Copyright

Copyright © 2026 "आहान"(https://aahan29.blogspot.com) .All rights reserved.
Showing posts with label हाइबन. Show all posts
Showing posts with label हाइबन. Show all posts

Tuesday, April 4, 2023

“जन्मभूमि ॥ हाइबन ॥



 “यहाँ के बाज़ार में कुछ नहीं मिलता ..,बस नाम ही नाम है आपके शहर का । इतना बड़ा नाम और छोटा सा बाज़ार ।” नई बहू  गाय को दुहते हुए भुनभुनाई ।

  “अरी बावली ये तो पढ़ने वाले बच्चों का ठाँव है । कितनी दूर में फैली कितनी बड़ी कॉलेज कि एक गाँव बस जाए  फिर उतनी ही बड़ी सीरी और मूजिमघर (म्यूज़ियम) । मूजिमघर  तो दूर दिसावर से आए लोग भी देखने आते हैं । कितना बड़ा हॉस्पिटल है यहाँ आस-पास के गाँवों के लोग इलाज की ख़ातिर यही तो आते हैं । इन सब से नाम बड़ा है यहाँ का .., मैं ठीक  कह रही हूँ ना बेटी !” दूध के लिए केतली थामे खड़ी मुझको वार्तालाप  में सम्मिलित करते हुए अनपढ़ सास ने उपले थापते हुए कहा ।सहमति में गर्दन हिलाते हुए मैं उनकी समझाईश भरी बातों से चकित थी ।

            बैचलर ऑफ एजुकेशन टीचर ट्रेनिंग कॉलेज के सभागार में कभी-कभी सेमिनारों का आयोजन होता था। एक बार वहाँ भी अपने छोटे से शहर के लिए मन गर्वित हो उठा जब सभी शिक्षार्थी साथियों को एक छोटे से स्पीच से पूर्व मेरे परिचय में प्रिन्सीपल सर को यह कहते सुना - “अब ये ऐसी जगह का नाम लेंगी जहाँ इस सेमिनार में बैठा हर सदस्य जाना चाहेगा ।अब की बार “एजुकेशन टूर” पर आपको वहीं ले जाने का प्रोग्राम है ।”

                    कुछ इसी तरह के वाक़यों को  देखते सुनते वह समय भी आ ही गया जिसके बारे में अक्सर सुना है कि  - “जहाँ का दाना-पानी  आपके नसीब में लिखा होता है वहाँ आपको जाना ही पड़ता है ।”

              पूर्व और पश्चिम का अनूठा संगम लिए दिल्ली और जयपुर के बीच लगभग समान दूरी पर अवस्थित है “पिलानी”। जन्म और कर्म से जुड़ी मेरी जन्मभूमि .., मेरी माँ की स्मृतियों की तरह इसकी स्मृतियाँ  भी बहुत कस कर बाँधे है मुझे खुद से । 

       कहते हैं कि किसी की अहमियत आपके लिए क्या है इसका भान बिछोह के बाद अनुभव होता है । सिलीकॉन सिटी के नाम  से मशहूर बैंगलोर में रहते हुए मैं अक्सर उसे यहाँ के माहौल में कभी कॉर्नर हाउस पर आइसक्रीम खाते चेहरों में तो कभी चेरी ब्लॉसम और गुलमोहर की कतारों के बीच नीम और पीपल के रूप में ढूँढ़ती हूँ  और बरबस ही मेरा मन कह उठता है -


ओ रंगरेज ~

बड़ा ही गाढ़ा तेरे

नेह का रंग


*

Friday, July 1, 2022

वैश्विक धरोहर



दुनिया में बहुत से ऐसे पुल हैं जिनको बनाने वाले इंजीनियरों की तारीफ़ सभी करते हैं ।उनकी खूबसूरती और मज़बूती की 

चर्चाएँ भी अक्सर हुआ करती है । गोल्डन गेट ब्रिज, सनफ्रांसिस्को, यूनाइटेड स्टेट्स , टॉवर ब्रिज, लंदन, इंग्लैंड और सिडनी 

हार्बर ब्रिज, सिडनी, ऑस्ट्रेलिया ऐसे ही विश्व प्रसिद्ध पुलों के उदाहरण हैं ।

            भारत में भी एक ऐसा ब्रिज है जो अपने आप में अद्भुत है इस पुल की खास बात ये है कि यह पेड़ की जड़ों बना हुआ है  । 

यह पुल पेड़ों की जिंदा जड़ों से धागे की तरह बुनकर बनाया 

गया है । मेघालय की खासी और जयंतिया जनजाति के लोगों 

को यह कला सदियों से अपने पूर्वजों द्वारा विरासत में मिलती 

चली आ रही  है ।चेरापूंजी में इन्हीं लोगों द्वारा बनाये गये 

डबल डेकर पुल को यूनेस्को द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज साइट भी 

घोषित किया हुआ है ।

                   कहते हैं ये पुल रबर के पेड़ की जड़ों से बनते हैं 

एक पुल को सही आकार देने में दस से पन्द्रह साल तक 

लग जाते हैं  ।ये पुल घने जंगलों में नदियों के ऊपर आवाजाही 

के लिए बनाए जाते हैं ।खासी-जयंतिया जनजाति के वंशज 

अपनी प्राचीन  कला कौशल को संरक्षित रखने के साथ-साथ सीमित संसाधनों में आत्मनिर्भर जीवन यापन का अनूठा 

आदर्श प्रस्तुत करते हैं ।


विटप सेतु ~

वैश्विक धरोहर

मेघालय में ।

Saturday, May 7, 2022

“किताबें” [हाइबन]



