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Monday, December 15, 2025

“गुलाब की टहनी”

चकले और बेलन के बीच आटे की लोई आकार ले रही थी  और हाथ चलाती नवविवाहिता पूर्णिमा खोई थी अपनी कल्पनाओं के संसार में , जहाँ अनगिनत सपनों में से कोई एक आकार लेने के लिए प्रयासरत था ।

-“कहाँ ध्यान है तुम्हारा !  दूध उबल कर नीचे गिर रहा है ? तवा खाली पड़ा है जब दो काम एक साथ नहीं होते तो कम से कम एक तो ढंग से कर लो ।” जेठानी ने गैस की नोब बंद करते हुए उसे लगभग झिड़क ही दिया ।

- “सॉरी दी ! आगे से ध्यान रखूँगी” सकपकाते हुए पूर्णिमा कल्पना लोक से यथार्थ लोक में आ गिरी ,जल्दी से चपाती सेक कर उसने जैसे ही चपाती को घी लगाने के लिए चम्मच कटोरी में डुबोई तो पुन:हिदायत गूंजी - “ एक हफ़्ते में एक किलो घी ख़त्म हो जाता है ,चपातियों पर लगाते समय यह भी दूध की तरह बिखेर देती हो क्या?” जेठानी की हँसी पूर्णिमा को गोखरू के काँटे सी चुभी ।

  रोटियों पर घी की मात्रा कम देख कर सास ने ताना मारा -“मायके में घी नहीं देखा होगा, लगाना आए भी तो कैसे ?

   बातों की गंभीरता और नये परिवेश को आत्मसात करने के लिए पूर्णिमा लगभग कामों में डूबी रहती और उसके मस्तिष्क में सक्रिय रहता उसकी कल्पनाओं का जखीरा जो अतीत और वर्तमान के साथ उसको दिन भर व्यस्त रखता ।

     दोपहर के काम समेट कर बालों में कंघी करने के उद्देश्य से वह अपने कमरे की तरफ मुड़ी ही थी कि सास ने पीछे से आवाज दी-   पूर्णिमा !

    उसने  मुड़ कर देखा तो उनके हाथ में हरी पत्तियों के बीच मिट्टी में लिपटी गुलाब की टहनी थी और आँखों में खेद भरा अपनापन ।

 -“राह चलती गाय ने मुँह मार दिया गमले में.., लॉन तक पहुँच गई थी गाय ..,बच्चों ने गेट खुला छोड़ दिया होगा बाहर जाते समय । मैं वहाँ पहुँची तब तक उसने गमला तोड़ दिया .., तुमने कितने मन से गमले में  लगाई थी यह ।”

   कोई बात नहीं माँ जी ! बालों की कंघी भूल पूर्णिमा उनके हाथ से मुड़ी-तुड़ी टहनी ले कर लॉन के कोने वाली क्यारी की ओर चल पड़ी,सास भी साथ-साथ थीं बहू के लिए अनायास ही ममत्व उमड़ आया उनके मन में ।

        खुरपी से गड्ढा खोदती पूर्णिमा सास से बोली - “लग जाएगी माँ जी ! गुलाब की टहनी है बस थोड़ा ध्यान मांगती है ।”

        पूर्णिमा की बात सुन कर सास के होंठों पर अर्थपूर्ण मुस्कुराहट खिल उठी वे अपनत्व भरी नजरों से कभी पूर्णिमा के खुरपी चलाते मिट्टी में सने हाथों को तो कभी जमीन पर पड़ी गुलाब की टहनी को निहार रही थीं ।


                                     ***


Friday, January 31, 2025

“सवाल”

     “मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने…॥” बहुत प्यारा गाना है “आनन्द” मूवी का ।आज यूट्यूब पर गाने सुनते-सुनते मुकेश जी के गाने सामने आए और उन्हीं गानों में गुलजार साहब का यह गीत भी था जिसने उस दौर की याद दिला दी जब ख़त लिखने का मतलब कुशल क्षेम जानना ही नहीं भावनाओं का आदान-प्रदान भी हुआ करता था ।

               सात रंग के सपने.., गगनचुंबी सपनों की उड़ान और भी न जाने क्या-क्या ? वो शिकायती ख़त लिखते समय शायद उसके दिलोदिमाग़ पर इसी गाने का असर रहा होगा तभी तो उसने लिखा था - “ये सात रंग के सपने मेरे अकेले नहीं हैं कहीं न कहीं आप भी तो शामिल हैं इनमें.., जब पूरे ही नहीं करने थे तो इस बारे में सोचा ही क्यों ?” शायद नाराज़गी थी कहीं न कहीं कि मेरा सहयोग नहीं है लक्ष्य साधना में ।यहाँ अपनी सोच कुछ अलग सी थी ..,गीत के मर्म के समान और उस सोच को समझने की ज़रूरत सपनों के पीछे भागते समय भला किसको याद रहती है । हमारे बीच यह आख़िरी संवाद था ख़तों के माध्यम से एक -दूसरे की हौसला अफ़ज़ाई का । समय के साथ-साथ सोचें और रास्ते बदलते चले गए सोचने समझने के नजरिये में कमी कहाँ रह गई , समय के साथ यह  बात भी बीते समय की हो गई ॥

