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Saturday, September 19, 2020

"अन्तर"

 स्कूल से आकर अपना बैग पटकते हुए दिशा ने शिकायती लहज़े में माँ से कहा - “तुम मुझ में और भाई में भेद-भाव रखती हो , उसको शाम तक भी घर से बाहर आने-जाने की छूट और मुझे नही?” माँ ने निर्लिप्त भाव से उसकी ओर देखते हुए पूछा-”आज यह सब कहाँ से भर लाई कूड़ा-कबाड़ दिमाग में।’ 

              “ आज स्कूल में “समाज में लिंगभेद’ पर स्पीच थी , उसमें यह बात भी थी कि लड़कियों को लड़कों से कम समझा जाता है । लड़कों को ज्यादा सुविधाएँ मिलती हैं। और यह बात सच भी है मुझे बाहर कहाँ खेलने जाने देती हो तुम ?"

                                                      माँ ने बड़ी सहजता से कहा-”भाई के हर महिने बाल कटाती हूँ , तेरे बाल लम्बे हैं ,भरी दोपहरी या शाम को गलियाँ सुनसान होती हैं ऐसे समय-कुसमय में बुरी आत्माएँ घूमती हैं इसलिए लड़कियों को बाहर जाने से रोका जाता है । बाकी तू जानती है मैंने खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने में कभी भेद नही किया तुम भाई-बहनों में। "बाल-सुलभ जिद्द वही की वही रुक गई क्योंकि दिशा को भूतों-प्रेतों के नाम से ही डर लगता था यूं भी लाईट जाते ही वह उल्टा-सीधा जैसा भी याद था हनुमान-चालीसा बुदबुदाना शुरु कर देती थी।

                      दिशा सोच रही थी कि कुछ हद तक             माँ की बात सही भी थी माँ को उसने अपने परीक्षा-परिणाम पर सदा खुश होते ही देखा। छोटे भाई और बहन को बड़े भइया की बजाय अच्छे से वह रखेगी इस बात का विश्वास था उन्हें। कई बार वाद-विवाद तो कई बार निबन्ध प्रतियोगिताओं में दहेज-प्रथा और लड़के-लड़की के मध्य असमानता जैसे विषय उठ जाया करते थे । नारी जाति के प्रति उपेक्षित व्यवहार की चर्चा कक्षा-कक्षों में भी होती थी और वह स्कूल से आते ही राम चरित मानस या गीता-पाठ करती माँ के पास अपना रोष व्यक्त करने पहुँच जाती मानो उसकी जिद्द है कि वह माँ को साबित कर दिखाएगी कि अन्तर है समाज में नारी और पुरुष वर्ग में ।

                      माँ शान्ति से बात सुनती और समझाती कि अवसर की समानता लड़कियों पर भी निर्भर है।वैदिक काल में मैत्रेयी,अपाला, गार्गी और विश्ववारा जैसी विदुषियाँ ऋषियों के समकक्ष थीं। माँ दुर्गा,लक्ष्मी और सरस्वती भी स्त्रियाँ ही हैं ना….,और तू ये गाती फिरती है -”खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।” यह भी तो लड़की ही थी ना ।"

कई बार वह उनके सामने हथियार डाल देती तो कई बार अपनी बुध्दि अनुसार नए तर्क खोजने लगती। मगर मकसद एक ही रहता कि माँ से अपनी बात मनवा कर छोड़ेगी ।

               आज दिशा बड़ी हो गई है , माँ भी नही रही। घर - बाहर लड़कियों को देखती है , कुछ बड़ी हैं  तो कुछ बड़ी हो रही हैं । नौकरियाँ कर रही हैं स्वावलंबी भी हैं मगर सवाल आज भी वही हैं। जिद्द भी वही है कि समाज में लिंगभेद असमानता है । लड़कियों के लिए विकास के अवसर कम है वगैरा-वगैरा ।

