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Tuesday, April 4, 2023

“जन्मभूमि ॥ हाइबन ॥



 “यहाँ के बाज़ार में कुछ नहीं मिलता ..,बस नाम ही नाम है आपके शहर का । इतना बड़ा नाम और छोटा सा बाज़ार ।” नई बहू  गाय को दुहते हुए भुनभुनाई ।

  “अरी बावली ये तो पढ़ने वाले बच्चों का ठाँव है । कितनी दूर में फैली कितनी बड़ी कॉलेज कि एक गाँव बस जाए  फिर उतनी ही बड़ी सीरी और मूजिमघर (म्यूज़ियम) । मूजिमघर  तो दूर दिसावर से आए लोग भी देखने आते हैं । कितना बड़ा हॉस्पिटल है यहाँ आस-पास के गाँवों के लोग इलाज की ख़ातिर यही तो आते हैं । इन सब से नाम बड़ा है यहाँ का .., मैं ठीक  कह रही हूँ ना बेटी !” दूध के लिए केतली थामे खड़ी मुझको वार्तालाप  में सम्मिलित करते हुए अनपढ़ सास ने उपले थापते हुए कहा ।सहमति में गर्दन हिलाते हुए मैं उनकी समझाईश भरी बातों से चकित थी ।

            बैचलर ऑफ एजुकेशन टीचर ट्रेनिंग कॉलेज के सभागार में कभी-कभी सेमिनारों का आयोजन होता था। एक बार वहाँ भी अपने छोटे से शहर के लिए मन गर्वित हो उठा जब सभी शिक्षार्थी साथियों को एक छोटे से स्पीच से पूर्व मेरे परिचय में प्रिन्सीपल सर को यह कहते सुना - “अब ये ऐसी जगह का नाम लेंगी जहाँ इस सेमिनार में बैठा हर सदस्य जाना चाहेगा ।अब की बार “एजुकेशन टूर” पर आपको वहीं ले जाने का प्रोग्राम है ।”

                    कुछ इसी तरह के वाक़यों को  देखते सुनते वह समय भी आ ही गया जिसके बारे में अक्सर सुना है कि  - “जहाँ का दाना-पानी  आपके नसीब में लिखा होता है वहाँ आपको जाना ही पड़ता है ।”

              पूर्व और पश्चिम का अनूठा संगम लिए दिल्ली और जयपुर के बीच लगभग समान दूरी पर अवस्थित है “पिलानी”। जन्म और कर्म से जुड़ी मेरी जन्मभूमि .., मेरी माँ की स्मृतियों की तरह इसकी स्मृतियाँ  भी बहुत कस कर बाँधे है मुझे खुद से । 

       कहते हैं कि किसी की अहमियत आपके लिए क्या है इसका भान बिछोह के बाद अनुभव होता है । सिलीकॉन सिटी के नाम  से मशहूर बैंगलोर में रहते हुए मैं अक्सर उसे यहाँ के माहौल में कभी कॉर्नर हाउस पर आइसक्रीम खाते चेहरों में तो कभी चेरी ब्लॉसम और गुलमोहर की कतारों के बीच नीम और पीपल के रूप में ढूँढ़ती हूँ  और बरबस ही मेरा मन कह उठता है -


ओ रंगरेज ~

बड़ा ही गाढ़ा तेरे

नेह का रंग


*

Friday, March 3, 2023

“बीस साल बाद”


                               ( Click by me )

 धीरे-धीरे गोधूली  के धुँधलके से ढकता आसमान और  प्रदूषण रहित हवाओं में हल्की सी ठंडक । उदयपुर की धरती पर कदम रखते ही गुजरे वक़्त ने मानो दौड़ कर उन्हें अपनी बाहों में समेट कर स्वागत किया ।

         कुनकुनी सी ठंडक के स्नेहिल स्पर्श और अपनेपन की सौंधी 

महक में डूबे तीन सहयात्री न जाने मन की  कौन-कौन सी वीथियों के कोने स्पर्श करने मे मगन थे कि मौन की तन्द्रा भंग करते हुए एक ने दूसरे से कहा- “ चलो तुम्हारा अपने आप से किया वादा पूरा हुआ यहाँ अपना एक साथ आने का । जब भी पुराना एलबम खुलता है.., तुम्हारी ढलते सूरज की फोटो के साथ यहाँ मेरे साथ आने की बात ज़रूर चलती है ।” 

