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Monday, January 3, 2022

"सर्कस"

   अपने अध्यापन कार्य​ से जुड़ते ही मैंने एक लेख पढ़ाया था “सर्कस​ का खेमा” लेखक का नाम भूल गयी हूँ लेकिन विषयवस्तु की शुरुआत आज भी अच्छी तरह से याद है 

लेखक कुछ लिख​ रहा था और दूर कहीं से आती सर्कस के खेमे की आवाजों और रंग बिरंगी रोशनियों ने उस का ध्यान भटका दिया था। अपने पहले कार्य को भूल कर लेखक ने सर्कस की आन-बान​ और शान का वर्णन करते हुए उसकी वर्तमान उपेक्षा और दुर्दशा का मार्मिक​ वर्णन किया था।

उस लेख को पढ़ते ही मुझे किशोरवय की सर्कस से जुड़ी

एक घटना याद हो आयी। 

         बरसों बाद अपने जन्म स्थान लौटने पर मेरी सहेलियों ने बड़ी गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया । एक दिन सीरी रोड की तरफ जाते हुए मुझे अपनी सहेलियों की सर्कस को लेकर चहक जैसे  उन्हीं की दुनिया में ले गई – “इस जगह लगा था पंडाल, यहाँ स्कूटर के साथ फोटो खिंचवायी थी हमने और सुन…, बहुत सुन्दर सुन्दर लड़कियाँ थी सर्कस में मगर उनकी आँखों का खोयापन कुछ और ही कहानी कह​ रहा था। उस समय की कुछ सामाजिक​ वर्जनायें थी लड़कियाँ कहाँ बोल पाती थी आज की तरह।“मैंने तीन बार देखा एक बार​ माँ के साथ, दूसरी बार स्कूल से और तीसरी बार भुआ आयीं थीं उनके साथ। पागल है तू! थोड़े दिन​ पहले आ जाती ।” - जान्हवी ने अपना ज्ञान बघारते हुए कहा।वह अब भी सर्कस की दुनिया में ही खोयी थी । बरसों बाद मिली थीं हम मगर मेरे बारे मे सोचने की फ़ुर्सत ही कहाँ थी सबके पास। बरसों की मेरी अनुपस्थिति में क्या क्या खोया मैंने इसी तथ्य को बताना जरूरी था सबके लिए । वक्त के साथ सब कुछ समाता गया अतीत के गर्भ में …,मगर मैं कभी नहीं भूल पायी उस जगह को जहाँ खड़े होकर उन सबने  सर्कस के बारे में बातें की थी | उस जगह को जब भी देखा मेरा मन हमेशा उस काल्पनिक संसार मे जा पहुँचा भले ही मैंने वह संसार न देखा हो।

                शिक्षण कार्य से जुड़ने के बाद “सर्कस का खेमा” पढ़ाने का अवसर मिला तो पाठ पढ़ाते समय शायद मैं अपनी छात्राओं को भी उसी काल्पनिक संसार में ले गयी। पाठ की समाप्ति पर कक्षा में एक प्रश्न उछला- “आपने सर्कस 

देखा है ?” और मैंने जवाब दिया था -  “नही, मगर अवसर मिला तो देखूंगी ज​रूर।”

             और अवसर भी मिला कुछ वर्ष बाद​ जब​ मैं अपने भाई के यहाँ महाराष्ट्र के एक शहर​ में थी तब । एक दिन स्कूल से आते ही भतीजी ने चिल्लाते हुए कहा – “सर्कस आया है हमारे स्कूल के पास। बहुत​ सारे लोग परदे लगा रहे थे। हम भी चलेंगे देखने ।” दूसरे दिन​ उनकी मेड ने आते ही कहा-“भाभी पंडाल बाँध रहे थे वो लोग, कल से "शो" चालू होगा।” मुझे लगा सर्कस के लिए चहक तो आज भी बाकी है कल मेरी सहेलियों में थी आज अमिता में है। दूसरे दिन मैं और भाई के दोनों बच्चे एक साथ चिल्लाये -"हमें सर्कस देखना है। भाई ने आश्चर्य के साथ कहा- “दी आप देखोगी ? मेरा मन बचपन के आंगन मे विचरण कर​ रहा था जिद्द थी भुआ और बच्चों की। हमें  देखना ही है।पहले दिन और वह भी 

