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Tuesday, July 28, 2020

'मोह'

ऐसा नही कि कभी तुम्हारी याद‎ आई  ही नही , आई ना.., जब कभी किसी कशमकश में उलझी ,जब  कभी खुद के वजूद की तलाश हुई । सदा तुम्हीं तो जादू की झप्पी बनी , कभी फोन पर , तो कभी प्रत्यक्ष‎ रूप‎ में । तुम , तुम हो इसका अहसास सदा तुम्हारी अनुपस्थिति में‎ हुआ । मुझे सदा यही  लगा कि हर समस्या का हल है तुम्हारे पास । मैं तुम‎ से कुछ कहूँगी अगले ही पल तुम जैसे कोई जादुई छड़ी घुमाओगी और परेशानी फुर्र ..। बचपन से सदा अलाहद्दीन का चिराग समझा तुम्हें.., वह अनवरत बोले जा रही थी धारा-प्रवाह.. ‘अगला जन्म यदि होता है तो…,  तो मैं यही जन्म फिर से जीना चाहूंगी । तुम सदा ऐसी ही रहना ,अगले जन्म में भी ।'
       -- "देखो ऊपर वाले ने जो करना है वो उसे ही करने दो वो उसी का काम है हम सीमाओं में बँधे प्राणी हैं‎ । और हाँ तुम कहाँ आज भावनाओं में बह रही हो तुम्हारी अपनी सीमाएँ और बंधन
हैं । किसी की छाया में बंध कर मनुष्य का सम्पूर्ण विकास कहाँ हो पाता है । अपनी व्यक्तिगत पहचान के लिए स्वयं की सक्षमता और उसका अनुपालन ही मानव को सम्प्रभु सम्पन्न बनाता है ।
 इस सम्प्रभुता का परित्याग कर स्वयं का अस्तित्व खो जाता है कहीं । 'मैं' हम में बदल कर विशद बने तो बेहतर है लेकिन कई बार अत्यधिक मोह का भाव सुकून की जगह पराश्रय का भाव भी पैदा कर देता है..,जरा इस विषय पर भी गौर करना ।"
       मोह को सीमाओं में बाँध कर  सहजता और निर्लिप्तता के साथ बात का समापन कर वह एक सन्यासी की तरह आगे
बढ़‎ गई ।
शायद सांसारिक व्यवहारिकता से थक कर ।

Saturday, July 18, 2020

"प्रार्थना"

  किसी भी देव-स्थल पर जाकर एक  सकारात्मकता भरा सुकून और असीम शान्ति का अहसास हमारे मन को  होता है।  मेरी नजर में इसका कारण वो असीम शक्ति है जिसे हम अपना आराध्य इष्ट  मानते हैं।  देवत्व के गुणों से सम्पन्न पूजा स्थलों पर शान्ति और सुकून पाने के लिए अक्सर हम धार्मिक स्थलों की यात्रा करते हैं ।
 कभी पढ़ा था कि शाब्दिक दृष्टि से धर्म का अर्थ ‘धारण करना’ होता है जो संस्कृत के ‘धृ’ धातु से बना। चिन्तन इस विषय पर भी कि धारण किसे करें और क्या करें ? तो यहाँ महत्वपूर्ण तथ्य यह कि धारण करने के लिए वे अच्छे गुण जो ‘सर्वजन हिताय’ की भावना पर आधारित सम्पूर्ण‎ जीव जगत के कल्याण और परमार्थ के लिए हो। सुगमता की दृष्टि से मानव समुदाय‎ ने अपने आदर्श के रुप में अपने आराध्य चुने जिनकी प्रेरणा‎ से वे सन्मार्ग पर चल सके। आगे चलकर समाज में विचारों में मतभेद पैदा हुए कुछ विद्वानों‎ ने सगुण और कुछ ने निर्गुण उपासना पर बल दिया। सगुण उपासना में ईश प्रार्थना आसान हुई कि प्रत्यक्ष‎ रूप में आकार‎-प्रकार है …,अपने आराध्य का जिसको सर्वशक्तिमान मान वह पूजते हैं मगर निर्गुण उपासना आसान नही थी। ध्यान लगाना और उच्च आदर्शों का अनुसरण करना  वह भी उस असीम शक्ति का जिसका कोई  आकार-प्रकार नही हो वास्तव‎ में दुष्कर कार्य था।  लेकिन मन्तव्य सभी‎ का एक ही था कि लौकिक   विकास,उन्नति,परमार्थ और ‘सर्वजन हिताय,सर्वजन सुखाय’ हेतु  ईश आराधना करनी है जिससे समाज में शान्ति और भातृत्व भाव बना रहे और पूरे मानव समुदाय का सर्वांगीण विकास हो ।
भाग-दौड़ की जिन्दगी और भौतिकतावादी दृष्टिकोण के साथ प्रतिस्पर्धात्मक जीवन शैली  में ये बातें किसी शिक्षा सत्र के पाठ्यक्रम‎ की तरह कभी  मानव को याद रहती हैं तो कभी अगला सत्र आने तक भुला दी जाती हैं। भले ही युवा पीढ़ी को यह सब याद रखना , इस विषय के बारे में सोचना रूढ़िवादी लगता हो लेकिन  व्यवहारिक जीवन की पटरी पर इन्सान जब चलना सीखता है तब दो पल के लिए सही, वह अपने जीवन में अपने आराध्य की प्रार्थना‎ अवश्य  करता है और उसकी सत्ता स्वीकार भी करता है । 
प्रार्थना‎ में हम सदैव ईश्वर के असीम और श्रेष्ठ‎ रूप की प्रभुता स्वीकार कर अपनी व अपने आत्मीयजनों  की समृद्धि और विकास तथा सुरक्षा हेतु वचन मांगते हैं कि हम सब आपके संरक्षण‎ में हैं और परिवार के मुखिया पिता अथवा माता के समान ही आपकी छत्र-छाया में स्वयं को सुरक्षित‎ महसूस करते हैं। यही शुभेच्छा एक से दो से तीन तीन से चार….,एक  श्रृंखला का निर्माण विशाल जन समुदाय‎ के रूप में करती है और सम्पूर्ण‎ समुदाय‎ द्वारा‎ अपने तथा अपने प्रियजनों के लिए मांगी गई‎ अभिलाषाएँ सर्वहित,सर्वकल्याण की भावना‎ का रूप ले देवस्थानों  में प्रवाहित सकारात्मक ऊर्जा का रूप ले लेती‎ हैं । जिस के आवरण में प्रवेश कर हम देवस्थानों पर असीम शान्ति और सुख का अनुभव करते हैं ।
     