     ऐसे समय में दिशा को माँ के समझाने का ढंग याद आ जाता है। असमय निर्जन स्थानों पर होने वाली महिलाओं के साथ दुर्घटनाएँ..  ,अक्सर माँ के द्वारा समय- कुसमय बाहर जाने से रोकने के तर्कों की याद  दिलाती है। 

               आज की भागती-दौड़ती दुनियाँ में शायद वक्त ही नही है किसी के पास बालमन की जिज्ञासाओं को शान्त करने का।

                        “Don’t argue . चुप्प कर , ये कौन सा project है ?अपनी tuition-teacher.से पूछ लेना ।" जैसे जुमले व्यस्त भाव से सुनने को मिल जाते हैं। सवाल आज भी वही हैं बस जवाब देने के ढंग में अन्तर आ गया है शायद ।


                          ×××××

Sunday, September 6, 2020

"5 सितम्बर"

 कल-कल बहते झरने सी हँसी थी उसकी । भूमिका अक्सर स्कूल के गेट में घुसती तो वो हँस कर गुड मार्निंग कह अपनी हथेली भूमिका की तरफ फैला देती । स्कूल में किसने बनाया होगा यह नियम पता नहीं लेकिन ग्यारहवीं कक्षा की लड़कियां नियम से स्कूल आने वाली शिक्षिकाओं की स्कूटी या साइकिल गेट से लेकर साइकिल स्टैंड पर खड़ी कर के आती ..लड़कियों की ड्रेस साफ-सुथरी है ना..लेट आने वाली लड़कियों को लाइन में खड़ा करना सब उन्हीं के जिम्मे होता ।अगले वर्ष ड्यूटी अगली ग्यारहवीं की होती ।

      भूमिका के भुलक्कड़ स्वभाव में था दिनांक भूल जाना..वह चॉक उठा कर बोर्ड की तरफ मुड़ते हुए पूछती - डेट ? उसकी क्लास में से शरारती सुर उठता ..हमारे रिवीजन.. होमवर्क की डेट कभी नहीं भूलते आप ? भूमिका मुस्कुरा भर देती । एक दिन वह भूमिका की क्लासमेट नेहा के साथ सकुचाई सी उसके घर के गेट पर थी । नेहा से बातचीत में पता चला वो उसकी भांजी

 है । राजनीति  विज्ञान में मदद चाहिए उसे यदि वह पढ़ा सके … अपने सिद्धांतों के कारण भूमिका ने उसे ट्यूशन की हामी तो नही भरी लेकिन वादा किया कि वो जब भी परेशानी हो स्कूल के अतिरिक्त घर आकर पढ़ सकती

 है । अपने मिलनसार स्वभाव के कारण धीरे -धीरे वह भूमिका के परिवार के सदस्य जैसी बन गई ।  सबके जन्मदिन पर हंगामा मचाने वाली लड़की  का जन्मदिन अप्रैल में आता है उसने ठोक-पीट कर भूमिका को रटा दिया था । जन्मदिन वाले दिन उसने आँखों में अनोखी चमक के साथ भूमिका मैम से स्कूटी की चाबी ली..स्टैंड पर खड़ी की । क्लास में भी चॉक-डस्टर ,बुक निकाल कर मेज़ पर रखी ।भुलक्कड़ मैम को 'डेट" भी बताई ।

                चार-पाँच दिन के अन्तराल पर वह घर आई तो  उदास सी थी । उदासी का कारण पूछने पर जवाब

भूमिका की  मम्मी ने दिया - 'तूने उसको बर्थडे तक विश नहीं किया और अब पूछ रही है क्या हुआ ?' भूमिका ने

सिर पकड़ लिया अपना..पता नहीं अंकों के साथ उसका

क्या आकड़ा था ..हर बात याद रखने वाली भूमिका कभी भी डेट , फोन नम्बर याद नहीं रख पाती थी । भूमिका को सिर पकड़े देख उसने मासूमियत से हँसते हुए कहा - 'कोई बात नहीं आंटी जी हम इनको डेट याद रखना भी सीखा देंगे ।'