                         बहुत बार इन्द्रधनुष देखती हूँ तो सोचती हूँ कितनी अजीब बात है ।सात रंगों का मिलन और परिणाम - श्वेत प्रकाश ! ,कोरे काग़ज़ सा..,! मानो मूक आमन्त्रण दे 

रहा हो -  “आओ ! कुछ साकार करो मुझ पर ,कोई अल्फ़ाज़.., कोई आकृति .., कुछ भी जो तुम्हारे दिल में हो । मैं तुम्हारी ख्वाहिश को साकार करने में सक्षम हूँ अपने कलेवर पर । बस..,  कभी भी यह मत भूलना मैं अकेला एक नहीं हूँ मिश्रण हूँ सात रंगों का.., मेरा वजूद अनमोल है ।तुम्हारी सोच मुझ से ज़्यादा नहीं तो कम से कम मेरे जैसी तो होनी ही चाहिए ।”

                       खैर, अपना सवाल तो गीत के बोल , ख़त के अल्फ़ाज़ों  पर आज भी वही का वही टिका  है - रंग सात ही क्यों ? कम रंगों के मिश्रण से भी परिणाम सुखद हो सकते हैं । क्यों चाहिए सातों रंग..,सारा आसमान । जीने के लिए छोटी -छोटी बातें..,छोटी - छोटी आशाएँ और छोटी-छोटी ख़ुशियाँ क्या कम हैं ।

                           

                                      ***

Wednesday, November 13, 2024

“इज़्ज़त”

आज कामवाली के ना आने से सुबह -सुबह रीना के बच्चों को स्कूल और पतिदेव को ऑफ़िस भेजते - भेजते पैर फिर गए थे । तरोताज़ा होने के लिए वह चाय बनाने के लिए रसोई की तरफ मुड़ी ही थी कि दीपावली पर एक हफ्ते की छुट्टी आई ननद दीपा मुस्कराती हुई दो प्याली चाय और नाश्ते की ट्रे थामे रसोई से बाहर आती हुई बोली - “चलो भाभी अब थोड़ा खा लो !  भैया और बच्चों के आने से पहले आज बाक़ी के काम पूरे कर के बाज़ार से दीपक व रसोई का कुछ सामान ले आएँ ।”

               उसका वाक्य पूरा हुआ ही था कि “डोर-बेल” घनघना उठी । ट्रे डाइनिंग टेबल पर रख आगे बढ़ गेट खोला तो सामने भाभी की मित्र खड़ी थी । भाभी और उसकी सहेली को बतियाने के लिए छोड़ दीपा रसोई में ट्रे लेकर घुस गई,एक नाश्ते की और प्लेट लगाने और दो कप चाय को तीन कप चाय में बदलने के लिए । वापसी पर दीपा ने देखा दोनों किसी गंभीर चर्चा में व्यस्त थी ।दीपा ने उन से दूर बैठना बेहतर समझा ।           

   -“अच्छा भाभी ! चलती हूँ.., इनको सोया छोड़ कर आई थी रात में खाना भी नहीं खाया था ।सोचा जल्दी से सब्ज़ी ले आती हूँ । किसी से न कहना भाभी !आपसे मन मिलता है तो जी हल्का हो जाता है, कह-सुनकर ।” व्यस्त भाव से कहते हुए उसने रीना से विदा ली ।

        “ क्या हुआ भाभी ? आपकी फ्रेंड बड़ी परेशान लग रही थी ।” “कुछ नहीं…। उसकी ननद रजनी की लड़की कल कॉलेज से घर नहीं लौटी । शाम के बाद बाद इन लोगों ने टोह-भाल की तो साथ वाले शहर के रेलवे-स्टेशन पर टिकट खरीदते मिले दोनों ।”

      पूरी बात सुनने के बाद वह रोष में भर उठी - “अपने घर की उड़ाने में इसको थोड़ी सी शर्म भी नहीं आई ।ढिंढोरा पीटने के लिए चली आई सुबह-सुबह .. कैसी औरत है यह ।”, उसका भाषण पूरा होता और भाभी कुछ कहती अपनी मित्र के पक्ष या  विपक्ष में  कि फिर से डोर-बेल बज उठी.., भाभी ने जैसे ही गेट खोला बगल के फ्लैट वाली सोना भाभी सब्ज़ी का थैला लिए खड़ी थी - पता है कल रजनी की लड़की भाग गई …, रजनी की भाभी मिली थी सब्ज़ी मंडी में । बेचारी बहुत परेशान थी ।” दुपट्टे से पसीना पोंछते हुए वह आगे निकल गईं । कुछ क्षणों के अंतराल पर दीपा के कानों में गेट का ताला खुलने की आवाज़ के साथ उनकी फिर से आवाज़ आई -