पहला “शो”।

          आखिर कार भाई को मानना पड़ा। खेमे मे घुसते ही गाड़ी, मोटरसाईकिल, स्कूटरों की कतारें देख कर मन जैसे झूम उठा। पंडाल का मुख्य “प्रवेशद्वार" भव्य दिख र​हा था। नीचे मैरुन रंग की दरियाँ चारों तर​फ दीवारों का आभास देते पर्दें, शनील से मंढ़ी कुर्सियाँ जहाँ वातावरण को राजसी रुप​ प्रदान कर रहे थे वहीं बड़े-बड़े पोस्टर आकर्षण का मुख्य केन्द्र​ बने हुए थे। उन में प्रदर्शित प्राणों को जोखिम में डालते युवक- युवतियों के साथ हाथियों, शेरों व पक्षियों के अद्भुत करतबों की तस्वीरें जैसे सर्कस के विषय को अनूठे ढंग से पेश कर रही थी | यह सब देखकर जैसे मैं मन्त्रमुग्ध हो उठी और तभी लाडली भतीजी ने हाथ खींचा – “भुआ अन्दर चलो” उसकी आवाज सुनकर मैं उस स्वप्निल कल्पनालोक से बाहर निकली।

          मुख्य मंच जहाँ करतब दिखाए जाने वाले थे वहाँ असंख्य कुर्सियाँ और​ सीढ़ीनुमा तख्ते बड़े करीने से लगे थे। बीचों -बीच विशाल तम्बू जिसमें ऊँचाई पर रस्सों के सहारे बंधे झूले, गोल आकार का बड़ा सा जाल, आर्केस्ट्रा पर बजती "मेरा नाम जोकर" की धुन जिस ने पूरे वातावरण को सर्कस​मय बना रखा था लेकिन पूरे पंडाल में मुश्किल से सौ- डेढ़ सौ आदमी। मैं सोचने को मजबूर हुई कि इतनी मेहनत और तैयारी आखिर किस लिए? "शो" शुरु हुआ- रस्सियों और झूलों पर कलाबाजियाँ खाते शरीर, काँच की शीशियों और काँच की पट्टियों पर व्यायाम​ का प्रदर्शन करते हुए एकाग्रता का उदाहरण पेश करते युवा चेहरे। आग के साथ खतरनाक करतब दिखाते जाँबाज, सुन्दर कन्याओं के इशारों पर दाँतों तले अगुँली दबाने के लिए मजबूर करने वाले पक्षियों के करतब​, हाथी की सूण्ड के सहारे खतरनाक खेल पेश करती परी सी सुन्दर कन्या, सत्यम् शिवम् सुन्दरम् की धुन पर भगवान शिव की आरती करते हाथी सभी कुछ तो संगीत की मधुर धुनों के साथ आलौकिक और अद्भुत था | समय कैसे पंख लगा कर बीता मुझे पता ही नही चला। "शो" की समाप्ति पर मैंने आधी से अधिक खाली पड़ी पंडाल की कुर्सियों को भारी मन से देखा और बाहर​ निकलते हुए भाई के स्वर को सुना जो झल्लाते हुए  कह रहा था कितने मच्छर खा गए। भतीजी का जोश ठण्डा पड़ गया था-"पापा इस से अच्छा था हम मूवी देख आते।“ उनकी बातें सुनकर मुझे फिर याद आया " सर्कस​ का खेमा" जो कभी मैंने पढ़ाया था।