            कॉलेज में जाने के बाद भी उसने घर आना नहीं छोड़ा यदि कुछ दिन नहीं आती तो वह समझ जाती अपने घर गई होगी पेरेंट्स के पास । एक बार की यूं ही गई वह नहीं लौटी ...नेहा से पता चला रोड एक्सीडेंट में उसने 5सितम्बर को आखिरी सांस ली ।

                      हर 5 सितम्बर को भूमिका के कानों में एक आवाज़ गूंजती है - 'कोई बात नहीं आंटी जी हम इनको डेट याद रखना भी सीखा देंगे ।' 


                                     ***

Wednesday, September 2, 2020

क्षमा बड़न को चाहिए...

सुबह और शाम खुली हवा में घूमना बचपन से ही बहुत प्रिय रहा है मुझे । इसका कारण शायद पहले खुले आंगन‎ और खुली‎ छत वाले घर में रहना रहा होगा । शहर में आ कर अपना यह शौक  मैं‎ अपने आवासीय कैंपस के 'पाथ वे' में घूम‎ कर पूरा कर लेती हूँ । आज कल वैश्विक महामारी के चलते घूमना बंद है मगर कमरे की खिड़की से दिखते 'पाथ वे' को देखते समय एक दिन की घटना का स्मरण हो आता है । कैंपस में बने बॉस्केटबॉल ,फुटबॉल या टेबल टेनिस कोर्ट में शाम के समय अक्सर‎ बच्चों की टोलियां मिल जाती थी क्योंकि शाम के बाद तो वहाँ उनके अभिभावकों का आधिपत्य होता था अतः शाम का समय उनके शोर-शराबे से गुलज़ार रहता । उस दिन बच्चों‎ के ग्रुप के बीच एक औरत खड़ी मोबाइल पर कुछ करती दिखाई‎ दी, दूसरे राउंड में भी उसे वहीं‎ खड़े देखकर कुछ अजीब‎ सा लगा कि क्यों बच्चों‎ का रास्ता‎ रोके खड़ी है दूर‎ खड़ी होकर भी बात कर ही सकती है मगर कैंपस में रहने वालों के लिए सार्वजनिक‎ जगह जो ठहरी और उस पर किशोरवय  के बच्चे खेल रहे हो तो किसी का भी उस जगह का उपयोग करने का समान हक है यहाँ‎ वर्जना अस्वीकार्य सी है । अगले राउंड तक माहौल अन्त्याक्षरी जैसा हो गया बच्चों‎ का झुण्ड एक तरफ और महिला दूसरी तरफ मगर जो कानों ने सुना वह अप्रत्याशित था , बच्चे‎ ---  “But aunty , we are  seniors .और महिला बराबर टक्कर दे रही ही थी----  O…, excellent . listen to me you are also kids. गर्मा गर्म बहस सुन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची  कि महिला का बेटा जो उन बच्चों‎ से बेहद छोटा था बास्केट बॉल खेलना चाह रहा था  जिसके चलते  बड़े बच्चों‎ को परेशानी हो रही थी‎ और समस्या यह थी कि दोनों पक्षों‎ में से  कोई भी पीछे हटने को कोई तैयार नही था । बच्चों का महिला से इस तरह बहस करना सही भी नहीं लग रहा था ।
 घर की तरफ लौटती मैं सोच रही थी कि अधिकार भाव के लिए सजगता कहाँ अधिक‎ थी । Morality के मानदण्ड पर तो दोनों पक्ष ही गलत थे ऐसे में चलते चलते रहीम जी का दोहा ----छमा बड़न को चाहिए ,छोटन को उत्पात …याद आ गया और उसी के साथ बच्चों‎ का पलड़ा भारी हो गया ।

