पिछले तीन घण्टे से स्नेहा अपने दो सहयोगियों के साथ
तपती धूप में फाइल थामे कभी इस दुकान तो कभी उस दुकान,छोटे-मंझोले रेस्टोरेन्टस् में चक्कर लगा रही थी बाल
श्रमिक सर्वे हेतु बच्चों के नाम सूचीबद्ध करने के लिए । हमेशा
की तरह आज किसी भी दुकान पर चाय पकड़ाते और कप
धोते उसे एक भी बच्चा नज़र नहीं आया । धूप में उसका सिर
तप रह था और आँखों में रोशनी के झपाके लग रहे थे ।गर्मी से सड़कों की स्थिति कर्फ़्यू लगने जैसी थी । प्यास बुझाने के लिए उसने कंधे पर टंगे बैग से पानी की बोतल निकाली तो खाली
बोतल मानो मुँह चिढ़ा रही थी ।
तभी एक सहयोगी ने कहा - “कल का दिन भी है हमारे पास, बाकी का एरिया कल कवर कर लेंगे । आप थक
गई हैं अभी आपका घर जाना ठीक रहेगा।” उसको भी यही ठीक लगा । आपसी सहमति से तीनों ने कल दोपहर का समय न
चुनकर सुबह जल्दी आना तय किया । दोनों सहयोगियों ने
अपनी-अपनी राह ली और वह जैसे ही मुड़ी सामने से रिक्शा
आता देख ज़ोर से चिल्लाई-“रिक्शा” !
रिक्शा चालक ने सिर कैप से और मुँह तौलिए से
ढका था ।रिक्शे के चलने से लू के थपेड़े भी स्नेहा को सुकून
भरे लगे थोड़ा आराम मिलने पर उसे कदकाठी से रिक्शा चालक किशोर लगा तो उसने पूछा - “कहाँ से हो भाई ! नाम क्या है
तुम्हारा ?”
चालक ने पूर्ववत अपना काम करते हुए कहा - “आप
क्या करेंगी जानकर …, मेरी उम्र अट्ठारह साल है । आज
गली-गली कुछ लोग फ़ाइलें लिए घूम रहे हैं । कहते हैं -
“बालश्रम अपराध है ।” मज़दूरी नहीं करेंगे तो खायेंगे क्या ?
हम ग़रीबों के यहाँ तो हर बंदा काम करता है तो ही बसर होती
है रिक्शे का किराया भी रोज़ाना इसके मालिक को देना होता
है ।”
निरुत्तर सी स्नेहा रिक्शा रूकवा किशोर के हाथ में
बीस रूपये थमा कर पैदल ही घर की ओर चल पड़ी । चलते
वक़्त वह श्रमिकों की व्यथा के साथ उस फाइल के बारे में भी
सोच रही थी जो आते समय वह अपने सहयोगी को दे आई थी।
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