Copyright

Copyright © 2026 "आहान"(https://aahan29.blogspot.com) .All rights reserved.

Wednesday, March 3, 2021

"पगडंडियाँ"

  "सभी अपना-अपना काम करें..इधर-उधर तांका-झांकी नहीं” परीक्षा-कक्ष में पहुँचते ही प्राध्यापक विनय ने आवश्यक कार्यो की पूर्ति करते हुए परीक्षार्थियों को  निर्देश दिया । घंटे भर बाद किसी परीक्षार्थी ने पूरक उत्तर-पुस्तिका की मांग की । विनय की पीठ जैसे ही परीक्षार्थियों की तरफ हुई ,कानाफूसी के स्वर खामोशी को भंग करने लगे ।

 विनय ने गंभीरता से सबको अपना अपना काम करने का आदेश दे कर फिर से बैठक व्यवस्था के मध्य कक्ष में घूमना शुरू कर दिया । चौकसी अपने चरम पर थी । वह देख रहा था कि जैसे-जैसे समय आगे खिसक रहा है  वैसे वैसे पूरक उत्तरपुस्तिकाओं की मांग और फुसफुसाहटें बढ़ रही हैं । अनुशासन और नकल रोकने के लिए अब दंड की घोषणा अनिवार्य हो गई थी ।

"अब की बार किसी को सिर घुमाते या बात करते देखा तो उत्तर-पुस्तिका छीन कर कक्षा -कक्ष से बाहर कर दूंगा ।"--  विनय ने सख़्ती से कहा । ‘सर ! 'पगडंडियों का जमाना है ।'- किसी परीक्षार्थी ने तपाक से उत्तर दिया और उसी के साथ दबी-दबी हँसी परीक्षा कक्ष के हर कोने में फैलने की कोशिश करने लगी । "पगडंडियों पर भागने वाले अक्सर मुँह के बल भी गिर जाया

करते हैं।"- शांत भाव से विनय ने नसीहत दी।

शेष समयावधि में हँसी और कानाफूसी सिमट कर कक्ष की दीवारों में समा गई और पंखे की खड़-खड़  विनय के जूतों की आवाज के साथ सुर-ताल बिठाने के प्रयास में लगी रही ।


***

Tuesday, March 2, 2021

"लापता"

मोहिनी चाची कहाँ गई ? - बंद हवेली के आगे खड़े

ढोर -डंगरों को देखते हुए उसने साथ चलती लीना से पूछा

लेकिन जवाब दिया उसकी भाभी ने - "चन्दा के कारण मुँह

दिखाने लायक नहीं रही..शादी के बाद लापता हो गई

लड़की । उसकी ससुराल वाले आए थे पुलिस लेकर उसे ढूंढ़ने..बड़ी बदनामी हुई , एक दिन पूरा परिवार बिना किसी

 को बताए चला गया कहीं ।"

करुणा चार वर्ष के बाद आई थी अपने कस्बे में । बचपन की साथी कभी छुप्पम-छुपाई तो कभी गुड्डे-गुड़िया की शादी

करती शर्मीली सी लड़़की की छवि अनायास ही उसकी आँखों

के आगे साकार हो उठी । भोली-भाली चन्दा की इतनी छोटी

उम्र में शादी और उसके बाद लापता होना उसको बैचेन करने वाला था । उसके परिवार और उसके बारे में जान कर दुखी हुई 

करूणा । रह रह कर स्मृतियाँ कौंधती रही उसके मन में ।

दोपहर का समय .., लाइट की कटौती और लू के थपेड़े ...,

उस पर इनवर्टर का बंद होना, बड़ा तकलीफदेह था । घर के सारे

सदस्य हवा के फेर में  इधर -उधर दुबके पड़े थे कि बाहर से शोर

की आवाज कानों में पड़ी । पता चला मोहिनी चाची के परिवार

से पूछताछ के लिए पुलिस आई है । करूणा ने खड़े हो कर बेसब्री से पूछा-"चन्दा मिल गई क्या ? तभी किसी ने जवाब दिया- " पता नहीं… पुलिसकर्मी कह रहा है - चन्दा की ससुराल में घर का पुनर्निर्माण हो रहा है …, आंगन की खुदाई में हड्डियाँ मिली है।" 

***


Monday, February 22, 2021

"भरी थाली"

