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Tuesday, July 27, 2021

"खुशी"

             

अपना वजूद भी इस दुनिया का एक हिस्सा है उस पल को

महसूस करने की खुशी , आसमान को आंचल से बाँध

लेने का  हौंसला , आँखों में झिलमिल -झिलमिलाते  सपने

और आकंठ हर्ष आपूरित आवाज़ - “ मुझे नौकरी मिल गई है , कल join करना है वैसे कुछ दिनों में exam भी हैं…,

 पर मैं सब संभाल लूंगी।” कहते- कहते उसकी आवाज

शून्य में खो सी गई ।

 मुझे खामोश देख वो फिर चहकी - “ मुझे पता है 

आप अक्सर मुझे लेकर चिन्तित होती हो , मैंने सोचा सब

से पहले आप से खुशी बाँटू। “

           उसकी बात सुनते हुए  मैं सोच रही थी अधूरी पढ़ाई ,

गोद में बच्चा ,घर की जिम्मेदारी और ढेर सारे सामाजिक

दायित्व । ये भी नारी का एक रुप है कभी बेटी , कभी पत्नी

तो कभी जननी । हर रूप में अनथक परिश्रम करती है और

अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए अवसर की तलाश

में रहती है ।अवसर मिलते ही पल्लवित होती है अपनी  पूर्ण सम्पूर्णता के साथ।

                उसके  दमकते चेहरे और बुलन्द हौंसलों को

देखकर मुझे बेहद खुशी हुई और यकीन हो गया कि एक

दिन फिर वह निश्चित रूप सेे इस से भी बड़ी खुशी मुझसे

बाँट कर मुझे चौंका देगी ।

          

                                ***

Sunday, July 4, 2021

"महिला दिवस"

 चार-पाँच औरतें खिलखिलाती हुई होटल में लंच हॉल  में घुसी और कोने में व्यवस्थित सीटिंग व्यवस्था पर जा बैठी । शायद "रिजर्व" की तख्ती पर ध्यान देने की फुर्सत नहीं थी किसी के पास । सभी अपने अपने लुक्स पर फिदा थी और एक -दूसरे से ज्यादा सलीकेदार जताने की कोशिश में लगी थी तभी एक वेटर ने टेबल के पास आ कर अदब से सिर झुकाते हुए विनम्रता से कहा-"यह टेबल रिजर्व है मैम ,मैं आप लोगों के लिए दूसरी तरफ व्यवस्था कर देता हूँ ।"

"दूसरी तरफ क्यों ? जो नहीं आए उनके लिए भी तो व्यवस्था कर सकते हो ।" एक महिला ने रौब के साथ वेटर को लगभग झिड़कते हुए कहा ।

स्थिति की गंभीरता देख कर मैनेजर उनको दूसरी तरफ बैठाने की व्यवस्था का निर्देश देकर आगे बढ़ा

 ही था कि तीन लड़के और दो लड़कियों का समूह कंधों पर बैग लटकाए बिखरे बालों और अस्त-व्यस्त कपड़ों और लस्त-पस्त हालत में अपनी रिजर्व टेबल की ओर आगे बढ़ा । बैठने से पूर्व उनके चेहरों पर परेशानी और व्यग्रता साफ दिखाई दे रही थी ।

सीटों की अदला-बदली में कुछ पल की भिनभिनाहट जरूर हुई पर अन्तत: सब तरफ शांति थी और हल्के संगीत के साथ माहौल खुशनुमा । उधर महिलाएं दूसरी टेबल पर बैठ कर अपने

बिगड़े हुए मूड को ठीक करने के प्रयास में लगी थीं । ड्रेसस् और मेकअप के बारे में एकबारगी भूल अब उनके चर्चा का विषय टेबल पर बैठे युवक-युवतियों का समूह था । 

 "घर में यह 'शो' करेंगे बेचारों को समय ही नहीं मिलता । यहाँ क्या गुलछर्रे  उड़ रहे हैं । हम तो ऐसा सोच भी नहीं सकते थे ।" - किसी ने गहरी सांस भरते हुए कहा ।

"सच कहा तुमने आजादी तो इन्हीं के पास है । हमने तो घर-गृहस्थी की  चक्की में झोंक दिया खुद

 को ।"- दूसरी ने मानो बात पूरी की ।

"यार सेलिब्रेट करने आए हैं छोड़ो ये सब मूड मत ऑफ करो ।" उन्हीं में से एक ने विषय बदलने की कोशिश की ।

