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Saturday, February 5, 2022

"बसंत पंचमी"

       


“मॉम ! आज बसंत पंचमी है । एक श्लोक  याद करवा दो

 प्लीज़ ! और वो पीली वाली ड्रेस कहाँ रखी है ।अब की

 बार भी पिछले साल की तरह ही स्कूल में ऑनलाइन

 सेलेब्रेशन है।”

    “मुझे भी ड्यूटी पर जल्दी पहुँचना है ।तुम्हे जो भी चाहिए जल्दी करो ..,चलो मेरे साथ-साथ बोलो - या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता…..,  पारूल काम करते करते आहना

 को श्लोक याद कराने लगी। 

“पारो ! प्लीज़ पीले वाले मीठे चावल जरुर बना कर जाना !” शेखर ने लैपटॉप पर नजर गड़ाए हुए पारुल से कहा ।

मेड के न आने से चक्करघिन्नी बनी पारुल की स्मृतियों के गवाक्ष धीरे-धीरे खुलने लगे  और खिड़की पर झूलती एक नन्ही लड़की उसकी आंखों के आगे साकार हो उठी - “आपका नाम शारदा क्यों है माँ ?” 

-“मैं बसंत पंचमी को जन्मी थी , तेरे नाना-नानी ने दिया मुझे 

यह नाम ।” चूल्हे पर रोटी सेंकती माँ ने गीली लकड़ियों के धुंए से

लाल आँखों से बेटी को देखते हुए कहा , उनके चेहरे पर मुस्कराहट थी ।

    “वाह ! कल आपका जन्मदिन सभी स्कूल मनायेंगे सरस्वती मंदिर के आंगन में..।” झूमती हुई पारूल बोली ।

         “अब की बार तेरे नंबर पिछले साल से कम हैं ।अगर ऐसे ही  कम नंबर लाएगी तो बन गई डॉक्टर ।पापा से जोर डाल न कह सकूंगी तेरे को बहुत पढ़ना है । तेरी दादी जी तैयार बैठी हैं दसवीं के बाद शादी के लिए ।” माँ ने मानो हिदायत दी ।

         “सॉरी माँ ! नौंवीं कक्षा के अर्द्धवार्षिक परीक्षा के प्रगतिपत्र को माँ के हाथ से लेती पारूल की नजरें झुकी थी ।

    काम खत्म करती हुई पारूल ने घड़ी की तरफ देखा साढ़े नौ बज गए थे , आहना अपने लैपटॉप के सामने थी । शेखर की मीटिंग भी स्टार्ट हो गई थी शायद ।

तैयार होती पारूल का मन फिर भटकने लगा…, माँ नहीं रही उसकी डिग्री कम्प्लीट होती देखने के लिए । टेबल से गाड़ी की चाबी और स्टेथोस्कोप उठाते हुए शेखर को गेट बंद करने का इशारा करते समय उसका दिलोदिमाग माँ के साथ सरस्वती मन्दिर के प्रांगण में विचरण कर रहा था -

“या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता,

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।”


                        ***

   

Wednesday, January 19, 2022

“दोराहा"


वसुंधरा की रसोई की खिड़की मन्दिर के एक बड़े से खेजड़ी 

के पेड़ के पास खुलती है जहाँ बैठ कर पिछले कुछ दिनों से पड़ोस की महिलाएं भजन कीर्तन करती हैं । 

                आज वह लेट थी जल्दी जल्दी काम समेट कर बाहर निकली तो सामने से फूल, अगरबत्ती और पानी से भरे कलश को थामे आती एक महिला से टकरा गई । 

            “ओह ! आज देर हो गई…,आप आ गई काम पर जाने के लिए।” उनके स्वर में बैचेनी भरी थी लेकिन कदम ऑटो की प्रतीक्षा में खड़ी वसुंधरा को देख कर थम गए । वसुंधरा को पहली बार समझ में आया कि वह भी किसी के लिए घड़ी का सा काम 

करती है ।

     “आप बीमार रहती हैं चाची ! आराम किया करें ना क्यों भागती हैं सुबह-सुबह ।” वह सामने से आते ऑटो को देखते हुए व्यस्त 

भाव बोली ।

     “भगवान का नाम लेने के साथ-साथ इन सबके चर्चा-पुराण से अपने घर-परिवार को सुरक्षित रखने के लिए वसु ! कम से कम इन्सान सामने हो तो कोई मुँह पर बुराई तो नहीं करता।” साड़ी के पल्लू से माथे का पसीना पोंछते हुए वे थोड़ी सी व्यग्रता से बोली ।

              “लेकिन आज की चर्चा तो हो गई चाची !” कहती हुई वसुंधरा उन्हें दोराहे पर खड़ा छोड़ ऑटो की ओर बढ़ गई ।

                                    ***

                       [चित्र :- गूगल से साभार]



Monday, January 3, 2022

"सर्कस"

   अपने अध्यापन कार्य​ से जुड़ते ही मैंने एक लेख पढ़ाया था “सर्कस​ का खेमा” लेखक का नाम भूल गयी हूँ लेकिन विषयवस्तु की शुरुआत आज भी अच्छी तरह से याद है 

लेखक कुछ लिख​ रहा था और दूर कहीं से आती सर्कस के खेमे की आवाजों और रंग बिरंगी रोशनियों ने उस का ध्यान भटका दिया था। अपने पहले कार्य को भूल कर लेखक ने सर्कस की आन-बान​ और शान का वर्णन करते हुए उसकी वर्तमान उपेक्षा और दुर्दशा का मार्मिक​ वर्णन किया था।