                     🍁🍁🍁

Sunday, July 5, 2020

"अवसर"

स्कूल में दसवीं कक्षा में अनिवार्य सा कर दिया था कि
प्रवेश-पत्र लेने आने से पूर्व तक हर छात्र-छात्रा को “साक्षरता-अभियान” के अन्तर्गत किसी एक अनपढ़
को अक्षर-ज्ञान से पारंगत करना है । कई बार दूर - दराज मौहल्लों में हमें समूह में स्कूल की तरफ से ले जाया
जाता था जहां की अधिकांश महिलाएं और बालिकाएं  अक्षर-ज्ञान से वंचित थीं । मगर कहते हैं न कि इन्सान सदा अपने लिए shortcut ढूंढता है , मैंने भी ढूंढ लिया था ।
घर काम करने आने वाली महरी जिन्हें हम चाची कहते
थे - उनकी बेटी । अक्सर वह चाची के व्यस्त होने पर काम के लिए आया करती थी , मैंने अपने मिशन को पूरा करने के लिए उसे चुना । जब भी वो काम के लिए आती मैं कापी-पेन्सिल लेकर अपने मिशन को पूरा करने के लिए जुट
जाती । मूडी होने के कारण कभी वह ध्यान से पढ़ती तो कई बार पढा़ई को बेकार काम बता कर मुझे निराश कर देती । 
एक दिन उसने बर्तन साफ करते हुए बडी़ सी थाली में मिट्टी भर कर अंगुली से अपना नाम उकेर कर मुझे आवाज दी 'देख ठीक है !' मैंने​ खुशी से लगभग चिल्लाते हुए कहा - 'वाह तू तो बड़ी intelligent निकली ।'
गर्मियों में बिजली गुल होने पर पंखे - कूलर बंद होते ही रात के समय आस-पास की आवाजें साफ सुनाई देती हैं । शादी के गीतों की आवाजें सुन कर पूछने पर पता चला महरी चाची की बेटी की शादी है। दूसरे दिन मैंने पूछा --’ आप इतनी सी 
उम्र में उसकी शादी क्यों कर रहीं हैं ? मां ने मुझे टोका -'पढा़ई कर ! बड़ों की बात में नहीं बोला करते ।’ लेकिन चाची ने उत्तर दिया बड़ी शांति से -- 'मेरे जितना कद हो गया है उसका , घर संभाल लेती है । अच्छा वर मिल रहा था अवसर हाथ से कैसे जाने देती ।' लगभग चार-पांच साल बाद एक दिन  वो गली के छोर पर खड़ी नगर-पालिका में निर्वाचित हमारे ward member को लताड़ रही थी -- ‘ नालियां कितनी गंदी हैं ?  कूड़े के ढेर गली के कोने पर लगे पडे़ हैं। किस बात के नगरपालिका सदस्य हैं आप ? हमारे गांव चलकर देखो आप ! मजाल है कहीं अव्यवस्था मिल जाए।’
उसकी हिम्मत से अचंभित थी मैं । जब वह घर मिलने के लिए आई तो पता चला कि वो अपने ससुराल में अपने वार्ड की निर्वाचित सदस्य थी । नगरपालिका चुनाव में उसका वार्ड  महिलाओं के लिए सुरक्षित सीट वाला था । वो साक्षर थी “अवसर“ मिल रहा था और वो अवसर चूकने वालों में से नही थी ।