"हम आपसे कुछ कहना चाहते हैं"- आगंतुक ने

 ट्रे में खाली गिलास रखते हुए अपनी पत्नी की तरफ देखते

हुए रश्मि से कहा । 

"दरअसल बाबूजी चाहते थे समीर को भी जायदाद में

हिस्सा मिले ।" पत्नी ने पति की बात को आगे बढ़ाया।

  - "समीर की बारहवीं की परीक्षा है इस साल" विनम्र लहज़े में रश्मि ने ट्रे  कोने में रखी मेज पर रखते हुए गंभीरता से जवाब

दिया ।

- "आपको पेपर-वर्क के लिए समीर को  हमारे साथ तो भेजना

ही पड़ेगा।" रश्मि की बात को नज़रअन्दाज़ करते हुए

आगंतुक ने बातों की कड़ी फिर से जोड़ने का प्रयास किया ।

- "बाबूजी की अंतिम इच्छा का मान रखने के लिए उन्होंने

इनके मनाने पर बड़ी मुश्किल से एक प्लॉट हिस्से में देने के

लिए हाँ की है ।" पत्नी ने मानो अहसान जताते हुए फिर

से कहा ।

-  "माफ कीजियेगा ... इस वर्ष मैं उसे डिस्टर्ब

 करने का सोच भी नहीं सकती ।"

रश्मि अब शून्य में ताकती कुछ सोच रही थी ।

- "तो हम यह आपका आखिरी निर्णय समझे । भरी थाली को ठुकराने से पहले एक बार सोच तो लिया होता ।" पति-पत्नी ने हैरानी से खड़े होते हुए एक  साथ नाराजगी से कहा ।

अतीत की दहलीज के भीतर डूबती-उतराती रश्मि

ने दृढ़तापूर्वक वर्तमान के आंगन में खड़े हो कर  विदाई की मुद्रा में हाथ जोड़ते हुए जवाब दिया - "अपनी भरी थाली को ठोकर से बचाने के प्रयास में ही लगी हूँ ।" 

                        

***

Friday, February 5, 2021

"अधिकार"



छवि को देख गुंजन को यकीन नहीं हुआ कि यह   वही

छवि है जिसकी चंचलता और शरारतों से उन पाँच सखियों

की मंडली गुलजार हो जाया करती

 थी । अगर एक दिन वह न आती तो दूसरे दिन उसकी

जम कर क्लास लगती कि कल वह 

कहाँ थी ? कॉलेज से बी.ए.करने के बाद वह अपने

पिताजी के ट्रांसफर के साथ ही परिवार सहित भोपाल

शिफ्ट हो गई । उदयपुर में सभी से फोन सम्पर्क कुछ

समय रहा लेकिन धीरे-धीरे सभी घर-गृहस्थी में रम गई ।

अल्हड़पन की जगह परिपक्वता ने ले ली ।

वैसे परिपक्वता का संबंध शायद बचपन

के मैत्रीपूर्ण संबंधों से दूरी और खुद की गृहस्थी में रम

जाने से ही है बाकी विचारों की परिपक्वता को समझ

पाना हर किसी के बस की बात कहाँ होती है ?