                        घर की तरफ लौटते हुए मैं सोच रही थी की सचमुच दयनीय दशा हो गयी है इस कला की। जिस तरह शानो शौकत और भव्य रूप​ में इस कला को कलाकार मंचित करते हैं उसका प्रतिदान उन्हे मिल ही नहीं पाता ।लोगों का रूझान हमारी इस पुरातन कला से हट गया है। मनोरंजन की दुनिया के इस खेल से कितने प्राणी जुड़े हैं जो इस कला को जीवित रखने के लिए अथक प्रयास करते हैं मगर आज की भागती पीढ़ी की भौतिकवादी संस्कृति में इन सब​ बातों का अर्थ कहाँ? चंद लोग आज भी इस कला से जुड़े है और अपनी रोजी-रोटी के लिए इसे अपनाये हुए हैं मगर अब यह कला लगभग नष्टप्राय: है । जरुरत है इसे पुन: पोषित और संवर्धित करने की ।


                                          ***

Tuesday, June 22, 2021

संस्मरण-स्मृतियों के गवाक्ष

                   

【चित्र:-गूगल से साभार】


बूँदों की छम-छम…,उमड़ती-घुमड़ती काली घटाएँ..,भला किसे अच्छी नहीं लगती । सावन-भादौ में बारिश की झड़ी, चारों तरफ हरियाली प्रकृति का भरपूर आनन्द  रेगिस्तान में नखलिस्तान जैसे छोटे से शहर पिलानी में पल-बढ़ कर सदा ही लिया । किशोरावस्था के लगभग चार वर्ष असम में गुजरे जहाँ प्रकृति ने  खुले हाथों से अपना प्यार लुटाया है । घने वृक्षों, नदियों और वर्षा के बिना पूर्वोत्तर भारत की कल्पना ही नहीं की जा सकती। 

प्रकृति का रूखापन  पहली बार तब देखने को मिला जब मुझे बी.एड. करने राजस्थान के चुरु जिले में स्थित सरदारशहर जाना पड़ा। जैसे -जैसे पिलानी पीछे छूटती गई वैसे-वैसे हरियाली से नाता भी टूटता गया । विरल झाड़ियां , छोटे-छोटे खेजड़ी के पेड़ और दूर तक नजर आती सोने सी भूरी मिट्टी के टीले  और उन्हीं के बीच बहुत कम घरों की संख्या । सही मायनों में राजस्थान से अब परिचय हो रहा था 

मेरा । लगभग साढ़े पाँच घंटे के सफर के बाद रेत के धोरों और छिटपुट वनस्पति के बीच एक बहुत बड़े होर्डिंगनुमा गेट पर- "गाँधी विद्या मंदिर शिक्षण प्रशिक्षण संस्थान" सरदार शहर आपका स्वागत करता है।" के साथ ही आने वाले एक साल में  बहुत कुछ सीखना बाकी था । सरदार शहर अपने समयानुसार सुन्दर और सुव्यवस्थित लगा लेकिन पहली बार बरसात और वृक्षों के अभाव को एक शिद्दत के साथ महसूस भी किया । 

 बारिश के अभाव में पानी की किल्लत…,सर्दियों में शून्य तक तापमान देखने के बाद  सूखी गर्मियों की गर्म 'लू'और धूल भरी आँधियाँ देखनी अभी बाकी थी । लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियों से सामंजस्य तो बैठाना ही था ।