XXXXX

Sunday, August 30, 2020

"बरफी"【समापन किश्त】

लगभग महिने भर बाद भुआ ने एक दिन अचानक आकर कहा -’पाँच-सात दिन के लिए गाँव जाना है  ,कुछ पैसे चाहिए छुट्टी के साथ ; अगले महिने पगार से कटा लेंगी।’
इस घटना के दस दिन बाद उनके लौटने पर जो बातें मैंने जानी उन्हें सुनकर मेरा मन उनके प्रति आदर से भर उठा वहीं उनकी आँखों की गहराई और सूनेपन का राज भी समझ में आ गया। बरफी भुआ एक भले घर से ताल्लुक रखती थी उनके पिता और पति दोनों की अपने-अपने गाँवों में अच्छी जमीनें थी। शादी के बाद दुर्भाग्यवश उन्हें कोई सन्तान नही हुई और देवरानी-जेठानी से बच्चा गोद मांगने पर ताना मिला -  “काठ के बच्चे बनवा कर खिला लो।” उस ताने को सुनने के बाद बरफी भुआ ने कुल्हाड़ी पर पैर नही रखा बल्कि कुल्हाड़ी उठाकर पूरी मजबूती के साथ अपने पैरों पर दे मारी। पति के लिए दुल्हन लाई और दोनों से अपने लिए एक बच्चा मांगा मगर नसीब में सुख होता तो अपना ही न हो जाता। बेटे की जगह रोजाना की कलह और अपमान झोली भर-भर के मिलने लगा। पीहर में माता-पिता का निधन हो चुका था ,बहन-भाइयों की अपनी-अपनी गृहस्थी थी ऐसे में कौन उनकी पीड़ा सुनता। पति के देहान्त के बाद आधी रात पति के बेटों और पत्नी द्वारा अपमानित होकर भुआ ने घर छोड़ दिया और एक अनजान कस्बे में आकर मेहनत मजदूरी करने को मजबूर हुई। उस अनजान से गाँव के अपरिचित से मोहल्ले के सभी घरों के बड़े और बच्चों के बीच अपने आत्मीय स्वभाव से कारण वह बरफी भुआ कब बन गई
उन्हें भी पता नही चला।
काल का पहिया यूं ही धीरे-धीरे सरक रहा था कि एक दिन उनके पति के बड़े पुत्र की विधवा गोद में बच्चा लिए उनके सामने आ खड़ी हुई अभागिन का नाम देकर घरवालों ने उसे ठुकरा दिया था । उसकी व्यथा से द्रवित भुआ को अपने प्रति हुआ अन्याय भी याद हो आया। सन्तान को तरसती दुखियारी माँ ने उस बालक को अपना पोता मानते हुए उसके हक के लिए  मुकदमा दायर कर दिया अपने पति के बेटों और पत्नी पर। पूरी बात सुनने के बाद मैंंने भारी मन से कहा - भुआ आपका समय तो आपने यूं ही निकाल दिया अब ..., मेरी बात काटते हुए उन्होने कहा - ‘उस महारानी को संतान के  लिए लाई थी ,खुद को तीन हुए तो दूसरों की बेक़दरी करेगी। मैं समझ लूंगी जो नही रहा वो मेरा था। मैं समझ गई भुआ का पुराना दबा रोष, संतान मोह और स्वाभिमान एक साथ जाग उठे हैं। और अब उन्हें रोकने वाला कोई हो ही नहीं सकता ।  