      पहली टेबल पर किसी प्रोजेक्ट की सक्सेस में आने वाली टेक्निकल प्रॉब्लम्स पर चर्चा के साथ स्टार्टरस की प्लेटें भी  साफ हो रही थी शायद भूख अपने चरम पर थी । तभी उनमें से एक लड़की ने माथे पर हाथ मारा - ओ शिट् .., मैं तो भूल गई थी । आधे घंटे में मेरी "वन ऑन वन" है । मैं जाती हूँ ,

तुम लोग लंच इंजॉय करो…,

"ठहर मैं भी चलती  हूँ ।" दूसरी ने फ्रेंच फ्राईज़ मुँह में लगभग ठूंसते हुए बैग उठाया ।

"यार इन लोगों का तो हो गया "महिला दिवस" 

बस ..,ट्रफिक ना मिले और ये पहुंच जाए टाईम 

से ।" - एक लड़के ने चिंता जताई । बाकी दो की आँखों में भी वहीं थी ।

चीयर्स !!! हैप्पी वीमन्स डे !!

 दूसरी टेबिल से ठहाका गूंजा । शायद वहाँ खाने से पूर्व ड्रिंक्स आ गईं थीं ।

पहली टेबिल पर खामोशी पसरी थी । 


***

Tuesday, June 22, 2021

संस्मरण-स्मृतियों के गवाक्ष

                   

【चित्र:-गूगल से साभार】


बूँदों की छम-छम…,उमड़ती-घुमड़ती काली घटाएँ..,भला किसे अच्छी नहीं लगती । सावन-भादौ में बारिश की झड़ी, चारों तरफ हरियाली प्रकृति का भरपूर आनन्द  रेगिस्तान में नखलिस्तान जैसे छोटे से शहर पिलानी में पल-बढ़ कर सदा ही लिया । किशोरावस्था के लगभग चार वर्ष असम में गुजरे जहाँ प्रकृति ने  खुले हाथों से अपना प्यार लुटाया है । घने वृक्षों, नदियों और वर्षा के बिना पूर्वोत्तर भारत की कल्पना ही नहीं की जा सकती। 

प्रकृति का रूखापन  पहली बार तब देखने को मिला जब मुझे बी.एड. करने राजस्थान के चुरु जिले में स्थित सरदारशहर जाना पड़ा। जैसे -जैसे पिलानी पीछे छूटती गई वैसे-वैसे हरियाली से नाता भी टूटता गया । विरल झाड़ियां , छोटे-छोटे खेजड़ी के पेड़ और दूर तक नजर आती सोने सी भूरी मिट्टी के टीले  और उन्हीं के बीच बहुत कम घरों की संख्या । सही मायनों में राजस्थान से अब परिचय हो रहा था 

मेरा । लगभग साढ़े पाँच घंटे के सफर के बाद रेत के धोरों और छिटपुट वनस्पति के बीच एक बहुत बड़े होर्डिंगनुमा गेट पर- "गाँधी विद्या मंदिर शिक्षण प्रशिक्षण संस्थान" सरदार शहर आपका स्वागत करता है।" के साथ ही आने वाले एक साल में  बहुत कुछ सीखना बाकी था । सरदार शहर अपने समयानुसार सुन्दर और सुव्यवस्थित लगा लेकिन पहली बार बरसात और वृक्षों के अभाव को एक शिद्दत के साथ महसूस भी किया । 

 बारिश के अभाव में पानी की किल्लत…,सर्दियों में शून्य तक तापमान देखने के बाद  सूखी गर्मियों की गर्म 'लू'और धूल भरी आँधियाँ देखनी अभी बाकी थी । लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियों से सामंजस्य तो बैठाना ही था ।

 मेरे लिए सब से बड़ी परेशानी पीने के पानी

 की थी । हॉस्टल में मेरे जैसी चार-पाँच लड़कियों को छोड़ कर तमाम लड़कियाँ पीने के पानी को लेकर सहज थी वही हमारे लिए वह पानी बहुत खारा था । अत्यल्प बारिश के कारण रेतीले इलाकों में वर्षा के जल को संग्रहित करने की परम्परागत प्रणाली कुंड या टांके हैं  जिनमें संग्रहित जल का मुख्य उपयोग वहाँ के निवासी पेयजल के लिए करते हैं। प्रदूषण और दुर्घटना को रोकने हेतु इस प्रकार के जल स्रोत ढक्कन सहित तालों से बंद होते हैं।  इनका  निर्माण संपूर्ण मरूभूमि में लगभग हर घर में किया जाता है, क्योंकि मरूस्थल का अधिकांश भू जल लवणीयता से ग्रस्त होने के कारण पेयरूप में काम में लेना असंभव है । अतः वर्षा के जल का संग्रहण यहाँ के निवासियों के लिए दैनिक जल आपूर्ति के लिए अनिवार्य है ।