-   “प्लीज़ आप मत कहना किसी से.., किसी की इज़्ज़त का सवाल है ।”

                                        ***

Wednesday, August 7, 2024

“रहस्य”

मैं आज फिर से कल के गलियारे में हूँ ।बहुत कोशिश की खुद को आज से बाँधने की मगर मन तो बहते पानी सा चंचल ठहरा अपने लिए रास्ते ढूँढ ही लेता है किसी एक जगह उसको ठहरना भाया कब है।

            अभी कुछ दिन पहले  “डिस्कवरी” पर “Ancient Aliens” प्रोग्राम देखने के बाद मन पुनः बीते कल के आँगन में जा खड़ा हुआ। बहुत  बार ऐसा पढ़ने में आता है कि ब्रह्माण्ड में अस्तित्व है मानव सभ्यता के अतिरिक्त अन्य सभ्यताओं का ।बात जब ब्रह्माण्ड की हो और माँ से बचपन की बहसें याद ना आए ऐसा कैसे हो सकता है ।  माँ की मोटी-मोटी पुस्तकें जिनमें उनको सदा फ़ुर्सत के लम्हों में डूबे देखा .., माँ के साथ उनकी भी याद आ ही जाती है जिनका कभी वे मौन रह कर तो कभी सस्वर वाचन किया करती थीं । कई बार सोचती थी कि माँ की किताबों में से जो अच्छी लगेंगी अब की बार  की गर्मी की छुट्टियों में ज़रूर पढूँगी पूरी नहीं तो कुछ पन्ने ही सही। लेकिन छुट्टियों में खेल-कूद के अतिरिक्त कुछ याद ही कहाँ रहता था । ख़ैर सोचने का मौक़ा ज़्यादा नहीं दिया कुदरत ने…, माँ के जाने के बाद उनकी सारी किताबें पापा ने कुछ नानाजी को और कुछ मन्दिर में भेज दी और माँ के साथ मेरी बहसों को सिलसिला भी थम गया ।

      एक बार पढ़ती हुई माँ  के किसी प्रसंग का अंश - “ईश्वर की सत्ता सृष्टि के कण-कण में समाई है वही समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त चर-अचर का स्वामी है ।” मेरे कानों में पड़ गया .., बालमन की जिज्ञासा हाथ धो कर माँ के पीछे पड़नी ही थी - माँ ईश्वर कौन

 हैं ?  और यह तुम्हारी किताबों के ब्रह्माण्ड में भी हमारी साइंस की किताब वाले अन्तरिक्ष : सोलर सिस्टम  और आकाशगंगा जैसे टॉपिक हैं क्या ? तुम्हारे भगवान जी भी सोलर सिस्टम को मानते

 हैं ? उस वक़्त माँ का मूड नहीं था मेरे से बहस करने का..,वे बड़ी  सहजता से मुझे “नास्तिक” की उपाधि प्रदान कर बुकमार्क के रूप में मोरपंख अपनी किताब में दबा कर अपने कामों में उलझ गईं।और मैं भी उस बात को भूल गई ।

     गर्मियों में एक दिन रात  में छत पर सोते हुए साफ़ आकाश में जहाँ असंख्य तारों की झिलमिलाहट थी हल्के से बादलों की लकीर की तरफ अंगुली से इशारा करते हुए माँ ने कहा - 

“देख ! आकाश गंगा !”  

“अच्छा जी ! आपकी किताबों में आकाश गंगा भी होती हैं ?”

मेरी बात को अनसुना करते हुए उन्होंने कहा -

“उधर देख ! वो सप्तऋषि मण्डल और वो ध्रुव तारा ।” 

-“अच्छा तो यह बीच का हिस्सा जहाँ तारे नहीं दिखायी दे रहे “ब्लैकहॉल” है । मैंने आँखों से दिखाई देने वाले उस छोटे से आकाश के हिस्से में मानो पूरे अन्तरिक्ष को नापने की ठान ली 

थी ।”

     अचानक एक प्रश्न  कौंधा मन में और मैं पूछ बैठी -

  -   “माँ ! क्या हमारी पृथ्वी जैसी और भी पृथ्वियाँ होंगी वहाँ भी हम जैसे लोग रहते होंगे !” 

-“जरूर होंगे” माँ का उत्तर खोया खोया सा लगा । 

मेरी जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी ।

-“माँ यह सब किसने बनाया ?” 