महिने  दर महिने बीतते रहे वो जब भी छुट्टी मांगती मैं समझ जाती कि केस की सुनवाई की तारीख पर जा रही होंगी । धीरे-धीरे मोहल्ले वालों ने आलोचना शुरु कर दी - ‘बरफी का दिमाग खराब हो  गया अब इस उम्र में क्या करेगी जमीन-जायदाद का।' वो जब भी ऐसी बातें सुनती बैचेन हो जाती, काम करते समय स्वभाव में उतावलापन देखते ही मैं समझ जाती कि आज कुछ हुआ है।
      हमेशा की तरह इस बार भुआ गाँव का नाम ले कर गई और वापस आई तो चेहरे की झुर्रियाँ और माथे की सलवटें अधिक ही गहरा गईं थीं और आँखों का सूनापन भी बढ़ गया था । डरते-डरते पूछा तो जवाब कुछ यूं  मिला - 'वकील कहता है- घर की लड़ाई है मिल-बैठ कर सुलझा लो और इन लोगों को माफ कर दो ।' वो महारानी सामने खड़ी थी…, मैंंने भी कह दिया सब के बीच - ' तीस बरस अपने सिर पर घास के गट्ठर और गाय-भैंसों का गोबर ढोया है इस महारानी से तीस बरस नही तीन महिने ही सही यह काम करवा दो मैं माफ कर दूंगी।' बाहर आकर काले कोट वाला बोला -' तेरा दिमाग खराब है बरफी!' सुना दिया उसको भी - 'वही तो खराब है नही तो मैं भी तुम्हारी तरह काला कोट पहनती या इसकी तरह महारानी बन के रहती।'
       कुछ महिनों बाद फिर उन्होने गाँव जाने की बात कही। मैं भी उनका चेहरा देखते ही समझ गई कि केस की तारीख पर जा रही है। पूछने पर बीड़ी पीते हुए हाँ में सिर हिलाया। अब की बार गई भुआ वापस नही लौटी, कुछ महिनों बाद मेरा तबादला कहीं और हो गया। दो-तीन बार काम वश उधर जाना हुआ तो वहाँ भी पहुंची जहाँ वे रहती थीं । उजाड़ खण्डहर घर भुआ के चेहरे की झुर्रियों और सूनी आँखों जैसा ही दिख रहा था उस पर जंग खाया ताला उनके न लौटने की गवाही दे रहा था । आस-पास के लोगों से पूछने पर जवाब मिला - पता नही गाँव गई थी वापस नही लौटी, उम्र भी हो ही रही थी……, कहीं मर-खप गई होगी ।
 मन में उनकी व्यथा की गठरी लिए मैं वापस लौट आई । अक्सर मुझे बरफी भुआ की याद आ ही जाती है और उनके दुखों और कड़वाहटों को याद कर के मन भी उदास हो जाता है।