 कपड़े धोते समय  नल अधिक देर खुला रहने 

पर सफाईकर्मी  के माथे की सलवटें और खीजभरा सुर सुन ही जाता था - "कौन सी जगह से हो ? पानी कितना बरसता है तुम्हारे गाँव में…, बहुत कुएँ-बावड़ी दिखते हैं ?" 

टोकने पर तल्ख़ी जरूर होती थी मगर खाली बैठते तो वहाँ के बाशिंदों का विषम और कर्मठ जीवन सोचने को मजबूर करता कि धरती पर प्रकृति सब जगह एक समान क्यों नहीं हैं ? और फिर याद आता कि अरावली का वृष्टि छाया प्रदेश होने के कारण  अरब सागर व बंगाल की खाड़ी का

 मानसून  थार प्रदेश में बहुत कम वर्षा करता है। 

आजकल बैंगलोर में रहते हुए प्रायः रोज

 बादलों को घिरते और बरसते देख रही हूँ । घनी हरियाली को सिमटते और आवासीय परिसरों में बदलते देख रही हूँ वर्ष भर सुबह-शाम की ठंडक को कम होते और स्वेटर,शॉल,जैकेट्स को आलमारियों में सिमटते देख रही हूँ । 

दिन प्रतिदिन हम अपनी चादर से अधिक पैर पसार कर शहरी विकास और भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए जंगलों और पर्वतीय क्षेत्रों का कटाव कर उन्हें समेटते जा रहे हैं।  मैं थार प्रदेश जैसी विषमताओं के बारे में सोचने से बचना चाहती हूँ । कहते हैं अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता मगर महान पर्यावरणविद सुन्दरलाल बहुगुणा जैसी विभूतियों का समूह अपने देश के हर प्रान्त में देखना चाहती हूँ।


***



     

 














 

  



Saturday, May 29, 2021

"सोचा न था"

कैसे दमघोटू से दिन हैं । न बूंदों की छम-छम में हथेली पसार

कर हाथ भिगोने को मन करता है और न ही खिड़की से बाहर

बारिश की बूंदों को देखते हुए कोई किताब पढ़ने का । संगीत के

सुर भी अब  मन को अपनी और नहीं खींचते । कितनी ही बार

चाहा कुछ पढ़ना मगर रिक्त से बोझिल और उदास से वजूद

 पर एक डर है जो लिपटा है चादर सा ।

 'हैरीपॉटर'सीरीज  में जिक्र है दमपिशाचों का । जो बुरे जादूगरों

के सहयोगी हैं । जब ये आते हैं तो हर तरफ नकारात्मकता

की चादर फैल जाती है जादूगरों के समुदाय में । जितना

शक्तिशाली दमपिशाच उतना ही भय और नुकसान सीधे

सरल जादूगर समाज को । हर जादूगर के पास एक जादुई

छड़ी और कुछ मंत्र जो उनके गुणों  पर आधारित होते हैं जिनका 

प्रयोग वे शक्ति सामर्थ्य  के अनुसार करके दमपिशाचों से

निजात पाते हैं ।

सोचती हूँ कुछ कुछ वैसा ही दमपिशाच  है 

कोरोना वायरस भी । जो पिछले वर्ष के मार्च से अब तक  न

जाने कितनी ही जिन्दगियों को लील गया और अब भी उसका कहर जारी है । आरंभिक दिनों में मेरी सोच थी कि इक्कीसवीं सदी है

ये...अब साईंस ने बहुत उन्नति कर रखी है । महामारी है तो

खतरनाक लेकिन आज हम प्राचीन चिकित्सा पद्धति के भी बहुत

करीब हैं और मेडिकल व्यवस्थाएँ भी अति उन्नत हैं अतः  कोरोना महामारी पर नियंत्रण भी जल्दी  ही हो जाएगा । तब यह अहसास