       “तुम्हें पता है बरसों से चली आ रही हर बार की यही कहानी थी हमारी ।”तीसरे साथी को वार्तालाप में सम्मिलित करते हुए पहला साथी बोला ।”  

                 “मुझे क्रेडिट मिलना चाहिए प्लान मेरा था। बहुत बार इस अधूरे वादे के बारे में तुम दोनों से सुना, सोचा तुमसे तो पूरा होने से रहा 

मैं ही तुम दोनों का पेंडिग काम पूरा कर दूँ ।” - मुस्कुराट के साथ बोलते समय उसकी नज़रें अभी भी खिड़की के बाहर भागते पेड़ों और इमारतों 

पर टिकी थी ।

          “हाँ भई हाँ !! बात तो सही है तुम बिन हम भाग ही तो रहे थे जीवन में। जीने की कला बस सीख रहे हैं तुमसे !” दूसरे साथी ने हँसते हुए कहा ।

      हल्की-फुल्की बातों का सिलसिला गाड़ी के रूकने और “घणी खम्मा” के अभिवादन के साथ रूक गया ।

        गंतव्य आ गया था लेक “पिछोला” से दूर अरावली श्रृंखला की पहाड़ियों के पीछे छिपता सूरज आज भी हुबहू वैसा ही था जैसा 

बीस साल पहले था । 


                                     ***

Tuesday, February 14, 2023

“ऋतुराज वसंत”

फरवरी से अप्रैल के मध्य वसंत ऋतु में प्रकृति अपने सौंदर्य की 

अद्भुत छटा बिखेरती है । ऐसा माना गया है कि माघ महीने की 

शुक्ल पंचमी से वसंत ऋतु का आरंभ होते ही मौसम सुहावना हो 

जाता है, पेड़ों में नए पत्ते आने लगते हैं, आम के पेड़ बौरों से लद 

जाते हैं । खेत सरसों के फूलों और गोधूम की बालियों से महमहा उठते हैं  । 

                 वसन्तोत्सव से होली तक राग- रंग से सरोबार इस 

समय को  ऋतुराज कहा गया है । इसके प्रभाव से तो गोपेश्वर  भगवान  श्री कृष्ण भी अछूते नहीं रहे तभी तो कुरुक्षेत्र समर भूमि में अर्जुन को विराट स्वरूप के दर्शन करवाते हुए   गीता उपदेश में कहा था  - “मैं ऋतुओं में वसंत हूँ।” 

       वसंत के आगमन का अनुभव मेरी दृष्टि में एक अलग सी 

पहचान लिए है - “बाल्यावस्था में रात्रि काल में हल्की सी सर्दियों में चंग की थाप के साथ मन-मस्तिष्क पर सदैव वार्षिक परीक्षा की दस्तक  कानों में मृदंग लहरियों सी बज उठा करती थी और वसंत पंचमी के दिन पीले फूलों की सुगंध और केसरिया रंगों के रस में 

डूबी मिठाइयों की महक से आप्लावित मंदिर प्रांगण में सरस्वती आराधना में बन्द दृगपटलों में पूरे साल की कमाई अर्थात् अंक-तालिका के विषयवार अंकों  का लेखा-जोखा साकार हो 

उठता था।”

                       ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती गई त्यों-त्यों बोर्ड परीक्षाओं 

की फिर  यूनिवर्सिटी की परीक्षाओं की चिंता पर्वत सी अचलता के साथ कलेजे पर बैठी रहती । युवावस्था में शिक्षा-व्यवसाय की अति व्यस्तताओं के बीच वसंतोत्सव पर्वों का हर्षोल्लास और प्रकृति का सौन्दर्य मेरा ध्यान अपनी ओर खींचने में सदा ही असमर्थ रहता । 

                  अति व्यस्तताओं से दूर फ़ुर्सत के पलों में सागर 

किनारे अठखेलियाँ करती लहरों के सानिध्य में पीले फूलों से सरसी सरसों और स्वर्ण सदृश गोधूम की पकती बालियों को देखे बिना मैं

कैसे कह दूँ-

               “ओह !! ऋतुराज वसंत !! मधुमास वसंत !!”