 मेरे लिए सब से बड़ी परेशानी पीने के पानी

 की थी । हॉस्टल में मेरे जैसी चार-पाँच लड़कियों को छोड़ कर तमाम लड़कियाँ पीने के पानी को लेकर सहज थी वही हमारे लिए वह पानी बहुत खारा था । अत्यल्प बारिश के कारण रेतीले इलाकों में वर्षा के जल को संग्रहित करने की परम्परागत प्रणाली कुंड या टांके हैं  जिनमें संग्रहित जल का मुख्य उपयोग वहाँ के निवासी पेयजल के लिए करते हैं। प्रदूषण और दुर्घटना को रोकने हेतु इस प्रकार के जल स्रोत ढक्कन सहित तालों से बंद होते हैं।  इनका  निर्माण संपूर्ण मरूभूमि में लगभग हर घर में किया जाता है, क्योंकि मरूस्थल का अधिकांश भू जल लवणीयता से ग्रस्त होने के कारण पेयरूप में काम में लेना असंभव है । अतः वर्षा के जल का संग्रहण यहाँ के निवासियों के लिए दैनिक जल आपूर्ति के लिए अनिवार्य है ।

 कपड़े धोते समय  नल अधिक देर खुला रहने 

पर सफाईकर्मी  के माथे की सलवटें और खीजभरा सुर सुन ही जाता था - "कौन सी जगह से हो ? पानी कितना बरसता है तुम्हारे गाँव में…, बहुत कुएँ-बावड़ी दिखते हैं ?" 

टोकने पर तल्ख़ी जरूर होती थी मगर खाली बैठते तो वहाँ के बाशिंदों का विषम और कर्मठ जीवन सोचने को मजबूर करता कि धरती पर प्रकृति सब जगह एक समान क्यों नहीं हैं ? और फिर याद आता कि अरावली का वृष्टि छाया प्रदेश होने के कारण  अरब सागर व बंगाल की खाड़ी का

 मानसून  थार प्रदेश में बहुत कम वर्षा करता है। 

आजकल बैंगलोर में रहते हुए प्रायः रोज

 बादलों को घिरते और बरसते देख रही हूँ । घनी हरियाली को सिमटते और आवासीय परिसरों में बदलते देख रही हूँ वर्ष भर सुबह-शाम की ठंडक को कम होते और स्वेटर,शॉल,जैकेट्स को आलमारियों में सिमटते देख रही हूँ । 

दिन प्रतिदिन हम अपनी चादर से अधिक पैर पसार कर शहरी विकास और भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए जंगलों और पर्वतीय क्षेत्रों का कटाव कर उन्हें समेटते जा रहे हैं।  मैं थार प्रदेश जैसी विषमताओं के बारे में सोचने से बचना चाहती हूँ । कहते हैं अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता मगर महान पर्यावरणविद सुन्दरलाल बहुगुणा जैसी विभूतियों का समूह अपने देश के हर प्रान्त में देखना चाहती हूँ।


***



     

 














 

  



Sunday, September 6, 2020

"5 सितम्बर"

 कल-कल बहते झरने सी हँसी थी उसकी । भूमिका अक्सर स्कूल के गेट में घुसती तो वो हँस कर गुड मार्निंग कह अपनी हथेली भूमिका की तरफ फैला देती । स्कूल में किसने बनाया होगा यह नियम पता नहीं लेकिन ग्यारहवीं कक्षा की लड़कियां नियम से स्कूल आने वाली शिक्षिकाओं की स्कूटी या साइकिल गेट से लेकर साइकिल स्टैंड पर खड़ी कर के आती ..लड़कियों की ड्रेस साफ-सुथरी है ना..लेट आने वाली लड़कियों को लाइन में खड़ा करना सब उन्हीं के जिम्मे होता ।अगले वर्ष ड्यूटी अगली ग्यारहवीं की होती ।

      भूमिका के भुलक्कड़ स्वभाव में था दिनांक भूल जाना..वह चॉक उठा कर बोर्ड की तरफ मुड़ते हुए पूछती - डेट ? उसकी क्लास में से शरारती सुर उठता ..हमारे रिवीजन.. होमवर्क की डेट कभी नहीं भूलते आप ? भूमिका मुस्कुरा भर देती । एक दिन वह भूमिका की क्लासमेट नेहा के साथ सकुचाई सी उसके घर के गेट पर थी । नेहा से बातचीत में पता चला वो उसकी भांजी