भी नहीं था इस अज्ञातशत्रु के आगे सब बौने साबित हो जाएँगे ।

लगभग सवा साल के बाद भी कोरोना की स्थिति की

भयावहता जस की तस है ।

  खाली सा मन नकारात्मकता में उलझता जा रहा है ।  खुले

आसमान के नीचे प्रकृति को महसूस करना जैसे जागती

आँखों का सपना हो गया  मेरे जैसे लोगों के लिए जो पहले

से ही ढेर सारी बीमारियां पाले बैठे हैं ।

कभी दो हाथ की दूरी…, कभी छ: हाथ की दूरी..,एक मास्क…,

डबल मास्क.., हाथ धोते-धोते, सैनेटाइजर स्प्रे करते और नई

समस्याओं को न्योता दे रहे हैं हम । वैक्सीनेशन राहत की बात है

मगर ब्लड क्लोटिंग जैसे साइड इफेक्ट में उन लोगों का क्या जो

पहले से ही इस तरह की जेनेटिक बीमारियों से जूझ रहें हैं ।

पहले एक विश्वास था  बरगद की जड़ जैसा…,डॉक्टर ईश्वर तुल्य 

हैं ।और दक्ष आर्युवेदाचार्य हो तो संजीवनी आज भी विद्यमान है ।

उस विश्वास की जड न चाहते हुए भी अब  हिल रही है ।

जीवन को भरपूर जीने की चाह रखने वाला मन और कल्पनाओं

के कैनवास पर अक्षरों के रंग उकेर कर मनचाहा आकार देने

वाली सोच  कभी इतनी  मूक और बेबस हो जाएगी..

…, सोचा न था।

   

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Monday, May 10, 2021

"कब बोलोगी"【कहानी】

 बहुत दिनों बाद अपने  गाँव जाना हुआ तो पाया कि शान्त‎ सा कस्बा अब छोटे से शहर में तब्दील हो गया और बस्ती‎
 के चारों तरफ बिखरे खेत -खलिहान सुनियोजित बंगलों 
और कोठियों के साथ-साथ शॉपिंग सेन्टरों में बदल गए हैं।  जिन्हें देख शहरों वाले कंकरीट और पत्थरों के जंगलों 
का सा अहसास हुआ मगर अन्दर की और जाते ही लगा
 कुछ भी तो नही बदला है। वक्त के साथ पुरानी गलियाँ,
 घर और हवेलियाँ सब बूढ़े हो गए थे ।
        घर के सभी‎ सदस्यों‎ से मिल कर  कुछ उनकी सुन
 कर‎ तो कुछ अपनी सुना कर  अड़ोस-पड़ौस का हाल 
जानना तो बनता ही था। ऐसे मे उसके बारे में….,जो अजनबीयत की चादर में लिपटी अपने तल्ख स्वभाव के कारण जानी जाती थी……,  ना जानती ऐसा संभव ही
 नही था  सो फुर्सत मिलते ही चल दी उस से मिलने।
 सुना है वह आज भी दो चौक की पुराने जमाने की  उसी
 दो मंजिली हवेली में अकेली ही रहती है।  उसे देख कर
 लगा जैसे  पुरानी हवेलियाँ सर्दी, गर्मी‎ और बारिश झेलते- झेलते मटमैली हो जाती हैं वैसे ही उम्र ने उसके व्यक्तित्व 
में  भी शिकन डाल थका सा बना दिया हैं कुछ बोलते से 
चेहरे के साथ व्यग्र सी आँखें‎  मुझे देख कर मुस्कुरा 
भर दी---- “कैसी हो? कब आई?”  जैसे दो जुमले मेरी
 तरफ‎ उछाल कर हवेली को ताला लगा कर वह चल दी 
शायद थोड़ा जल्दी‎ में थी। एकबारगी उसका व्यवहार‎ 
अजीब‎ लगा लेकिन पुरानी बातें याद कर मन की
 शिकायत जाती रही।