                                ***  
                                                     【 समाप्त 】

Thursday, August 27, 2020

"बरफी" 【प्रथम किश्त】

पिछले कुछ दिनों से रह-रह कर मेरी स्मृति में ‘बरफी भुआ” का चेहरा कौंध रहा है। एक दिन अचानक घर की महरी ने काम करते-करते कहा -तुम्हारा सुबह जल्दी काम पर जाने का समय और शाम को सर्दियों में देर हो जाने से काम का हिसाब नही बैठ रहा, मेरे घर में छोटा बच्चा भी है तुम्हारे यहाँ बरफी काम कर दे क्या?
            पहले के समय में घरों पर काम करने आने वालियों को आज की तरह ‘मेड’ या नाम लेकर कम ही पुकारा जाता धा । उम्र में बड़ी हो तो ताई-चाची का सम्बोधन और उनके घर की बहू-बेटी से भाभी,बहन और भुआ का रिश्ता स्वमेव ही जुड़ जाया करता था यहाँ मेरी हमउम्र माँ से बड़ी औरत को बरफी ही कह रही थी जो मेरी नजरो में अशिष्टता थी । मगर वो ही क्या सभी पीठ पीछे बरफी और मुँह पर ‘बरफी भुआ’ बुलाते थे । बचपन में  मैंंने भुआ को अक्सर मोहल्ले के घरों में जिनके यहाँ गाय-भैसें थी घास के गट्ठर लाते और फुर्सत में घर के सामने की खण्डहरनुमा हवेली के चबूतरे पर बैठकर बीड़ी फूंकते देखा था। मेरा बाल मन उनकी बीड़ी की लत को सहज ही स्वीकार नही कर पाता था , अपनी गहरी सोचती आँखों के साथ उस समय वे मुझे एक ‘पहेली’ जैसी नजर आती थीं। उनके लिए मेरे हाँ करते ही बरसों पुरानी महरी ने चैन की सांस ली।
अगले दिन सुबह-सुबह एक दुबली-पतली बूढ़ी सी औरत ने मेरा नाम पुकारा। झुर्रियों भरा चेहरा जहाँ जीवन में उठाए कष्टों का परिचय दे रहा था वहीं धंसी हुई आँखों में आज भी उतनी ही गहराई थी और चिर परिचित आदत भी आज भी वही की वही थी।मुड़ी-तुड़ी साड़ी के कोने में बंधे बीड़ी के बण्डल को खोलते हुए बोली-’तुझे बुरा ना लगे तो एक बीड़ी पी लूं ,लत लग गई अब छूटती ही नही।’ मैंंने कहा- छोड़ दो भुआ सेहत खराब होती है । तो जवाब मिला - 'तेरी तरह किसी ने ना की सेहत की फिक्र नही तो कब की छोड़ दी होती' यह कह कर फीकी सी हँसी हँस दी और बोली - ‘कमली ने बोला है तुम्हारे यहाँ काम करने को।’  झिझकते हुए मैंने पूछा -झाड़ू-बर्तन का काम है भुआ, करोगी ? क्योंकि बालपन से  ही उन्हें केवल गाय-भैसों की देखभाल करते ही देखा था।
      ‘हाँ बेटा ! अब पहले की तरह लोगों ने पशु पालने बन्द कर दिए तो पापी पेट के लिए तो कुछ करना ही पड़ेगा,ये तो बखत पर खर्चा-पानी  मांगता है ।' यह कहते हुए बरफी भुआ ने उसी दिन से घर का काम संभाल लिया। सर्दियों में दिन छोटे होने के कारण और बर्तन-सफाई के अतिरिक्त वह और भी दो काम कर देती जिसे मुझे बड़ी राहत मिली। 
       निर्धारित गतिविधियों के अनुसार मैं और भाई अपने काम पर पर चले जाते। घर पर मेरा बेटा रहता जो स्कूल से आने के बाद अपनी कॉमिक्स या होमवर्क जैसे कामों में लग जाता। कई बार तो मेरे आने से पहले ही वे काम कर के चली जाती। उनकी व मेरी बोल-चाल बड़ी सीमित मात्रा में थी ,छुट्टी वाले दिन मैं अतिरिक्त कामों में लगी रहती। कुछ महिनों बाद अचानक एक दिन भुआ का स्नेहिल स्वर सुना -’आज बच्चे की हँसी सुनी है ,आज घर में रौनक आई है ; तुम तीनों तो सदा घर के कोनों में रखी चीजों जैसे लगते हो।’ हुआ यूं कि मेरी बहन कुछ दिनों के लिए ससुराल से आई थी और उसके आते ही मैं भाई और मेरा बेटा सचमुच सक्रिय हो उठे थे।दरअसल सच यह भी था कि बरसों से साथ रहने के आदी हम अपनी बहन की कमी एक शिद्दत से महसूस करते थे। उसके आने से हमारा घर सचमुच चहक उठा था।
             बरफी भुआ का ममतामयी रुप तब और भी गहरेपन सॆ दिखा जब बहन वापस ससुराल जा रही थी, भुआ ने अपने पुराने अन्दाज में साड़ी का पल्लू टटोला तो मुझे बड़ी खीज हुई कि अब सब के सामने बीड़ी पीयेंगी लेकिन देखा तो उनके हाथ में बीड़ी के बण्डल की जगह पाँच रुपये का नोट था। बहन के हाथ में रखती हुई बोली - “बेटी सास को माँ, ननदों को बहन समझना और देवरानी-जेठानी को सदा सवाई रखना। “बहन ने झिझकते हुए कभी हथेली में रखे पाँच रुपये के नोट को तो कभी मेरी ओर देखा मगर भुआ के अपनेपन को अस्वीकार करने की हिम्मत मुझ से नही हुई।
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【अगले अंक में समाप्त】