 है । राजनीति  विज्ञान में मदद चाहिए उसे यदि वह पढ़ा सके … अपने सिद्धांतों के कारण भूमिका ने उसे ट्यूशन की हामी तो नही भरी लेकिन वादा किया कि वो जब भी परेशानी हो स्कूल के अतिरिक्त घर आकर पढ़ सकती

 है । अपने मिलनसार स्वभाव के कारण धीरे -धीरे वह भूमिका के परिवार के सदस्य जैसी बन गई ।  सबके जन्मदिन पर हंगामा मचाने वाली लड़की  का जन्मदिन अप्रैल में आता है उसने ठोक-पीट कर भूमिका को रटा दिया था । जन्मदिन वाले दिन उसने आँखों में अनोखी चमक के साथ भूमिका मैम से स्कूटी की चाबी ली..स्टैंड पर खड़ी की । क्लास में भी चॉक-डस्टर ,बुक निकाल कर मेज़ पर रखी ।भुलक्कड़ मैम को 'डेट" भी बताई ।

                चार-पाँच दिन के अन्तराल पर वह घर आई तो  उदास सी थी । उदासी का कारण पूछने पर जवाब

भूमिका की  मम्मी ने दिया - 'तूने उसको बर्थडे तक विश नहीं किया और अब पूछ रही है क्या हुआ ?' भूमिका ने

सिर पकड़ लिया अपना..पता नहीं अंकों के साथ उसका

क्या आकड़ा था ..हर बात याद रखने वाली भूमिका कभी भी डेट , फोन नम्बर याद नहीं रख पाती थी । भूमिका को सिर पकड़े देख उसने मासूमियत से हँसते हुए कहा - 'कोई बात नहीं आंटी जी हम इनको डेट याद रखना भी सीखा देंगे ।'

            कॉलेज में जाने के बाद भी उसने घर आना नहीं छोड़ा यदि कुछ दिन नहीं आती तो वह समझ जाती अपने घर गई होगी पेरेंट्स के पास । एक बार की यूं ही गई वह नहीं लौटी ...नेहा से पता चला रोड एक्सीडेंट में उसने 5सितम्बर को आखिरी सांस ली ।

                      हर 5 सितम्बर को भूमिका के कानों में एक आवाज़ गूंजती है - 'कोई बात नहीं आंटी जी हम इनको डेट याद रखना भी सीखा देंगे ।' 