- “ईश्वर ने ।”

- “ईश्वर को किस ने ?

माँ की सोच रूक गई- ठहरी सी आवाज़ में बोलीं जो आज भी याद है - 

“ वह सर्वोच्च शक्ति जिसने ब्रह्माण्ड का निर्माण किया जो हमेशा हर जगह व्याप्त है वही ब्रह्मा, विष्णु और महेश है ।जगत के जन्मदाता,पालनकर्ता और संहारकर्ता । उसे ईश्वर मानते हैं हम ।”

                     माँ जानती थी मेरी तरफ़ से और प्रश्न आने वाले हैं इसलिए विषय को विराम देते हुए कहा-

“अब सो जा ! आज के लिए तेरे लिए बहुत हो गया ।”

                माँ की खामोशी के बाद आसमान में टकटकी बाँधे मेरी आँखें हर जगह व्याप्त उस असीम शक्ति की कल्पना में डूबी हुई थी जो हर जगह व्याप्त थी शायद वो मुझे भी देख रही थी ॥ मेरे लिए यह बहुत बड़ा रहस्य था जिसे मैं कभी सुलझा नहीं पाई ।

                            “Ancient Aliens” की डॉक्यूमेंट्री देखने के बाद लगा उस रात माँ के साथ चर्चा में माँ  सही थी कि कोई 

असीम शक्ति की सत्ता तो है जो ब्रह्माण्ड को नियन्त्रित करती है । और मैं भी कि पृथ्वी जैसी और पृथ्वियाँ भी  हैं जहाँ हम जैसे प्राणी रहते होंगे ।यह अलग बात है कि वे हमारी पृथ्वी पर रहने वाले लोगों जैसे भी हो सकते हैं और उनसे अधिक उन्नत और विकसित अवस्था में भी हो सकते हैं ।


                                       ***


Sunday, June 9, 2024

“सपने और उम्मीद”

सपने”


सपने देखना बुरी बात नही.., गहरी नींद के सपने जागती आँखों के सपने । कई  बार सपने की अनुभूति ताजे गुड़ 
की मिठास सी होती है  । 
            कई बार टूटे काँच की कीर्चियों सी बिखर जाती हैं अन्तर्मन के आस-पास और टीस पैदा करती हैं जिनका अहसास पूरा दिन और कई बार तो कई दिनों तक बना रहता है । अन्तर्मन पर चादर के समान लिपटी सपनों की अनुभूतियाँ धीरे-धीरे ही धूमिल हो पाती हैं  । सोचती हूँ  यह भी ठीक है - कल्पना से यथार्थ में आने में वक़्त तो लगता ही है ।

                                   ***
“उम्मीद”


मौसम विभाग के अनुसार मानसून अच्छा है अब की 
बार। पानी की आवक बढ़ने से नदियों और तालाबों में  कछुओं , बड़ी मछलियों के साथ छोटी मछलियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है ।मानसून अच्छा है तो वर्षा भी अच्छी होगी वर्षा अच्छी होने से  भूमि की उर्वरा शक्ति में भी अभिवृद्धि होगी ।वैसे दुनिया में उम्मीद पर सब कुछ 
क़ायम है और उम्मीद यही है कि इस बार शक्ति -सन्तुलन 
बना रहेगा ।


                                          ***

Friday, May 31, 2024

“आदतें अपनी-अपनी”

 


                              ( Click by me )


उसने पूछा - लिख नहीं रही आज कल ? बहुत दिन हुए कुछ लिखते नहीं देखा..!! मन किया कि कहूँ - आज कल गुजरे 

कल और आने वाले कल को दरकिनार कर आज को जीना 

सीख रही हूँ और वो आज मुझे हर जगह अनफ़िट किये दे रहा 

है जिसके तार पैदाइश से ही जुड़े हैं मेरे साथ .., कम से कम  

मुझे अपने बारे में ऐसा ही लगता है । मैं बस एक ही काम तो अच्छे से कर पाती हूँ सब से सामंजस्य बिठाने की कोशिश लेकिन यहाँ भी झोल है  जब तक वह बैठता है तब तक दुनिया और से और हो जाती है ।बस गुजरे पलों का सूत्र ही रह जाता है हाथ में ।ज़िद्द है मन की कि ज़िन्दगी के गुणा-भाग के बाद शेष बचे अंश से तारतम्य बिठाने के लिए एक ईमानदार कोशिश तो  कम से कम होनी ही चाहिए ।बाकी कल का क्या…?  वो तो सांसों के साथ जुड़ा है जब जी चाहेगा स्मृतियों के गलियारों के दरवाजे खुद के लिए ख़ुद बख़ुद खुल जायेंगे ।


                                      ***

Monday, April 22, 2024

“आज कल”