              

***

Saturday, February 11, 2023

“घर”



  अलविदा कहने का वक्त आ ही गया आखिर.. मेरे साथ रह कर तुम भी मेरी खामोशी के आदी हो गए थे । अक्सर हवा की सरसराहट तो कभी गाड़ियों के हॉर्न कम से कम मेरे साथ तुम्हें भी अहसास करवाते

रहते कि दिन की गतिविधियां चल रहीं हैं कहीं न कहीं ।'वीक-एण्ड' पर मैं बच्चों के साथ अपने मौन का आवरण उतार फेंकती तो तुम भी मेरी ही तरह व्यस्त और मुखर हो कर चंचल हो जाते ।समय पंख 

लगा कर कैसे उड़ता भान ही  नहीं होता। ख़ैर.., अपना साथ इतने समय का ही था ।

          चलने का समय करीब आ रहा है । सामान की पैकिंग हो रही है सब चीजें सम्हालते हुए मैं एक एक सामान  सहेज रही

 हूँ । महत्वपूर्ण सामान में तुम से जुड़ी सब यादें भी स्मृति-मंजूषा में करीने से सजा ली हैं । फुर्सत के पलों में जब मन करेगा यादों की गठरी खोल कर बैठ जाया करूँगी.., गाड़िया लुहारों की सी आदत 

हो गई है मेरी ..,आज यहाँ तो कल वहाँ। जो आज बेगाना है वह 

कल अपना सा लगेगा..मुझे भी..तुम्हे भी । मेरी यायावरी में तुम्हारा साथ मुझे याद रहेगा सदा सर्वदा ।


                                   ***

Thursday, December 8, 2022

“धुआँ”

 


राधिका शाम को अक्सर छत पर चली आती है । सांझ के तारे 

को देखने के साथ पास-पड़ौस के घरों से उठता धुआँ देखना उसे 

बड़ा भला लगता है । वह अनुमान  लगाया करती है कि कौन से घर 

में सबसे पहले खाना बनना शुरू होगा । उसकी सहपाठिन सहेलियाँ क्या कर रही होंगी अपने घरों में । वह दो दिन से देख रही थी श्यामा काकी के घर से किसी तरह की सुगबुगाहट नहीं थी ।कल स्कूल से आते वक़्त उनके घर का दरवाज़ा भी खुला देखा मगर सांझ के समय उठता धुआँ  नहीं देखा छत की मुँडेर थामे वह यह सोच ही रही 

होती है कि माँ की आवाज़ आती है - “अब आ भी जा नीचे., 

अंधेरा हो रहा है !” 

-  “आई माँ !” कहते हुए वह सीढ़ियों से फुर्ती से उतर कर माँ के आगे आ खड़ी हुई ।

- “ स्वेटर पहन ले ! तेरा नया कार्डिगन बन गया , देखूँ तो कैसा लग रहा है ।रोज पूछती है कब पूरा होगा और आज बन कर तैयार हो 

गया तो एक बार भी नहीं पूछा ।” माँ की बात पूरी होती उससे पूर्व राधिका गाजरी रंग के कार्डिगन में माँ के आगे फिर से आ खड़ी हुई ,चमकती आँखों से वह मानो माँ से पूछ रही थी -“कैसी लग रही 

हूँ माँ !” 

   - “खाने में क्या बना रही हो माँ.., भूख लगी है जोर से ।” 

नमकीन चावल …, छत पर खड़ी थी तब नहीं लगी ।” मुस्कुराती हुई माँ बोली और गोभी , आलू काटने के लिए स्वयं के आगे और मटर की टोकरी के साथ प्याला उसकी ओर बढ़ा दिया मटर छिलने के लिए । 

अचानक उसे जैसे ही कुछ याद आया छिले मटर के दाने प्याले में डालते हुए बुदबुदा उठी -“ माँ श्यामा काकी है तो यही मगर उनके 

घर से धुआँ नही उठ रहा शायद उनके घर गैस का कनेक्शन लग 

गया है ।”

 उसकी बात सुनते ही माँ की आँखें सोच में डूब गईं और वे गहरी साँस लेते हुए उठी -  “जहाँ बिजली के कनेक्शन की बात दूर की कौड़ी हो वहाँ गैस कनेक्शन की बात करती है लड़की !” कहने के साथ ही उन्होंने छिले आलू और गोभी पानी में डाले और राधिका से कहा -मेरे साथ चल ।”