★★★★★

Saturday, June 27, 2020

"लेटर" 【लघुकथा】

"दीदी..एक काम था तुमसे । माँ को तो नहीं बताओगी ?"वह साफ किये बर्तन रसोई की स्लैब पर रखते हुए अटकते - अटकते बोली । तू बोलेगी भी अब …मैंने दिलासा देते हुए कहा ।
 "एक चिट्ठी लिखानी है उनको...दोपहर में आऊँगी ।
  माँ के सोने पर… लिफाफा नहीं है मेरे पास । मैंने
कहा - कोई नही मैं दे दूंगी...तू आ जाना 
 दोपहर में लाइट के अभाव में हम छत की सीढ़ियों पर बैठी चिट्ठी लिखने और लिखाने ।
 "अब की बार तुम्हारी माँ ने बहुत काम कराया..रोटी खाने को गिन कर ही देती थी । कहती थी तुम      पैसे नहीं भेजते घर ।" 
  मैं उसका दुख उतार रही थी अन्तर्देशीय लिफाफे
 में  और वह साड़ी के पल्लू को अंगुली से  लपेट-खोल रही थी उधेडबुन में उलझी । अचानक   जैसे कुछ भूला याद आया हो कुछ उदास और 
दुखी लहजे में बोली - "तुम पैसे भेजोगे तभी तो तुम्हारी माँ बिना गिने रोटी खाने को देगी । 
यहाँ माँ कहती  है जँवाई जी कब आयेंगे.. वहाँ तुम्हारी माँ मुझसे सवाल करती है तुम पैसे कब भेजोगे। "
मैंने उसकी बात सुन लगभग उस पर गुस्सा करते हुए कहा -  तुमने घर पर नहीं बताया ?"
 सबको पता है दीदी .. यही गृहस्थी है भाभी -भाई   को बोझ लग..., हमारा संवाद और बढ़ता उससे
 पूर्व उसकी भाभी ने आ कर लगभग डॉटते हुए
 कहा - "जीजी ! यहाँ बैठी लव-लेटर लिखा रही 
हो । वहाँ मांजी चिल्ला रहीं हैं खेत से लकड़ियाँ
 नहीं आई तो शाम को चूल्हा कैसे जलेगा ।"
  आधा-अधूरा ख़त मेरे हाथ से छीन कर साड़ी के  पल्लू में छिपाती हुई  "ओ माँ ! मैं तो भूल ही गई
 थी ।" कहती हुई वह घर की ओर भागी । भागती ननद को खा जाने वाली नजरों से घूरती और मेरी तरफ बनावटी मुस्कुराहट फेंकती भाभी ने जुमला 
उछाला - जीजी का मन नहीं टिकता अब…
   काम कहीं ,ध्यान कहीं ।  
 निस्तब्ध मुद्रा में बैठी मैं उसकी खातिर मन में उठी   व्यथा और उसके कथित लव - लेटर के बारे में 
सोच रही थी ।
                           
🍁🍁🍁

Tuesday, June 23, 2020

"भोर"

पंडित जी सिर झुकाए मंडप के नीचे बैठे कहीं 
गहरी सोच में डूबे एक तिनके से कुछ कुरेदते हुए  सोच रहे
थे कि शादी की यह आखिरी रस्म पूरी हो तो वह भी
घर की राह ले  । घर की औरतें और आदमी बेटी की
विदाई से पूर्व इधर -उधर व्यस्त होने का दिखावा कर
रहे थे वही बाहर के लोगों में अलग कानाफूसी चल
रही थी । दूल्हा और उसका परिवार कहीं दिखाई नहीं
दे रहा था । बाराती खा -पीकर या तो विदा हो चुके थे
या डेरे में तान कर सो रहे थे ।
अचानक मंडप के नीचे सरगर्मी बढ़ती दिखी । 
दूल्हे ने निर्धारित आसन पर आ कर बैठते हुए 
कहा - "रस्में पूरी कीजिए पंडित जी ! '
 सहमे से स्वर में दुल्हन के पिता ने 
कहा - "समधी जी और  बाकी सब …,"
दूल्हे ने बात को रोकते हुए सवाल किया - "फेरे हो गए..
आपकी बेटी की जिम्मेदारी किसकी …?" और पंडित की तरफ देखते हुए कहा - "बहुत देर हो गई.. जल्दी कीजिए । आगे भी जाना है ..भोर होने वाली है।"
पंडित जी के मंत्रोच्चार के साथ ही मानो
      पूर्व की लालिमा ने घर के आंगन में सुनहली भोर के
आगमन की दस्तक दे दी थी ।

★★★