गेटेड सोसायटी के अपार्टमेंटस् में रहना मुझे बहुत पसन्द रहा 

है हमेशा से ही सब कुछ बन्द -बन्द और सेफ । खुलेपन और ताज़गी के लिए खिड़कियाँ और बालकॉनियाँ काफ़ी हैं , कुछ कुछ यही नज़रिया रहा है मेरा घर के मामले में । बचपन के घर 

के आँगन की उपयोगिता भी मेरे लिए केवल आने-जाने भर के लिए हुआ करती थी । उम्र के साथ शायद सोच बदलने लगी 

है । आँगन वाले घर और घनी छाँव वाले पेड़ बहुत भाने लगे हैं आज कल ।

                          बहुत बार बहुत सारी जगहों पर अलहदा से विचार कौंधते हैं मन में ..,सोचती हूँ लिखूँगी । मगर टाइपिंग के लिए पेज़ खोलते - खोलते खुद पर खुद ही हावी हो जाती हूँ  

और ख़्याल हल्के-फुल्के बादल बन तिरोहित हो जाते 

हैं अनजान गलियों में ।अँगुलियाँ अपने लिए शग़ल ढूँढ लेती 

हैं और ‘कुछ कुछ सर्च करने में व्यस्त हो जाती हैं । घण्टे भर  

की माथापच्ची के बाद दिमाग़ अचेतन सा शून्य में गोते लगाता महसूस होता है । 

        ज़िन्दगी की सरसता में नीरसता बैंगलोर के तापमान की तरह बढ़ने लगी है।जिसकी हवा तो अब भी पहले सी है मगर ठण्डक कहीं खो गई है ।दिन एक कप चाय जैसे लगने लगे हैं जो आदतानुसार फीकी चाय में भी मिठास के साथ ताजगी ढूँढने से बाज़ नहीं आते । कप में छनते समय अपने भूरे से रंग और भाप 

के साथ चाय बाँधती तो है अपने आकर्षण में लेकिन मिठास के अभाव में होठों तक आते -आते मुँह में बेस्वादीपन घोल कर ज़ायक़े का आनन्द छीन लेती है  ।समय को अपने ढंग से अपने लिए काटने का फ़ितूर अपने लिए तो कबीर की ‘माया महाठगिनी हम जानी’ की जगह ‘समय महाठग’ बन गया है ।


***

Sunday, December 17, 2023

“दहलीज़”


                                 

अक्सर वे व्यस्तता की दहलीज़ पार कर वक़्त को छलावा देकर फोन पर अपने -अपने दुख- सुख साझा करती हैं और ऐसा करते-करते भूल जाया करती हैं वक़्त को । उस वक़्त.., वक्त ही कहाँ होता है उनके पास कि वे वक्त को याद करें । कभी-कभी तो अवसर मिलता है उन्हें अपने आपको रिक्तता की सरहद पर खड़े हो कर खुद को पहचानने के लिए ।

      कितनी ही स्मृतियों की गठरियाँ .., स्मृतियों की अटारियों में से  धूल और जालों के बीच से निकाल कर वे उन्हें खोलती हैं और कड़वे-मीठे पलों को आज और कल के साथ जीते हुए कभी बेलौस हँसती हैं तो कभी स्वर अवरुद्ध भी कर बैठती हैं  । अपनेपन की संजीवनी को आँचल में समेट कर दुबारा मिलने का वादा करके लौट जाती हैं अपनी -अपनी सीमाओं में,जहाँ उनका अपना-अपना संसार हैं ।कमाल की बात यह है कि सब कुछ भरा-भरा होने के बावजूद भी रिक्तता का खाली कोना कहीं शेष रह जाता है ।जो वे गाहे-बगाहे इस फ़ुर्सत नाम की दहलीज़ पर आकर भरती हैं ।


                                                  *** 

Sunday, October 22, 2023

“उलझन”

 ( Click by me )

                 लिखना-पढना अब उन साड़ियों की तरह हो गया जो न जाने कब से बंद पड़ी हैं पारदर्शी पन्नियों में.., विचार आते हैं और अन्तस् की गहराइयों को स्पर्श करते हुए न जाने कैसे शून्य में खो जाते हैं ।मेरे लिए सलीके से जीने के लिए खुद को चाहना और अभिव्यक्त करना बड़ा ज़रूरी होता है  और वो कहीं खो सा गया है ।शब्द-शब्द बिखरे हैं चारों तरफ। चुन कर माला गूँथनी भी चाहूँ तो फिसल जाते हैं मोतियों की मानिन्द । उदासीनता का भाव आसमान की घटाओं सा घिर आया है पढ़ने -लिखने के मामले में ।

                                  जानती हूँ अभिव्यक्ति के प्रकटीकरण में जड़ता कम से कम मेरे लिए व्यक्तित्व में कहीं न कहीं अपूर्णता है जिसे पूर्ण बनाने का दायित्व भी इन्सान का स्वयं का ही है । इस जड़ता के समापन के लिए खुद की खुद से जंग जारी है ।