Thursday, August 13, 2020

"स्वतंत्रता दिवस की स्मृतियाँ" 【संस्मरण】

        
     【 चित्र : गूगल से साभार 】

स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस का एक अनूठा आकर्षण
रहा है मेरे मन में । बचपन में स्कूली मार्चपास्ट में भाग लेना
और बैंड के साथ कदम से कदम मिलाते राष्ट्रीय ध्वज को
सलामी देते हुए मंच के सामने से गुजरना रोम रोम में पुलकन
भर देता था । मगर नहीं भूल पाती शिक्षिका बनने के बाद का
बैंड की इंचार्ज के रूप में अपना पहला पन्द्रह अगस्त जब
स्कूल की प्रिन्सिपल ने यह दायित्व मुझे सौंपा । दरअसल
हमारे यहाँ स्कूलों की परम्परा थी कि हर शिक्षक को शिक्षण
कार्य के अतिरिक्त एक सहायक गतिविधि का दायित्व भी
वहन करना है ।
 वहाँ अपने हिस्से में बैंड की जिम्मेदारी आई । बैंड की
प्रैक्टिस करवाने हफ्ते में तीन दिन आर्मी के रिटायर्ड बैंड सर
आते थे सो परेशानी कुछ खास थी भी नहीं लेकिन शीघ्र ही
उन परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ा । हुआ ये कि बैंड
सर  इस्ट्रूमेंट्स की सफाई वाले दिन यानि पन्द्रह अगस्त से
पहले दिन अनुपस्थित हो गए । हमें लगा कोई नहीं … आसान
सा काम ही तो है साफ - सफाई ।
        बड़े जोश से सब छात्राओं ने ब्रासो और प्राइमर के
साथ इस्ट्रूमेंट्स चमकाये और अगले दिन के लिए  सहायक
सर्वेंट से रखवा दिये । पन्द्रह अगस्त की सुबह...चार स्कूलों
का स्टाफ और मार्चपास्ट के ट्रुपस् नियत स्थानों पर..,यह पहले
से ही तय था कि मुख्य अतिथि द्वारा ध्वजारोहण के साथ
ही राष्ट्रगान हमारे स्कूल के बैंड द्वारा ही बजना है । जैसे
ही ध्वजारोहण के साथ राष्ट्रगान शुरु हुआ अधिकांश
ट्रमपेंटस् के सुर गायब और फूंक मारती 'की' चलाती लड़कियों
की आँखें हैरत से बाहर..चंद बारीटोनस् और ट्रमपेंटस्
की आवाज़ बिल्कुल धीमी.. और इसी के साथ मेरे माथे पर
ठंडा पसीना.. लेकिन  एक सेकेंड की देरी किये बिना फ्लूट्स
ग्रुप ने आँखों ही आँखों मुझे आश्वस्त कर स्थिति की गंभीरता
को बहुत अच्छे से संभाला । पूरा  राष्ट्रगान लगभग
फ्लूट्स ,बेसड्रम और साइड ड्रमस के सहारे बजा । तब तक
बैंड सर भी मंच छोड़ ग्रुप के पास पहुंच चुके थे । मुख्य
अतिथि महोदय के भाषण के दौरान उन्होंंने स्थिति संभाली
और सभी ट्रमपेंटस् की चाबियां दुरूस्त की । लड़कियों का
मूड तब सुधरा जब उनका समूह अन्त में  ...सारे जहां
से अच्छा..बजाता मंच के सामने से गुजरा और उनके लिए
खूब तालियां बजी और वाहवाही हुई । बैंड सर की भी नये
प्रयोग के लिए प्रशंसा हुई  जिसको स्वीकारते वे थोड़े
असहज थे ।
        बाद में पता चला कि फ्लूट्स की मधुर ध्वनि और ड्रमस
की बीट्स पराम्परागत बैंड में एक अभिनव प्रयोग समझी गई ।  मेरे अनजान होने और छात्राओं के जोश के कारण सफाई
के दौरान ट्रमपेंटस् की चाबियों के नंबर उल्टे-सीधे डल गए
जिनके चलते उनसे आवाज़ निकलनी बंद हो गई । मैं भी जब
तक वहाँ कार्यरत रही कसम खा ली कि इस्ट्रूमेंट्स के
रख- रखाव और सफाई कार्यक्रम के बाद कम से कम दो
प्रैक्टिस तो जरूर होगी ।
     यद्यपि बैंगलोर में भी आवासीय परिसरों में राष्ट्रीय पर्व
बड़ी धूमधाम से मनाये जाते हैं मगर मुझे टी.वी. पर ही
स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम देखना 
व अतीत की वीथियों में विचरण करना अच्छा लगता है । मैं
जब भी बैंड की धुन पर ध्वजारोहण के साथ राष्ट्रगान सुनती हूँ
तो सावधान की मुद्रा में खड़ी हो जाती हूँ और मेरे साथ घर के
सदस्य भी । उस मधुर गूंज के साथ बचपन की मार्चपास्ट
और स्कूल के बैंड के साथ मेरे राष्ट्रीय पर्वों के शुभ अवसरों
पर गौरवान्वित करने वाले पलों के दृश्य उस वक्त मेरी आँखों के आगे साकार हो उठते हैं ।