         बरसों बाद अचानक मॉल में छवि गुंजन को देख कर

पहचान नहीं पाई...कितना बदल गई थी वह..चेहरे पर हरदम

रहने वाली मुस्कुराहट का स्थान उदासी और गंभीरता ने ले

लिया था । पुणे में चार साल से रहती छवि को पहली बार पता

चला कि उसकी प्रिय सखी की ससुराल यहीं पर है । आपस

में पता और  फोन नंबर ले और फिर से मिलने का वचन

लेकर उन्होंने विदा ली । मिलने का मौका भी बहुत जल्दी

ही मिला..एक दिन गुंजन का फोन आया कि पति व घर

के सभी सदस्य शादी में गए हैं वह अस्वस्थ होने के कारण

घर पर ही है क्या वो उससे मिलने आ सकती है ? मोहित

स्कूल से घर आ चुका था

अतः ना का तो सवाल ही नहीं था , पति को फोन पर जाने

की सूचना देकर  छवि के घर जाने के लिए दोनोंं माँ - बेटा

ऑटो स्टैंड की ओर बढ़ गए ।

 घर पर छवि और उसकी बिटिया थीं । जो माँ के

निर्देशानुसार मोहित को स्टडीरूम में ले गई । उसे याद आया

उनके ग्रुप मेंछवि की सगाई बी.ए. फाइनल कम्पलीट होने

से पहले ही हो गई थी , अक्सर वे सभी उसको कितना छेड़ा

करती थी और दूध सी उजली छवि उनके हँसी-मजाक के

चलते गुलाबी हो जाया करती थी । मगर अब वो छवि कहाँ

थी...ये छवि तो अलग ही है मानों मूर्ति खड़ी हो  सामने ।

बस एक ही अन्तर था  वह सजीव

थी । बहुत पूछने की जरूरत ही नही पड़ी..बच्चों के हटते

ही वह उसके कंधे पर सिर रख कर रो पड़ी । कुछ देर बाद

सहज होने पर उसने बताया--- परम्पराओं में बंधे ससुराल

में सब कुछ होने के साथ-साथ अपनी वर्जनाएं भी हैं ।

साधारण व्यक्तित्व के मालिक पतिदेव को उसका चंचल

स्वभाव पसंद नहीं था , उसकी खिलखिला कर हँसने की

आदत उनकी नजर में फूहड़ता थी तो सबसे घुलमिल कर

बात करने का स्वभाव निहायत ही मूर्खतापूर्ण हरकत ।

मायके में सब की चहेती खूबसूरत सी छवि

का सजना - संवरना भी उन्हें पसंद नहीं... अपने आपको

भूल कर  पति के साँचे में ढलने के प्रयास में  चंचल निर्झर से

स्वभाव वाली छवि संगमरमरी प्रतिमा  ही तो लग रही थी । अचानक गुंजन के रूप में अतीत को सामने देख वह अपने

पर से नियंत्रण खो बैठी और व्यथा आँखों से बह निकली ।

मोहित और अनन्या के वापस आ जाने से दोनोंं की बातों का सिलसिला वहीं थम गया और बातों का केन्द्र बिन्दु बच्चे बन

गए । अनन्या प्यारी सी बच्ची थी जो सेवन्थ स्टैंडर्ड में पढ़

रही थी । अपने घर के वातावरण के अनुसार बच्ची भी गंभीर स्वभाव की थी । सांझ होने से पहले फिर से मिलने का वादा

ले और खुद का ख्याल रखने की हिदायत दे वह मोहित के

साथ घर लौट आई ।

रात में सोने से पहले बच्चे ने होमवर्क पूरा किया कि नहीं  , यह जानने के लिए वह मोहित का बैग चेक कर रही थी तभी

मोहित ने आज जो कुछ नया देखा और सीखा उसके लिए

जिज्ञासु स्वभाव के अनुरूप प्रश्न पूछा  -- मम्मी मूल

अधिकार -- समानता ... स्वतंत्रता .. और...और…,अनन्या

दीदी पढ़ रही थी बुक में..बताओ ना क्या... और क्या होता है ?

मैं तो भूल भी गया..,.गुंजन सोच रही थी -- "अधिकारों-कर्तव्यों

की शिक्षा की पौध छोटी कक्षाओं से आरम्भ होकर  शिक्षा

के उच्चतम स्तर तक पहुँचती हुई  वटवृक्ष सी बनती है….

मगर किताबों के पन्नों से व्यवहारिकता के धरातल पर उन्हें

पाने के लिए कितने सागर..पर्वत और मरूस्थल  लांघने पड़ते

हैं । महिलाओं के लिए नंगे पैरों का यह सफ़र कठिन ही नहीं

दुसाध्य भी है । कितनी हैं ऐसी जो यह सफ़र तय कर लेती हैं

और कितनी ही बीच राह ...हौसला छोड़ देती हैं ।" 

कंधे को हिलाता मोहित अपनी माँ की तंद्रा भंग करने की

कोशिश कर रहा था ।


***




Sunday, January 24, 2021

"गणतंत्र दिवस"

 स्कूल से घर आते बच्चों के  हर्षोल्लास में डूबे 

स्वर-"आज से ग्राउण्ड में जाना है “26 जनवरी" की तैयारी

के लिए"‎...उनका यह उद्घोष घर के बाकी सदस्यों को भी

जोश और उमंग भरे उनके

 स्कूली दिनों  की  याद दिला दिया करता था ।  बच्चों के

साथ वे भी अपने बालमन की स्मृतियों में डूब जाते ।

और फिर आता वह चिरप्रतीक्षित दिन - "26 जनवरी"

