैसी विदुषियाँ ऋषियों के समकक्ष थीं। माँ दुर्गा,लक्ष्मी और सरस्वती भी स्त्रियाँ ही हैं ना….,और तू ये गाती फिरती है -”खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।” यह भी तो लड़की ही थी ना ।"

कई बार वह उनके सामने हथियार डाल देती तो कई बार अपनी बुध्दि अनुसार नए तर्क खोजने लगती। मगर मकसद एक ही रहता कि माँ से अपनी बात मनवा कर छोड़ेगी ।

               आज दिशा बड़ी हो गई है , माँ भी नही रही। घर - बाहर लड़कियों को देखती है , कुछ बड़ी हैं  तो कुछ बड़ी हो रही हैं । नौकरियाँ कर रही हैं स्वावलंबी भी हैं मगर सवाल आज भी वही हैं। जिद्द भी वही है कि समाज में लिंगभेद असमानता है । लड़कियों के लिए विकास के अवसर कम है वगैरा-वगैरा ।

     ऐसे समय में दिशा को माँ के समझाने का ढंग याद आ जाता है। असमय निर्जन स्थानों पर होने वाली महिलाओं के साथ दुर्घटनाएँ..  ,अक्सर माँ के द्वारा समय- कुसमय बाहर जाने से रोकने के तर्कों की याद  दिलाती है। 

               आज की भागती-दौड़ती दुनियाँ में शायद वक्त ही नही है किसी के पास बालमन की जिज्ञासाओं को शान्त करने का।

                        “Don’t argue . चुप्प कर , ये कौन सा project है ?अपनी tuition-teacher.से पूछ लेना ।" जैसे जुमले व्यस्त भाव से सुनने को मिल जाते हैं। सवाल आज भी वही हैं बस जवाब देने के ढंग में अन्तर आ गया है शायद ।


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Sunday, September 6, 2020

"5 सितम्बर"

 कल-कल बहते झरने सी हँसी थी उसकी । भूमिका अक्सर स्कूल के गेट में घुसती तो वो हँस कर गुड मार्निंग कह अपनी हथेली भूमिका की तरफ फैला देती । स्कूल में किसने बनाया होगा यह नियम पता नहीं लेकिन ग्यारहवीं कक्षा की लड़कियां नियम से स्कूल आने वाली शिक्षिकाओं की स्कूटी या साइकिल गेट से लेकर साइकिल स्टैंड पर खड़ी कर के आती ..लड़कियों की ड्रेस साफ-सुथरी है ना..लेट आने वाली लड़कियों को लाइन में खड़ा करना सब उन्हीं के जिम्मे होता ।अगले वर्ष ड्यूटी अगली ग्यारहवीं की होती ।

      भूमिका के भुलक्कड़ स्वभाव में था दिनांक भूल जाना..वह चॉक उठा कर बोर्ड की तरफ मुड़ते हुए पूछती - डेट ? उसकी क्लास में से शरारती सुर उठता ..हमारे रिवीजन.. होमवर्क की डेट कभी नहीं भूलते आप ? भूमिका मुस्कुरा भर देती । एक दिन वह भूमिका की क्लासमेट नेहा के साथ सकुचाई सी उसके घर के गेट पर थी । नेहा से बातचीत में पता चला वो उसकी भांजी

 है । राजनीति  विज्ञान में मदद चाहिए उसे यदि वह पढ़ा सके … अपने सिद्धांतों के कारण भूमिका ने उसे ट्यूशन की हामी तो नही भरी लेकिन वादा किया कि वो जब भी परेशानी हो स्कूल के अतिरिक्त घर आकर पढ़ सकती

 है । अपने मिलनसार स्वभाव के कारण धीरे -धीरे वह भूमिका के परिवार के सदस्य जैसी बन गई ।  सबके जन्मदिन पर हंगामा मचाने वाली लड़की  का जन्मदिन अप्रैल में आता है उसने ठोक-पीट कर भूमिका को रटा दिया था । जन्मदिन वाले दिन उसने आँखों में अनोखी चमक के साथ भूमिका मैम से स्कूटी की चाबी ली..स्टैंड पर खड़ी की । क्लास में भी चॉक-डस्टर ,बुक निकाल कर मेज़ पर रखी ।भुलक्कड़ मैम को 'डेट" भी बताई ।

                चार-पाँच दिन के अन्तराल पर वह घर आई तो  उदास सी थी । उदासी का कारण पूछने पर जवाब

भूमिका की  मम्मी ने दिया - 'तूने उसको बर्थडे तक विश नहीं किया और अब पूछ रही है क्या हुआ ?' भूमिका ने

सिर पकड़ लिया अपना..पता नहीं अंकों के साथ उसका

क्या आकड़ा था ..हर बात याद रखने वाली भूमिका कभी भी डेट , फोन नम्बर याद नहीं रख पाती थी । भूमिका को सिर पकड़े देख उसने मासूमियत से हँसते हुए कहा - 'कोई बात नहीं आंटी जी हम इनको डेट याद रखना भी सीखा देंगे ।'

            कॉलेज में जाने के बाद भी उसने घर आना नहीं छोड़ा यदि कुछ दिन नहीं आती तो वह समझ जाती अपने घर गई होगी पेरेंट्स के पास । एक बार की यूं ही गई वह नहीं लौटी ...नेहा से पता चला रोड एक्सीडेंट में उसने 5सितम्बर को आखिरी सांस ली ।

                      हर 5 सितम्बर को भूमिका के कानों में एक आवाज़ गूंजती है - 'कोई बात नहीं आंटी जी हम इनको डेट याद रखना भी सीखा देंगे ।' 


                                     ***

Wednesday, September 2, 2020

क्षमा बड़न को चाहिए...