                                     ***

Thursday, August 13, 2020

"स्वतंत्रता दिवस की स्मृतियाँ" 【संस्मरण】

        
     【 चित्र : गूगल से साभार 】

स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस का एक अनूठा आकर्षण
रहा है मेरे मन में । बचपन में स्कूली मार्चपास्ट में भाग लेना
और बैंड के साथ कदम से कदम मिलाते राष्ट्रीय ध्वज को
सलामी देते हुए मंच के सामने से गुजरना रोम रोम में पुलकन
भर देता था । मगर नहीं भूल पाती शिक्षिका बनने के बाद का
बैंड की इंचार्ज के रूप में अपना पहला पन्द्रह अगस्त जब
स्कूल की प्रिन्सिपल ने यह दायित्व मुझे सौंपा । दरअसल
हमारे यहाँ स्कूलों की परम्परा थी कि हर शिक्षक को शिक्षण
कार्य के अतिरिक्त एक सहायक गतिविधि का दायित्व भी
वहन करना है ।
 वहाँ अपने हिस्से में बैंड की जिम्मेदारी आई । बैंड की
प्रैक्टिस करवाने हफ्ते में तीन दिन आर्मी के रिटायर्ड बैंड सर
आते थे सो परेशानी कुछ खास थी भी नहीं लेकिन शीघ्र ही
उन परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ा । हुआ ये कि बैंड
सर  इस्ट्रूमेंट्स की सफाई वाले दिन यानि पन्द्रह अगस्त से
पहले दिन अनुपस्थित हो गए । हमें लगा कोई नहीं … आसान
सा काम ही तो है साफ - सफाई ।
        बड़े जोश से सब छात्राओं ने ब्रासो और प्राइमर के
साथ इस्ट्रूमेंट्स चमकाये और अगले दिन के लिए  सहायक
सर्वेंट से रखवा दिये । पन्द्रह अगस्त की सुबह...चार स्कूलों
का स्टाफ और मार्चपास्ट के ट्रुपस् नियत स्थानों पर..,यह पहले
से ही तय था कि मुख्य अतिथि द्वारा ध्वजारोहण के साथ
ही राष्ट्रगान हमारे स्कूल के बैंड द्वारा ही बजना है । जैसे
ही ध्वजारोहण के साथ राष्ट्रगान शुरु हुआ अधिकांश
ट्रमपेंटस् के सुर गायब और फूंक मारती 'की' चलाती लड़कियों
की आँखें हैरत से बाहर..चंद बारीटोनस् और ट्रमपेंटस्
की आवाज़ बिल्कुल धीमी.. और इसी के साथ मेरे माथे पर
ठंडा पसीना.. लेकिन  एक सेकेंड की देरी किये बिना फ्लूट्स
ग्रुप ने आँखों ही आँखों मुझे आश्वस्त कर स्थिति की गंभीरता
को बहुत अच्छे से संभाला । पूरा  राष्ट्रगान लगभग
फ्लूट्स ,बेसड्रम और साइड ड्रमस के सहारे बजा । तब तक
बैंड सर भी मंच छोड़ ग्रुप के पास पहुंच चुके थे । मुख्य
अतिथि महोदय के भाषण के दौरान उन्होंंने स्थिति संभाली
और सभी ट्रमपेंटस् की चाबियां दुरूस्त की । लड़कियों का
मूड तब सुधरा जब उनका समूह अन्त में  ...सारे जहां
से अच्छा..बजाता मंच के सामने से गुजरा और उनके लिए
खूब तालियां बजी और वाहवाही हुई । बैंड सर की भी नये
प्रयोग के लिए प्रशंसा हुई  जिसको स्वीकारते वे थोड़े
असहज थे ।
        बाद में पता चला कि फ्लूट्स की मधुर ध्वनि और ड्रमस
की बीट्स पराम्परागत बैंड में एक अभिनव प्रयोग समझी गई ।  मेरे अनजान होने और छात्राओं के जोश के कारण सफाई
के दौरान ट्रमपेंटस् की चाबियों के नंबर उल्टे-सीधे डल गए
जिनके चलते उनसे आवाज़ निकलनी बंद हो गई । मैं भी जब
तक वहाँ कार्यरत रही कसम खा ली कि इस्ट्रूमेंट्स के
रख- रखाव और सफाई कार्यक्रम के बाद कम से कम दो
प्रैक्टिस तो जरूर होगी ।
     यद्यपि बैंगलोर में भी आवासीय परिसरों में राष्ट्रीय पर्व
बड़ी धूमधाम से मनाये जाते हैं मगर मुझे टी.वी. पर ही
स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम देखना 
व अतीत की वीथियों में विचरण करना अच्छा लगता है । मैं
जब भी बैंड की धुन पर ध्वजारोहण के साथ राष्ट्रगान सुनती हूँ
तो सावधान की मुद्रा में खड़ी हो जाती हूँ और मेरे साथ घर के
सदस्य भी । उस मधुर गूंज के साथ बचपन की मार्चपास्ट
और स्कूल के बैंड के साथ मेरे राष्ट्रीय पर्वों के शुभ अवसरों
पर गौरवान्वित करने वाले पलों के दृश्य उस वक्त मेरी आँखों के आगे साकार हो उठते हैं ।

                                  ***