                                  ***

Saturday, August 1, 2020

"कोरोना"

हमेशा हँसने और गोरैया सी फुदकती रहने वाली वैभवी खामोश सी हो गई  है कुछ दिनों से । दिन भर गिलहरी की तरह चटर-पटर कुछ -कुछ कुतरने वाली लड़की ने आज कल मुँह सिल लिया लगता है अपना । बहुत बोलने और 'किडिश' हरकतें करने वाली वैभवी अपनी चुलबुली आवाज से अपना घर ही नहीं मेरे घर की बालकनी भी गुलजार रखती 
थी । आज कई दिनों के बाद दिखी खड़ी । जब मैंने उसे आवाज़ दी तो उसने पलट कर देखा ..,चेहरा भाव विहीन सा लगा मुझे जैसे नाराज हो । फूडी लड़की आज कल चूजी
बन गई लगती है इसका असर उसकी सेहत पर दिख रहा है ।
-- 'अरे क्या हुआ तुम्हें..आज कल घर बैठ कर लोग वजन बढ़ा रहे हैं और तुम कम कर रही हो ?'
-- 'वो बस ऐसे ही..।' फीकी सी मुस्कुराहट के साथ वैभवी ने जवाब दिया ।
--'क्या हुआ वैभवी ?'
उसने जैसे मेरी आवाज सुनी ही ना हो..अपनी बालकनी से सामने सूनी रोड को देखते हुए सवाल किया --'कोरोना कब खत्म होगा ?' और बिना उत्तर सुने फिर से सड़क पर नजर टिका दी ।
 उत्तर तो मेरे पास भी कहाँ था उसके सवाल का ? उसको सूनी रोड को घूरता देख मैं भी उसके इस कार्यक्रम में शामिल हो गई और रेलिंग पकड़े हुए सोच रही थी कि कोरोना का असर यदि इसी तरह रहा तो आने वाले समय में इसकी भरपाई होनी बहुत मुश्किल लगती है ।

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