                                            ***

Friday, August 11, 2023

“संदूक"

बहुत दिनों के बाद आज समय मिला है ..आलमारी ठीक करने का । कितनी ही अनर्गल चीजें रख देती हूँ इसमें और फिर साफ करते करते सलीके से  ना जाने कितना समय लग जाता है ।  कितनी स्मृतियाँ जुड़ी होती है हर चीज के साथ ..और मन है कि  डूबता चला जाता है उन गलियारों में और जब काम पूरा होता है तो सूर्यदेव अस्ताचलगामी हो जाते हैं । ऐसे समय में  अक्सर बचपन का घर और माँ का करीने से जँचा कमरा घूम जाता है नज़रों के आगे । इस आकर्षण का कारण माँ के सलीकेदार होने की प्रंशसा का होना मुख्य है जो घर के सदस्यों के अतिरिक्त रिश्तेदारों से भी सुनने को मिलती थी । माँ के कमरे में दीवारों में बनी आलमारियों में एक आलमारी पर सदा ताला लगा देखती थी हमेशा और उसकी चाबी का गुच्छा माँ की साड़ी के छोर से बंधा हुआ…,अगर पल्लू के छोर पर नहीं तो पक्का रसोईघर के सामान के बीच रखा ,जिसे वे प्रायः भूल जाया करती थीं काम करते हुए । और उसे ढूंढने का श्रेय मेरे हिस्से में सबसे अधिक आता था । माँ जब भी आलमारी खोलती सूटकेसों के साथ करीने से रखी पुरानी बेडशीट पर लोहे की प्रिटेंड संदूक को जरूर अपलक निहारती दिखती और मैं उनके गले में हाथ डाल कर झूलती हुई पूछती --'तुम्हारी तिजोरी है माँ ?'  स्नेह में डूबा लरजती आवाज में उनका जवाब होता -- हाँ.. तेरी नानी की भेंट है यह ।और मैं उलझा देती उन्हें बहुत सारे प्रश्नों में..जिनकी उलझन से बचने के लिए वे सदा ही  मुझे-- जा पढ़ाई कर.. कह कर चुप करा देती ।

                      अपने घर में जब भी फुर्सत से आलमारियां ठीक

करती हूँ ...माँ की आलमारी और प्रिटेंड सा संदूक याद आ जाता

 है । माँ का संदूक को सावधानी से रखना , करीने से खोलना ,  कपडों की तहों में चिट्ठियाँ रखना ...कुछ ननिहाल से मिली भेंटों को अपलक तांकना ; बालमन को तो समझ नहीं आता था पर अब समझ आता है ।  संदूक का छोर पकड़ती माँ  मानो हाथ पकड़ती थी अपनी माँ का .., उसमें रखे सामान को सहेजती माँ का बालमन भी अपने बचपन के गलियारों में विचरण करता ही होगा मगर  उनके एकान्तिक अहसासों की एकाग्रता को भंग करती कभी मैं  तो कभी भाई -बहन उनको उनके बचपन से बड़प्पन के संसार में ले आया करते थे मानो कह रहे हो -- "तुम 'लाइट हाउस' हो हमारा … कहाँ जा रही हो माँ?"   आज माँ नहीं हैं.. मैं आलमारी ठीक करते करते मन से माँ की तरह भटक रही हूँ यादों की उन विथियों में … जहाँ माँ का संदूक  है ..और अब है भी या नहीं पता नही...जिसमें ना जाने कितने अनकहे अहसास बंद थे माँ के करीने से सजाये हुए .. उन्हीं को याद करती मैं वापस लौट आती हूँ अपनी आलमारी के पास बिखरे यादों के संदूक के साथ ।


                                        *

Thursday, May 11, 2023

“अख़बार”

गेट में घुसते ही अफरा-तफ़री का माहौल देख उसका माथा ठनका और वह मन ही मन बुदबुदाई - “देर तो नहीं हुई ..,ना ही कोई इंस्पेक्शन होने वाला था आज ।”

अजीब सा तनाव महसूस करती हुई वह ऑफिस में घुसी कि हेड ने उससे सवाल किया- “आज का अख़बार देखा ?” 