सुबह और शाम खुली हवा में घूमना बचपन से ही बहुत प्रिय रहा है मुझे । इसका कारण शायद पहले खुले आंगन‎ और खुली‎ छत वाले घर में रहना रहा होगा । शहर में आ कर अपना यह शौक  मैं‎ अपने आवासीय कैंपस के 'पाथ वे' में घूम‎ कर पूरा कर लेती हूँ । आज कल वैश्विक महामारी के चलते घूमना बंद है मगर कमरे की खिड़की से दिखते 'पाथ वे' को देखते समय एक दिन की घटना का स्मरण हो आता है । कैंपस में बने बॉस्केटबॉल ,फुटबॉल या टेबल टेनिस कोर्ट में शाम के समय अक्सर‎ बच्चों की टोलियां मिल जाती थी क्योंकि शाम के बाद तो वहाँ उनके अभिभावकों का आधिपत्य होता था अतः शाम का समय उनके शोर-शराबे से गुलज़ार रहता । उस दिन बच्चों‎ के ग्रुप के बीच एक औरत खड़ी मोबाइल पर कुछ करती दिखाई‎ दी, दूसरे राउंड में भी उसे वहीं‎ खड़े देखकर कुछ अजीब‎ सा लगा कि क्यों बच्चों‎ का रास्ता‎ रोके खड़ी है दूर‎ खड़ी होकर भी बात कर ही सकती है मगर कैंपस में रहने वालों के लिए सार्वजनिक‎ जगह जो ठहरी और उस पर किशोरवय  के बच्चे खेल रहे हो तो किसी का भी उस जगह का उपयोग करने का समान हक है यहाँ‎ वर्जना अस्वीकार्य सी है । अगले राउंड तक माहौल अन्त्याक्षरी जैसा हो गया बच्चों‎ का झुण्ड एक तरफ और महिला दूसरी तरफ मगर जो कानों ने सुना वह अप्रत्याशित था , बच्चे‎ ---  “But aunty , we are  seniors .और महिला बराबर टक्कर दे रही ही थी----  O…, excellent . listen to me you are also kids. गर्मा गर्म बहस सुन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची  कि महिला का बेटा जो उन बच्चों‎ से बेहद छोटा था बास्केट बॉल खेलना चाह रहा था  जिसके चलते  बड़े बच्चों‎ को परेशानी हो रही थी‎ और समस्या यह थी कि दोनों पक्षों‎ में से  कोई भी पीछे हटने को कोई तैयार नही था । बच्चों का महिला से इस तरह बहस करना सही भी नहीं लग रहा था ।
 घर की तरफ लौटती मैं सोच रही थी कि अधिकार भाव के लिए सजगता कहाँ अधिक‎ थी । Morality के मानदण्ड पर तो दोनों पक्ष ही गलत थे ऐसे में चलते चलते रहीम जी का दोहा ----छमा बड़न को चाहिए ,छोटन को उत्पात …याद आ गया और उसी के साथ बच्चों‎ का पलड़ा भारी हो गया ।