                     स्वभाव से रुखी और मूडी….,बहुत कम लम्बाई के कारण बच्चों  की भीड़ में खो जाने वाली वह प्रतिमा सुशिक्षित और घरेलू‎ कार्यों में दक्ष महिला थी। छुट्टी‎ वाले दिन हवेली से बाहर तीन- चार चक्कर‎ लगाना उसकी दिनचर्या का अविभाज्य हिस्सा‎ था। जरुरत पड़ने पर कभी‎ किसी अचार की विधि तो कभी‎ आयुर्वेदिक दवाई के बारे जानकारी‎ के लिए‎ उसके पास जाती कस्बे की औरतें 
उसकी पीठ‎ पीछे खीसें निपोरती उसकी जन्म‎ कुण्डली 
खोल कर बैठ जाती…., कभी‎ चर्चा‎ का विषय उसकी
 शादी होना तो कभी‎ कुँआरी होना होता। शुरू‎आत में मुझे लगा कि ये कथा‎-कहानियां जिस दिन उसको पता चल जायेगी  वह बखिया उधेड़ देगी सब की लेकिन बाद में
 एक दिन स्वेटर का डिजायन पूछने के सिलसिले में बात 
होने पर पता चला कि उसे सब बातों का पता है। मेरे पूछ‎ने
 पर कि--”आप कहाँ से हैं?” उसने वापस मुझी पर सवाल‎ दाग दिया ----”क्यों पता नही है ? सब तो बातें करते हैं, मैं कौन हूँ‎ , कहाँ से हूँ‎।”  उसके प्रश्नों से बौखला कर मैंने 
जवाब दिया---”नही जानती कुछ भी,कोई बात नही 
करता आपके बारे में…., कम से कम मैंने तो नही सुनी।” 
यह कह कर उसको  शान्त‎ कराना चाहा मगर मुझे ऊन के धागों और सिलाईयों के पीछे उलझे चेहरे की  उलझन 
और बैचेनी साफ दिखाई‎ दे रही थी।
                    जहाँ तक मैं‎ उसके बारे में‎ जानती थी‎ वो 
यही था कि अपने दूर के रिश्तेदार की हवेली में रहती है 
और पास ही कहीं ग्रामीण‎ शाखा‎ बैंक में नौकरी करती है । हवेली के मालिक‎ पूर्वोतर भारत के किसी शहर में‎ रहते हैं, हवेली की देखभाल‎ पुश्तैनी नौकर के भरोसे थी लेकिन ‎
किसी संबंधी के हाथों‎ जायदाद की देखरेख हो इससे बढ़िया और क्या हो सकता है सो सहर्ष हवेली के दो कमरे उसके लिए खोल  दिए‎। कुछ‎ ही महिनों में ही उसके कड़े और 
शक्की व्यवहार‎ से तंग आ कर नौकर ने मालिकों से  कार्य‎ करने में असमर्थता जता कर  मुक्ति‎ पाई‎ और परिवार
 सहित अपने गाँव‎ की शरण ली। उसके बाद यह हवेली 
की केयर-टेकर पदस्थापित हुई। पूरे घटना‎क्रम का पता
 चलने पर मुझे लगा था कैसे रहेगी वह इतनी बड़ी हवेली 
में‎ अकेली। दोपहर में उस गली से गुजरो तो डर लगता है, 
पूरी गली सूनी और उस पर चार-पाँच खण्डहरनुमा हवेलियाँ जो “बीस साल बाद” फिल्म के रहस्यमयी वातावरण‎ की 
याद दिलाती है। लेकिन‎ वह जमी रही लगभग दस वर्षों
‎ तक देखा उसे यूं ही अकेले‎ रहते और काम पर जाते, 
माता-पिता, भाई-बहन…,किसी को भी कभी‎ आते रहते 
नही। कभी कभी‎ बड़ी सी V.I.P सूटकेस उठाये बस-स्टैण्ड 
की तरफ‎ जाती मिलती तो मैं समझ‎ जाती अपने घर जा 
रही है। मुझे ना जाने क्यों उसके रुखे और कड़वे स्वभाव 
का कारण उसका अकेलापन लगा अन्यथा वह पढ़ी लिखी स्वावलम्बी महिला‎ थी जो अपनी मान्यता‎ओं और वर्जनाओं के साथ जीने की आदी थी । अपने सन्दर्भ‎ में मौन और
 निकट संबंधियों से दूर मानो सारी दुनिया‎ से नाराज। 
 जब भी मैं उससे मिलती एक “हैलो” का जुमला मेरी और उछाल वह कुशलक्षेम पूछती मगर जैसे ही मैं आत्मीयता जताने आगे बढ़ती वह अनजान बन व्यस्त‎ होने का बहाना जता आगे बढ़ जाती ।
           
     अपने घर की तरफ‎ जाते मैं सोच रही  थी ---हफ्ते भर हूँ यहाँ , किसी दिन उसके मन की थाह लूं ; उसे कहूँ ---’मानव जीवन अनमोल है और बहुत सारे  उद्देश्य है जीवन के…., 
नष्ट‎ होने के बाद कुछ भी तो शेष नही। मौन क्यों हो ? 
चुप्पी की चादर उतार फेंको। कुछ‎ तो बोलो....., 
"कब बोलोगी।"
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Thursday, April 8, 2021

एक-दो दिन...