मुँह अंधेरे अपनी अपनी स्कूलों की तरफ लकदक करती

यूनिफॉर्म पहने भागते बच्चे उनके साथ पूरी सज-धज

के साथ अध्यापक-अध्यापिका वृन्द , रंग-बिरंगे परिधानों

से सजे लोगों की भीड़ भोर से पहले

ही गलियों को गुलज़ार कर देती । सभी का एक ही

लक्ष्य -  समय रहते उस बड़े से ग्राउण्ड में एकत्रित होना जहाँ गणतन्त्र दिवस के आयोजन को सम्पन्न‎ होना है।

  लाउडस्पीकरों पर बजते पुरानी फिल्मों के देशभक्ति गीत --

 (1)  मेरे देश की धरती………,

(2) अब कोई गुलशन न उजड़े अब वतन 

आज़ाद है …………,

(3)   ए मेरे वतन के लोगों‎…………., 

            ओस भरी सर्दियों में जोश और ओज बढ़ा कर रक्त‎

संचार‎ तीव्र कर देते थे । एक ही ग्राउण्ड पर पहले एक छात्रा

और फिर एक माँ के रूप में जिसका बच्चा भी उसी जगह

छात्र के रूप में सहभागी बने तो मेरे जैसी मांओं के गर्व का

भाव द्विगुणित हो जाना तो बनता ही था। बैण्ड की मधुर

स्वर लहरियों पर ध्वजारोहण पर बजता राष्ट्रगान,

परेड करते एन.सी.सी.कैडेट्स ..,स्कूली बच्चे..और विभिन्न

रंगारंग कार्य‎क्रम जिनकी प्रतीक्षा सबको साल भर रहती ..

उत्सव के समापन के साथ मंत्रमुग्ध

करती छवियां आँखों‎ में भरे भीड़ मानो अगले वर्ष की सर्दियों

तक उन्हीं पलों के लिए प्रतीक्षा‎रत रहती । 

                  बदलते समय के साथ जाने क्यों शिक्षा के

उर्ध्वमुखी समाज में जीते हम लोग कई बार स्वतन्त्रता‎ दिवस

और गणतन्त्र दिवस में भेद करना भूल‎ जाते हैं‎ । बीस वर्ष पूर्व

  क्या‎ बच्चे और क्या बड़े ? साक्षर हो या निरक्षर हर व्यक्ति‎ को जुबानी याद था--

स्वतन्त्रता दिवस --"देश को आजादी मिली थी 

इस दिन, अंग्रेज भारत छोड़ कर अपने देश चले गये थे ।”

गणतन्त्र दिवस --"ये भी नही पता..,इस दिन हमारे देश का संविधान लागू हुआ था ।”

और  संविधान ?

संविधान--"लिखित और अलिखित परम्परा‎ओं और कानूनों

का वह संकलन, जिससे किसी भी देश का राज-काज

(शासन) चलता हो ।”

                         हम सब इस बार हमारा 72 वां गणतन्त्र

दिवस मना रहे हैं बड़े हर्ष और गर्व का विषय है यह हमारे

लिए‎  मगर  एक सवाल‎ उठता है मन में कि क्या अब भी

पुराने लोगों की तरह जोश और जुनून के साथ हमारे

नौनिहालों में हमारे राष्ट्रीय पर्वो के लिए‎ उत्सुकता का भाव है ? अगर नही में उत्तर मिलता है तो कारण खोजने के साथ समस्या

का समाधान‎ खोजने का उत्तरदायित्व भी हम सबका है । 

--

आप सबको गणतन्त्र दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभ‎कामनाएँ 🙏🌹🙏

जय हिन्द !!!  जय भारत !!!


【चित्र-गूगल से साभार】


Sunday, January 17, 2021

"बुकमार्क सा ख़्वाब"

                       

(This photo has been taken from Google)


 अनवरत भाग-दौड़  भरी दिनचर्या में कभी खुद के पैरों पर खड़े होने

की जद्दोजहद तो कभी सब की अंगुली थाम कारवाँ के साथ चलने 

की मशक्कत में जीवन बीता जा रहा रहा था गाड़िया लुहारों जैसा.. 