 -“नहीं मैम ! सुबह-सुबह भाग-दौड़ में कई बार हैडिंग देखनी ही मुश्किल हो जाती है..,न्यूज़ पेपर की बारी छुट्टी के बाद शाम की चाय के साथ ही आती है ।” अभिवादन के साथ उसने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया और उन्हें व्यस्त देख सिग्नेचर के बाद पेन को उँगलियों के बीच घुमाती हुई स्टाफ़ रूम की तरफ़ बढ़ गई । 

                   वहाँ उसे अपने दो-चार साथी  किसी गंभीर चर्चा मे व्यस्त लगे । उन्हीं के बीच जगह बनाती वह दीवार से लगी अपनी आलमारी की ओर बढ़ी लेकिन हेड की बात और टेबल पर पड़े पेपर ने उसके कदम रोक दिए  ।  जिज्ञासा से उसने पन्ने पलटने आरम्भ किये ही थे कि एक पेज पर छपी फोटो देख कर वह सन्न रह गई ।

 कॉलम का शीर्षक और अंदर छपे शब्दों के साथ उसके लिए  सहयोगियों के संवाद भी कानों में पड़ी कई दिन पूर्व  की आवाज़ों की धमक में गौण होते चले गए । 

     - “आगे रेगुलर पढ़ाने के लिए घर वाले तैयार नहीं हैं मैम ! खुद तो गई सो गई घर की बाकी लड़कियों के रास्तों में काँटे बो गयी वीरां । घर की लड़कियाँ पढ़ना चाहेंगी तो  प्राइवेट ही पढ़ सकेंगी अब ।” टीसी के लिए एप्लिकेशन उसे थमाते हुए महिला  ने डबडबाई आँखों के साथ भरे गले से कहा था ।

            - “पता नहीं क्यों किया उसने ऐसा..,लड़की तो बहुत अच्छी और होशियार थी ।”  महिला के हाथ से पानी का  ख़ाली ग्लास  ट्रे में रख वहाँ से निकलती बाईजी बोलीं ।

        हाथ में पकड़े अख़बार में वीरां की खिलखिलाती तस्वीर देख उसकी आँखें छलछला उठीं ।

      

                                       ***

Wednesday, May 3, 2023

“उधेड़बुन”

 

                                             

किसी बात के चलते किसी घनिष्ठ ने कभी कहा कि -“एक वक़्त के बाद लोग जम नहीं पाते किसी जगह..।” और मैंने हँसते हुए प्रतिवाद किया था -  “अच्छा !! बरगद ,पीपल , नीम नहीं रहते ..,मनी प्लांट हो जाते हैं कहीं भी लगा दो .., बस लग ही जाते हैं ।” 

       शायद उन्हें मेरी बात पसन्द नहीं आई और चुप्पी साध ली ।   मौन अंतराल को भरने के लिए हमारे बीच कोई दूसरा विषय छिड़ गया और इसी के साथ बातों का सिलसिला भी कहीं और मोड़ पर मुड़ गया । मगर उनका वाक्य और अपना संवाद रह-रह कर कानों में गूंजता है जब भी मन भटकता है ।

     रमता जोगी जैसा स्वभाव बहुत काम का है रोज़ी-रोटी की ख़ातिर यहाँ-वहाँ प्रवास कर रहे लोगों के लिए या फिर बन जाता है आवश्यकतानुसार । इसीलिए कहा जाता रहा होगा “आवश्यकता आविष्कार की जननी है” यहाँ रिसर्च जैसी कोई बात नहीं बस मानव व्यवहार की बात है ।उसमें भी समयानुसार परिवर्तन आम है । परिस्थितियों के अनुसार पानी की तरह ढल जाता है आदमी भी ।

          आजकल मेरा मन असीम से ससीम के बीच चक्कर घिन्नी में बँधे लट्टू सा घूमता रहता है । कठिन समय के भंवर से बाहर निकलने के लिए कई बार ढलती साँझ में नीड़ में लौटते परिन्दों सा वह अपनी जड़ों को ढूँढता है तो कई बार लौट आता उसी थान के खूँटें पर जहाँ ढलती साँझ और नीड़ के परिन्दों का अस्तित्व कल्पनामात्र है । जीवन का यही शाश्वत सत्य हम अक्सर जीते हैं । जिसे न छोड़ते बन पाता है और न पकड़ते बन पाता है ।


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Tuesday, April 4, 2023

“जन्मभूमि ॥ हाइबन ॥



 “यहाँ के बाज़ार में कुछ नहीं मिलता ..,बस नाम ही नाम है आपके शहर का । इतना बड़ा नाम और छोटा सा बाज़ार ।” नई बहू  गाय को दुहते हुए भुनभुनाई ।

  “अरी बावली ये तो पढ़ने वाले बच्चों का ठाँव है । कितनी दूर में फैली कितनी बड़ी कॉलेज कि एक गाँव बस जाए  फिर उतनी ही बड़ी सीरी और मूजिमघर (म्यूज़ियम) । मूजिमघर  तो दूर दिसावर से आए लोग भी देखने आते हैं । कितना बड़ा हॉस्पिटल है यहाँ आस-पास के गाँवों के लोग इलाज की ख़ातिर यही तो आते हैं । इन सब से नाम बड़ा है यहाँ का .., मैं ठीक  कह रही हूँ ना बेटी !” दूध के लिए केतली थामे खड़ी मुझको वार्तालाप  में सम्मिलित करते हुए अनपढ़ सास ने उपले थापते हुए कहा ।सहमति में गर्दन हिलाते हुए मैं उनकी समझाईश भरी बातों से चकित थी ।