दोपहर में घर के  कामों में उलझी थी वीणा कि मोबाइल

की रिंग ने ध्यान अपनी ओर खींच

 लिया । जैसे ही कॉल अटैंड की उधर से बिना सम्बोधन के

परिचित सी साधिकार आवाज

 आई--'कब आओगी.. दस बरस के साथ को 

बस ऐसे ही भुला दिया ? पाँच बरस हो गए तुम्हें देखे.. कल

सपने में दिखी थी तुम..कभी मिलने

   को मन नहीं करता ?'

उस लरजती आवाज से वीणा के मन का कोई 

कोना भीग सा गया और भरे गले से कहा --'आऊँगी

ना..मन मेरा भी करता है । आप सब तो व्यस्त रहते

हो..आऊँगी जल्दी ही.. वक्त निकाल कर ।' 

  'पक्का ना .., बहाना नहीं । मैं छुट्टी ले लूंगी एक-दो

दिन की ।' उधर से व्यस्त सी आवाज आई । वीणा ने

भावनाओं के बाँध पर हँसी का मजबूत पुल बाँधते हुए

पूछा - "सिर्फ एक-दो दिन ?" 

'फिर ऐसा करो कोई लम्बा वीकेंड देख लो' - उधर से व्यस्त

भाव से कहा गया और इधर-उधर की कुशल-क्षेम पूछने

के बाद जल्दी  मिलने के वादे की औपचारिकता के

साथ विदा हुई।  वीणा फोन टेबल पर रखते

 हुए सोच रही थी - "लगभग 1800 किमी की दूरी ,

दस बरस का नेह और पाँच बरस के बिछोह के हिस्से में

केवल एक- दो दिन...।"


***

Wednesday, March 24, 2021

'गलती'

बारिश में स्कूल से घरों की तरफ लौटती छात्राओं की भीड़ में वे दोनों भी हाथों में जूते लटकाए मस्ती से सड़क पर पानी में

छप-छप करती चली जा रही थीं । खुश थी दोनों.., उनके पास सीमित किताबें और एक-दो कॉपियाँ पॉलीथिन के

 अंदर पैक्ड थीं वे नहीं भीगेंगी यही सोच कर । अचानक एक

ने टूटी दीवार वाले घर के आंगन से जीर्ण कमरों की तरफ देखते हुए  कहा

- 'अब बारिश रुक जानी चाहिए ।'

    -  'क्यों तुझे अच्छा नहीं लग रहा..,बारिश में भीगना और रेनी-डेज़ इंजॉय करना।'  मुस्कुराते

 हुए पैरों से पानी उछालते हुए दूसरी ने कहा ।

-'अगर बारिश नहीं रूकी तो बाढ़ आ जाएगी । देख! घर गिरने

शुरू हो रहे हैं ।' पहली ने चिंतापूर्ण स्वर में जवाब दिया।

-'वाह! मजा आ जाएगा तब तो ।" अपनी ही झोंक में पानी के गढ्ढे में छपाक से कूदते हुए दूसरी बोली ।

- 'बेवकूफ! किसी के घर टूटेंगे तो तुझे खुशी होगी।' पहली का गुस्सा सातवें आसमान पर था ।

- 'हमारी हवेली भी गिर जाएगी तो  नया घर बनेगा वहाँ और

हवेली तोड़ने का खर्च भी बचेगा।' दूसरी ने मानो समझदारी दिखाई ।

- 'अपनी खुशी के लिए कितनों को कितना दुख पहुँचाएगी ! आज से तेरी-मेरी कुट्टी ।'

  पहली दुख मिश्रित गुस्से से बोल कर नाराजगी भरे तेज -तेज कदमों से अपने घर की ओर चल दी । 

हैरान परेशान दूसरी पीठ पर भीगते बैग और दोनों हाथों में जूते थामे अपनी प्रिय दोस्त को  जाते देख सोच रही थी कि उसकी गलती कहाँ पर थी ।


***