आज यहाँ-कल वहाँ ।  मेरे साथ मेरे  हम कदम बन भागते दौड़ते 

तुम ….., कब  मरूभूमि में Oasis की पहचान करना खुद सीख गए 

और कब उनकी उपयोगिता मुझे सीखाते चले गए भान ही नही हुआ । 

  मैंने कभी फुर्सत के पलों में किसी उपन्यास में खुद को

डुबोये एक ख्वाब देखा था इन्द्रधनुषी तितली सा ...जो कल्पित 

होते हुए भी मेरी आँखों में जीवन्त था अपनी पूरी सम्पूर्णता के साथ 

 उस ख्वाब को मैं भूल भी गई थी किसी उपन्यास के बीच दबाये  बुकमार्क की तरह । वहीं ख़्वाब कभी बातों बातों में तुमसे  साझा 

करके भी भूल गई थी ।

   आज वही पुराना उपन्यास और उसमें बुकमार्क सा दबा मेरा ख़्वाब तुमने मेरी खुली हथेली पर रख दिया है…और वह इन्द्रधनुषी 

तितली सा पंख फैलाये मेरी आँखों के सामने साकार है अपनी पूरी जीवन्तता के साथ । थैंक्यू…... !!!  

तुम्हारे नेह की मैं ऋणी रहूँगी युगों… युगों तक ।


***

Thursday, January 7, 2021

'सत्य"

 "सभी लड़कियाँ ध्यान दें ..घर से सीधे स्कूल आए और

सीधे घर जाए । आपस में रंग खेलते या छुट्टी के बाद कहीं

भी मैंने स्कूल की किसी लड़की को देखा तो मुझसे बुरा

कोई नहीं होगा ।

 किसी भी लड़की के पास अगर रंग है तो आज ही 

अपनी क्लास टीचर को या फिर मुझे जमा करा दें ।" 

स्कूल की प्रधानाचार्या ने सख़्ती से प्रेयर-हॉल में छात्राओं

को संबोधित करते हुए कहा ।

पूरे हॉल में ऐसी शांति छाई थी कि कहीं पिन भी गिरे तो

आवाज़ सुनाई दे ।

 "होली के दिनों में हर साल लड़कियों को रोज़ाना यही

भाषण कड़वी दवाई की तरह पिलाया जाता है ।"

अध्यापिकाओं ने प्रेयर- हॉल छोड़ते हुए धीमे से वार्तालाप

जारी रख वातावरण को हल्का करने की कोशिश की ।

नई-नई अध्यापिका पद पर नियुक्त आंकाक्षा को

अनुशासन के नाम पर इतना सख़्त संबोधन पसन्द नहीं

आया। वह खामोशी से धीरे-धीरे स्कूली व्यवस्था समझने

की कोशिश कर रही थी । 

स्टाफ-रूम में सब के बीच से होती हुई वह रजिस्टर

उठा कर अपना पहला पीरियड लेने कक्षा कक्ष की

सीढ़ियों की ओर बढ़ी तो सामने जो दृश्य देखा वह कम से

कम उसके लिए तो अप्रत्याशित ही था- "सामने दो

लड़कियां प्रधानाचार्या की कोप भाजन का शिकार बनी

खड़ी थीं हाथों में गुलाल की पुड़िया थामे ।"

            कुछ सोचते हुए वह कक्षा में पहुँची तो गुड मॉर्निंग

के कोरम और उपस्थिति रजिस्टर की खाना-पूर्ति के बाद

उसने बोर्ड पर जैसे ही गाँधी जी के राजनीतिक प्रयोग की

चर्चा के लिए  टॉपिक लिखना शुरू किया वैसे ही कक्षा-कक्ष

में एक शरारती आवाज़ ने सरगोशी की - "आज सत्य पिट

रहा है सीढ़ियों के पास।"

आवाज़ वह पहचान गई थी मगर बिना पलटे 

बोर्ड पर लिखते हुए गंभीरता से कहा -

"कोई बात नहीं.., सत्य अमर है क्षणिक नहीं । आवेश में

विवेक सो जाता है कभी-कभी । जब जागेगा तब

जीत सत्य की ही होगी ।" 


***