        थोड़ी देर बाद  तौलिए से ढकी अनाज की भरी बाल्टी और भगौने भर आटे के साथ चिन्ता में डूबी माँ के साथ  गाजरी कार्डिगन की जेबों में हाथ डाले चलती राधिका नमकीन चावल की बात भूलकर श्यामा काकी के घर की ओर कदम बढ़ाते हुए खुश थी कि कल शाम छत पर सांझ के तारे के साथ उनके घर से उठता 

धुआँ देख सकेगी ।

                                 ***

Tuesday, November 8, 2022

“मंदी”



- “कैसे हो ? बहुत दिन हुए तुमसे बात नहीं हुई ?

हाल - चाल.., ठीक -ठाक ?” आदित्य के फ़ोन उठाते ही दूसरी ओर से उसके मित्र अनुज ने कुशल - क्षेम पूछी ।

   आदित्य - “सब कुछ ठीक -ठाक मगर न जाने क्यों .., आजकल सूरज की रोशनी में नहाई  SNN की झील में पड़ती परछाई और उसमें तैरते पक्षी मन में ऊर्जा नहीं भरते । सड़क पर दौड़ती गाड़ियों की तरह मन में विचारों का ट्रैफ़िक जाम सा रहता है । तुम सुनाओ.., तुम्हारे क्या हाल है?”

      “फॉल्सम आजकल अपना नही बेगाना लगने लगा है 

आदित्य ! चारों ओर बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों  को खा रही 

हैं ।” उधर से आती आवाज गहरी हो गई ।

         फ़ोन डिस्कनेक्ट नहीं हुए मगर दोनों के बीच  संवाद का स्थान नीरवता ने ले लिया और चिन्ता में डूबी उनकी सांसें  मानो वार्तालाप में सेतु का काम कर रही थीं । सुरसा के मुँह सरीखी फैलती महंगाई के बीच “आर्थिक मंदी” की भयावहता की सुनामी उनके बीच पसरी पड़ी थी ।


    

                                   ***





Friday, October 7, 2022

“फैशन”



-“आज तेरी एक चोटी बना देती हूँ .., अभी बहुत काम पड़े 

हैं ।”  कान पर कंघी रखे माँ रेवा की चोटियाँ खोलती हुई व्यस्त भाव से कहती हैं ।

          “नहीं.., दो चोटी और वह भी झूले वाली जो इन्टरवल में सीनियर्स खोल न सके । स्केल से नापती हैं चोटी और पूछती हैं क्या खिलाती हैं तेरी माँ ? तेल कौन सा..,शैम्पू का नाम ..,और देर हो जाएगी तो प्रीफेक्टस रोक लेंगी प्रेयर हॉल के बाहर .., फैशन बना के आती है लम्बे बाल हैं  तो .., टीचर की डॉंट अलग से।  कम्पलसरी है गुँथी चोटियाँ ।” 

         रेवा कटर से पेन्सिल छिलती हुई एक साँस में बात पूरी करने की कोशिश कर ही रही होती है कि माँ बालों में कंघी चलाती हुई कहती हैं -  अच्छा बाबा ! साँस ले ले …, अभी आधा घण्टा बाकी है दस बजने में .., पहुँच जाएगी स्कूल ।”

       “ओय रेवा ! दस मिनट बचे हैं दस बजने में.., चल भागते हैं जल्दी से नहीं तो लेट हो जाएगी ।” भाई की आवाज़ से उसकी तन्द्रा टूटी और आईने के सामने कंघी रख वहाँ रखा हेयर बैंड बालों पर डालते हुए उसने जल्दी से कंधे पर बैग डालते हुए कमरे का गेट बन्द किया ।

                 रोटी बनाते हाथों पर लगा रह गया आटा खुरच कर अंगुलियाँ झटकती रेवा आंगन से गुजरते हुए आँखों में आया पानी भी उतनी ही निर्ममता और लापरवाही से झटक देती है जब चाची को दादी से यह कहते सुनती है - “लड़की के पर निकल आए हैं .., फैशन में डूब कर कैसे छोटे छोटे बाल करवा आई है लड़कों सरीखे । बिना रोक -टोक बच्चे हाथ से निकल जाते हैं ।”


                                    ***