            बैचलर ऑफ एजुकेशन टीचर ट्रेनिंग कॉलेज के सभागार में कभी-कभी सेमिनारों का आयोजन होता था। एक बार वहाँ भी अपने छोटे से शहर के लिए मन गर्वित हो उठा जब सभी शिक्षार्थी साथियों को एक छोटे से स्पीच से पूर्व मेरे परिचय में प्रिन्सीपल सर को यह कहते सुना - “अब ये ऐसी जगह का नाम लेंगी जहाँ इस सेमिनार में बैठा हर सदस्य जाना चाहेगा ।अब की बार “एजुकेशन टूर” पर आपको वहीं ले जाने का प्रोग्राम है ।”

                    कुछ इसी तरह के वाक़यों को  देखते सुनते वह समय भी आ ही गया जिसके बारे में अक्सर सुना है कि  - “जहाँ का दाना-पानी  आपके नसीब में लिखा होता है वहाँ आपको जाना ही पड़ता है ।”

              पूर्व और पश्चिम का अनूठा संगम लिए दिल्ली और जयपुर के बीच लगभग समान दूरी पर अवस्थित है “पिलानी”। जन्म और कर्म से जुड़ी मेरी जन्मभूमि .., मेरी माँ की स्मृतियों की तरह इसकी स्मृतियाँ  भी बहुत कस कर बाँधे है मुझे खुद से । 

       कहते हैं कि किसी की अहमियत आपके लिए क्या है इसका भान बिछोह के बाद अनुभव होता है । सिलीकॉन सिटी के नाम  से मशहूर बैंगलोर में रहते हुए मैं अक्सर उसे यहाँ के माहौल में कभी कॉर्नर हाउस पर आइसक्रीम खाते चेहरों में तो कभी चेरी ब्लॉसम और गुलमोहर की कतारों के बीच नीम और पीपल के रूप में ढूँढ़ती हूँ  और बरबस ही मेरा मन कह उठता है -


ओ रंगरेज ~

बड़ा ही गाढ़ा तेरे

नेह का रंग


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Friday, March 3, 2023

“बीस साल बाद”


                               ( Click by me )

 धीरे-धीरे गोधूली  के धुँधलके से ढकता आसमान और  प्रदूषण रहित हवाओं में हल्की सी ठंडक । उदयपुर की धरती पर कदम रखते ही गुजरे वक़्त ने मानो दौड़ कर उन्हें अपनी बाहों में समेट कर स्वागत किया ।

         कुनकुनी सी ठंडक के स्नेहिल स्पर्श और अपनेपन की सौंधी 

महक में डूबे तीन सहयात्री न जाने मन की  कौन-कौन सी वीथियों के कोने स्पर्श करने मे मगन थे कि मौन की तन्द्रा भंग करते हुए एक ने दूसरे से कहा- “ चलो तुम्हारा अपने आप से किया वादा पूरा हुआ यहाँ अपना एक साथ आने का । जब भी पुराना एलबम खुलता है.., तुम्हारी ढलते सूरज की फोटो के साथ यहाँ मेरे साथ आने की बात ज़रूर चलती है ।” 

       “तुम्हें पता है बरसों से चली आ रही हर बार की यही कहानी थी हमारी ।”तीसरे साथी को वार्तालाप में सम्मिलित करते हुए पहला साथी बोला ।”  

                 “मुझे क्रेडिट मिलना चाहिए प्लान मेरा था। बहुत बार इस अधूरे वादे के बारे में तुम दोनों से सुना, सोचा तुमसे तो पूरा होने से रहा 

मैं ही तुम दोनों का पेंडिग काम पूरा कर दूँ ।” - मुस्कुराट के साथ बोलते समय उसकी नज़रें अभी भी खिड़की के बाहर भागते पेड़ों और इमारतों 

पर टिकी थी ।

          “हाँ भई हाँ !! बात तो सही है तुम बिन हम भाग ही तो रहे थे जीवन में। जीने की कला बस सीख रहे हैं तुमसे !” दूसरे साथी ने हँसते हुए कहा ।

      हल्की-फुल्की बातों का सिलसिला गाड़ी के रूकने और “घणी खम्मा” के अभिवादन के साथ रूक गया ।

        गंतव्य आ गया था लेक “पिछोला” से दूर अरावली श्रृंखला की पहाड़ियों के पीछे छिपता सूरज आज भी हुबहू वैसा ही था जैसा 

बीस साल पहले था । 


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