दिसम्बर की कड़ाके ठंड और उस पर ओस भरी हवाओं के साथ रुकती थमती बारिश…पिछले एक हफ़्ते  से बिछोह की कल्पना मात्र से ही आसमां के साथ मानो बादल भी ग़मगीन हैं ।       

                              जीवन का एक अध्याय पूरा हुआ । दूसरे चरण के आरम्भ के लिए बहुत कुछ छोड़ना है । जिसकी कल्पना 

हर पल छाया की तरह मेरे साथ रही । गृहस्थी के गोरखधंधे भी अजीब हैं  पिछले पाँच सालों से कम से कम सामान रखने के 

फेर में न जाने कितनी ही चीजों को  देख कर अनदेखा करती 

आई  हूँ कि जब इस शहर में रहना ही नहीं तो सामान भी बढ़ाना क्यों ? मगर सामान है कि सिमटने का नाम ही नहीं लेता । 

और अब सब से बड़ी समस्या जो मेरी प्रिय भी है मुँह खोले खड़ी 

है  मेरे सामने वह है मेरी किताबें …, कितनी ही किताबें  संगी 

साथियों को देने के बाद भी मेरे आगे रखी हैं जिनको साथ ले 

जाना या छोड़ कर जाना दोनों ही काम दुष्कर है मेरे लिए ।जान-पहचान  और संगी- साथियों से विदा के समय मेरी प्रतिक्रिया 

कल क्या होगी कल पर छोड़ती हूँ । मगर आज मेरे हाथों बक्से 

में बन्द होती मेरे एकान्तिक क्षणों की  संगिनी अपनी समग्रता के साथ उपालम्भ भाव से जैसे मुझ से सवाल करती  हैं -

बोली अबोली  ~

काहे चली बिदेस

निष्ठुर संगी ।


***


Tuesday, December 1, 2020

"कुरजां" ।। हाइबन।।

 शीतकाल में साइबेरिया से राजस्थान  में प्रवासी पक्षी साइबेरियन सारस (डेमोइसेल क्रेन) भरतपुर के केवलादेव पक्षी विहार व अन्य अभयारण्यों में सर्दियों में प्रवास के लिए आते हैं । चुरू जिले के तालछापर अभयारण्य  को  प्रवासी पक्षी “कुरजां” की शरणस्थली कहा जाता है । राजस्थानी भाषा में साइबेरियन सारस को कुरजां कहा जाता है ।

                     मरूभूमि की महिलाएँ  कुरजां के साथ सहेली

 जैसा रिश्ता मानती हैं ।यहाँ के लोक गीतों में विरहिणी स्त्री और कुरजां के बीच आपसी संवाद का रूप गीत में ढल कर भावनाओं का निरूपण होता है जिसमें कुरजां पक्षी संदेश वाहक के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन करती है । "कुरजां गीत" अपने वियोग पक्ष के श्रृंगार भावों के साथ राजस्थान के लोक जीवन में रचा बसा हैं ।

          थार रेगिस्तान के जलवायु की खास विशेषता है कि यहाँ सदियों से देसी परिन्दों के अलावा अनेक प्रजातियों के 

प्रवासी पक्षियों का आवागमन बना ही रहता है जो यहाँ 

की जैव विविधता को बनाए रखने में अहम् भूमिका निभाते हैं। लेकिन प्रवासी पक्षियों की प्रजाति में साइबेरियन सारस पर्यटकों के लिए आकर्षण केन्द्र होने के साथ साथ यहाँ के जन मानस का भी अभिन्न अंग है ।सर्दियों में झीलों और तालाबों के

किनारे इन्हें देख कर बरबस ही मुँह से निकल पड़ता है -


झील किनारे ~

तपस में कुरजां

पँख सेकती ।


***

Monday, November 16, 2020

"यादें"【हाइबन】

【 चित्र गूगल से साभार】


कई बार कुछ लम्हें स्थायी रूप से बैठ जाते हैं

 मन के किसी कोने में । सोचती हूँ मन क्या है - हृदय...

जिसकी धड़कन ही जीवन है । बचपन में पढ़ा था कि हर

मनुष्य का हृदय उसकी बंद मुट्ठी जितना होता है । इस छोटे से

अंग में सागर सी गहराई और आसमान सी असीमता है यह

बात बड़े होने के बाद समझ आई ।   

असम का एक मझोला शहर बरपेटा रोड ..वहीं से मुँह

अंधेरे गाड़ी में बैठते सुना कि सुबह तक पहुंच जाएंगे गुवाहाटी ।  कार की खिड़की से नीम अंधेरे में भागते पेड़ों को देखते

देखते कब नींद आई पता ही नहीं चला । आँख खुली तो

लगा पुल से गुजर रहे हैं --

 "उगता सूरज... ब्रह्मपुत्र का सिंदूरी जल और नदी में

बहती छोटी-मझोली जाल लादे नावें और साथ

ही स्टीमर्स की घर्र-घर्र । "

इस अनूठे दृश्य को देख कर मैं मंत्रमुग्ध सी अपलक

अपने लिए निन्तात अजनबी से दृश्य को निहारने में इतनी

मगन हुई कि वह दृश्य  कस कर बाँध लाई अपनी

मन मंजूषा में । आज भी यदा-कदा बंद दृग  पटलों में

वह दृश्य जीवन्त हो उठता है और महसूस होता है कि

मैं वहीं तो हूँ ब्रह्मपुत्र के पुल पर.. और जैसे ही आँखें

खोलूंगी अगले ही पल वहीं दृश्य साकार हो उठेगा --

 

भोर लालिमा~

ब्रह्मपुत्र में जाल

फेंकते मांझी।

***