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Sunday, August 30, 2020

"बरफी"【समापन किश्त】

लगभग महिने भर बाद भुआ ने एक दिन अचानक आकर कहा -’पाँच-सात दिन के लिए गाँव जाना है  ,कुछ पैसे चाहिए छुट्टी के साथ ; अगले महिने पगार से कटा लेंगी।’
इस घटना के दस दिन बाद उनके लौटने पर जो बातें मैंने जानी उन्हें सुनकर मेरा मन उनके प्रति आदर से भर उठा वहीं उनकी आँखों की गहराई और सूनेपन का राज भी समझ में आ गया। बरफी भुआ एक भले घर से ताल्लुक रखती थी उनके पिता और पति दोनों की अपने-अपने गाँवों में अच्छी जमीनें थी। शादी के बाद दुर्भाग्यवश उन्हें कोई सन्तान नही हुई और देवरानी-जेठानी से बच्चा गोद मांगने पर ताना मिला -  “काठ के बच्चे बनवा कर खिला लो।” उस ताने को सुनने के बाद बरफी भुआ ने कुल्हाड़ी पर पैर नही रखा बल्कि कुल्हाड़ी उठाकर पूरी मजबूती के साथ अपने पैरों पर दे मारी। पति के लिए दुल्हन लाई और दोनों से अपने लिए एक बच्चा मांगा मगर नसीब में सुख होता तो अपना ही न हो जाता। बेटे की जगह रोजाना की कलह और अपमान झोली भर-भर के मिलने लगा। पीहर में माता-पिता का निधन हो चुका था ,बहन-भाइयों की अपनी-अपनी गृहस्थी थी ऐसे में कौन उनकी पीड़ा सुनता। पति के देहान्त के बाद आधी रात पति के बेटों और पत्नी द्वारा अपमानित होकर भुआ ने घर छोड़ दिया और एक अनजान कस्बे में आकर मेहनत मजदूरी करने को मजबूर हुई। उस अनजान से गाँव के अपरिचित से मोहल्ले के सभी घरों के बड़े और बच्चों के बीच अपने आत्मीय स्वभाव से कारण वह बरफी भुआ कब बन गई
उन्हें भी पता नही चला।
काल का पहिया यूं ही धीरे-धीरे सरक रहा था कि एक दिन उनके पति के बड़े पुत्र की विधवा गोद में बच्चा लिए उनके सामने आ खड़ी हुई अभागिन का नाम देकर घरवालों ने उसे ठुकरा दिया था । उसकी व्यथा से द्रवित भुआ को अपने प्रति हुआ अन्याय भी याद हो आया। सन्तान को तरसती दुखियारी माँ ने उस बालक को अपना पोता मानते हुए उसके हक के लिए  मुकदमा दायर कर दिया अपने पति के बेटों और पत्नी पर। पूरी बात सुनने के बाद मैंंने भारी मन से कहा - भुआ आपका समय तो आपने यूं ही निकाल दिया अब ..., मेरी बात काटते हुए उन्होने कहा - ‘उस महारानी को संतान के  लिए लाई थी ,खुद को तीन हुए तो दूसरों की बेक़दरी करेगी। मैं समझ लूंगी जो नही रहा वो मेरा था। मैं समझ गई भुआ का पुराना दबा रोष, संतान मोह और स्वाभिमान एक साथ जाग उठे हैं। और अब उन्हें रोकने वाला कोई हो ही नहीं सकता ।  महिने  दर महिने बीतते रहे वो जब भी छुट्टी मांगती मैं समझ जाती कि केस की सुनवाई की तारीख पर जा रही होंगी । धीरे-धीरे मोहल्ले वालों ने आलोचना शुरु कर दी - ‘बरफी का दिमाग खराब हो  गया अब इस उम्र में क्या करेगी जमीन-जायदाद का।' वो जब भी ऐसी बातें सुनती बैचेन हो जाती, काम करते समय स्वभाव में उतावलापन देखते ही मैं समझ जाती कि आज कुछ हुआ है।
      हमेशा की तरह इस बार भुआ गाँव का नाम ले कर गई और वापस आई तो चेहरे की झुर्रियाँ और माथे की सलवटें अधिक ही गहरा गईं थीं और आँखों का सूनापन भी बढ़ गया था । डरते-डरते पूछा तो जवाब कुछ यूं  मिला - 'वकील कहता है- घर की लड़ाई है मिल-बैठ कर सुलझा लो और इन लोगों को माफ कर दो ।' वो महारानी सामने खड़ी थी…, मैंंने भी कह दिया सब के बीच - ' तीस बरस अपने सिर पर घास के गट्ठर और गाय-भैंसों का गोबर ढोया है इस महारानी से तीस बरस नही तीन महिने ही सही यह काम करवा दो मैं माफ कर दूंगी।' बाहर आकर काले कोट वाला बोला -' तेरा दिमाग खराब है बरफी!' सुना दिया उसको भी - 'वही तो खराब है नही तो मैं भी तुम्हारी तरह काला कोट पहनती या इसकी तरह महारानी बन के रहती।'
       कुछ महिनों बाद फिर उन्होने गाँव जाने की बात कही। मैं भी उनका चेहरा देखते ही समझ गई कि केस की तारीख पर जा रही है। पूछने पर बीड़ी पीते हुए हाँ में सिर हिलाया। अब की बार गई भुआ वापस नही लौटी, कुछ महिनों बाद मेरा तबादला कहीं और हो गया। दो-तीन बार काम वश उधर जाना हुआ तो वहाँ भी पहुंची जहाँ वे रहती थीं । उजाड़ खण्डहर घर भुआ के चेहरे की झुर्रियों और सूनी आँखों जैसा ही दिख रहा था उस पर जंग खाया ताला उनके न लौटने की गवाही दे रहा था । आस-पास के लोगों से पूछने पर जवाब मिला - पता नही गाँव गई थी वापस नही लौटी, उम्र भी हो ही रही थी……, कहीं मर-खप गई होगी ।
 मन में उनकी व्यथा की गठरी लिए मैं वापस लौट आई । अक्सर मुझे बरफी भुआ की याद आ ही जाती है और उनके दुखों और कड़वाहटों को याद कर के मन भी उदास हो जाता है।

                                ***  
                                                     【 समाप्त 】