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Tuesday, November 8, 2022

“मंदी”



- “कैसे हो ? बहुत दिन हुए तुमसे बात नहीं हुई ?

हाल - चाल.., ठीक -ठाक ?” आदित्य के फ़ोन उठाते ही दूसरी ओर से उसके मित्र अनुज ने कुशल - क्षेम पूछी ।

   आदित्य - “सब कुछ ठीक -ठाक मगर न जाने क्यों .., आजकल सूरज की रोशनी में नहाई  SNN की झील में पड़ती परछाई और उसमें तैरते पक्षी मन में ऊर्जा नहीं भरते । सड़क पर दौड़ती गाड़ियों की तरह मन में विचारों का ट्रैफ़िक जाम सा रहता है । तुम सुनाओ.., तुम्हारे क्या हाल है?”

      “फॉल्सम आजकल अपना नही बेगाना लगने लगा है 

आदित्य ! चारों ओर बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों  को खा रही 

हैं ।” उधर से आती आवाज गहरी हो गई ।

         फ़ोन डिस्कनेक्ट नहीं हुए मगर दोनों के बीच  संवाद का स्थान नीरवता ने ले लिया और चिन्ता में डूबी उनकी सांसें  मानो वार्तालाप में सेतु का काम कर रही थीं । सुरसा के मुँह सरीखी फैलती महंगाई के बीच “आर्थिक मंदी” की भयावहता की सुनामी उनके बीच पसरी पड़ी थी ।


    

                                   ***





18 comments:

  1. SNN lake Mangluru, and फॉल्सम ???
    गहन विचारो का गूढ़ प्रक्षेपण.... अभिनन्दन !

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  2. बहुत बहुत आभार सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया हेतु🙏

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  3. वर्तमान समय को देखकर प्रतीत होता है कि ऐसी अनगिनत लघुकथाएं संसार के विभिन्न कोनों में बिखरी पड़ी होंगी तथा दिन-प्रतिदिन बिखरती जा रही होंगी। इस बाबत चाहे कुछ किया न जा सके, फैलते जा रहे दर्द का एहसास तो होना ही चाहिए।

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  4. सत्य कथन जितेन्द्र जी ! आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया ने सृजन को सार्थक किया । हृदयतल से हार्दिक आभार 🙏

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  5. आपकी लिखी रचना सोमवार 28 नवम्बर 2022 को
    पांच लिंकों का आनंद पर... साझा की गई है
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    संगीता स्वरूप

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  6. सृजन को पाँच लिंकों का आनन्द में में सम्मिलित करने के लिए हार्दिक आभार आ. दीदी ! सादर सस्नेह वन्दे !

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  7. Replies
    1. आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया ने सृजन को सार्थक किया । हृदयतल से हार्दिक आभार 🙏

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  8. चारों ओर बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को खा रही हैं ।
    सही कहा आर्थिक मंदी की भयावहता एवं सुरसा सा मुँह फैलायें मँहगाई....
    बहुत सटीक एवं सारगर्भित लघुकथा।

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    1. सृजन को सार्थकता प्रदान करती सराहना के लिए हृदय से असीम आभार सुधा जी !

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  9. लघुकथा में निहित गहन भाव मन मस्तिष्क पर छा गयी। शब्दों से भावों का सूक्ष्म संप्रेषण आपकी लेखनी की कारीगरी है दी।
    प्रणाम
    सस्नेह दी।

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    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया स्नेहिल प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ श्वेता ! हृदय से असीम आभार । सस्नेह…!!

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  10. गहन भाव ! आज के समय में मध्यम वर्ग के एक ही स्थिति में गुजरते दो लोगों में मौन भी भाव संप्रेषण करता हैं ।
    बहुत सुंदर मीना जी।

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    1. लेखनी का मान बढ़ाती आपकी सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया ने सृजन को सार्थकता प्रदान की । हृदय से असीम आभार कुसुम जी !

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  11. प्रिय मीना जी, जब चारों तरफ से युद्ध और अराजकता के समाचार आ रहे हों और व्यवस्थायें खंडित हो रही हों तो मन की व्यवस्था कैसे सही रह सकती है।समय से पीडित दो लोगों का अन्तर्मन जब विकल हो तो बाहरी सौंदर्य उन्हें कैसे लुभा सकता है!!

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    1. सत्य कथन प्रिय रेणु बहन ! आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया ने सृजन को सार्थक किया । हृदय से असीम आभार ।

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  12. आज की जटिल समस्याओं के परिदृश्य का बड़ी बारीकी से विश्लेषण किया है आपने इस सामयिक लघुकथा में ।

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  13. आपकी सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया से सृजन को सार्थकता मिली । हृदय से असीम आभार जिज्ञासा जी !

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