उस लेख को पढ़ते ही मुझे किशोरवय की सर्कस से जुड़ी

एक घटना याद हो आयी। 

         बरसों बाद अपने जन्म स्थान लौटने पर मेरी सहेलियों ने बड़ी गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया । एक दिन सीरी रोड की तरफ जाते हुए मुझे अपनी सहेलियों की सर्कस को लेकर चहक जैसे  उन्हीं की दुनिया में ले गई – “इस जगह लगा था पंडाल, यहाँ स्कूटर के साथ फोटो खिंचवायी थी हमने और सुन…, बहुत सुन्दर सुन्दर लड़कियाँ थी सर्कस में मगर उनकी आँखों का खोयापन कुछ और ही कहानी कह​ रहा था। उस समय की कुछ सामाजिक​ वर्जनायें थी लड़कियाँ कहाँ बोल पाती थी आज की तरह।“मैंने तीन बार देखा एक बार​ माँ के साथ, दूसरी बार स्कूल से और तीसरी बार भुआ आयीं थीं उनके साथ। पागल है तू! थोड़े दिन​ पहले आ जाती ।” - जान्हवी ने अपना ज्ञान बघारते हुए कहा।वह अब भी सर्कस की दुनिया में ही खोयी थी । बरसों बाद मिली थीं हम मगर मेरे बारे मे सोचने की फ़ुर्सत ही कहाँ थी सबके पास। बरसों की मेरी अनुपस्थिति में क्या क्या खोया मैंने इसी तथ्य को बताना जरूरी था सबके लिए । वक्त के साथ सब कुछ समाता गया अतीत के गर्भ में …,मगर मैं कभी नहीं भूल पायी उस जगह को जहाँ खड़े होकर उन सबने  सर्कस के बारे में बातें की थी | उस जगह को जब भी देखा मेरा मन हमेशा उस काल्पनिक संसार मे जा पहुँचा भले ही मैंने वह संसार न देखा हो।

                शिक्षण कार्य से जुड़ने के बाद “सर्कस का खेमा” पढ़ाने का अवसर मिला तो पाठ पढ़ाते समय शायद मैं अपनी छात्राओं को भी उसी काल्पनिक संसार में ले गयी। पाठ की समाप्ति पर कक्षा में एक प्रश्न उछला- “आपने सर्कस 

देखा है ?” और मैंने जवाब दिया था -  “नही, मगर अवसर मिला तो देखूंगी ज​रूर।”

             और अवसर भी मिला कुछ वर्ष बाद​ जब​ मैं अपने भाई के यहाँ महाराष्ट्र के एक शहर​ में थी तब । एक दिन स्कूल से आते ही भतीजी ने चिल्लाते हुए कहा – “सर्कस आया है हमारे स्कूल के पास। बहुत​ सारे लोग परदे लगा रहे थे। हम भी चलेंगे देखने ।” दूसरे दिन​ उनकी मेड ने आते ही कहा-“भाभी पंडाल बाँध रहे थे वो लोग, कल से "शो" चालू होगा।” मुझे लगा सर्कस के लिए चहक तो आज भी बाकी है कल मेरी सहेलियों में थी आज अमिता में है। दूसरे दिन मैं और भाई के दोनों बच्चे एक साथ चिल्लाये -"हमें सर्कस देखना है। भाई ने आश्चर्य के साथ कहा- “दी आप देखोगी ? मेरा मन बचपन के आंगन मे विचरण कर​ रहा था जिद्द थी भुआ और बच्चों की। हमें  देखना ही है।पहले दिन और वह भी 

पहला “शो”।

          आखिर कार भाई को मानना पड़ा। खेमे मे घुसते ही गाड़ी, मोटरसाईकिल, स्कूटरों की कतारें देख कर मन जैसे झूम उठा। पंडाल का मुख्य “प्रवेशद्वार" भव्य दिख र​हा था। नीचे मैरुन रंग की दरियाँ चारों तर​फ दीवारों का आभास देते पर्दें, शनील से मंढ़ी कुर्सियाँ जहाँ वातावरण को राजसी रुप​ प्रदान कर रहे थे वहीं बड़े-बड़े पोस्टर आकर्षण का मुख्य केन्द्र​ बने हुए थे। उन में प्रदर्शित प्राणों को जोखिम में डालते युवक- युवतियों के साथ हाथियों, शेरों व पक्षियों के अद्भुत करतबों की तस्वीरें जैसे सर्कस के विषय को अनूठे ढंग से पेश कर रही थी | यह सब देखकर जैसे मैं मन्त्रमुग्ध हो उठी और तभी लाडली भतीजी ने हाथ खींचा – “भुआ अन्दर चलो” उसकी आवाज सुनकर मैं उस स्वप्निल कल्पनालोक से बाहर निकली।

          मुख्य मंच जहाँ करतब दिखाए जाने वाले थे वहाँ असंख्य कुर्सियाँ और​ सीढ़ीनुमा तख्ते बड़े करीने से लगे थे। बीचों -बीच विशाल तम्बू जिसमें ऊँचाई पर रस्सों के सहारे बंधे झूले, गोल आकार का बड़ा सा जाल, आर्केस्ट्रा पर बजती "मेरा नाम जोकर" की धुन जिस ने पूरे वातावरण को सर्कस​मय बना रखा था लेकिन पूरे पंडाल में मुश्किल से सौ- डेढ़ सौ आदमी। मैं सोचने को मजबूर हुई कि इतनी मेहनत और तैयारी आखिर किस लिए? "शो" शुरु हुआ- रस्सियों और झूलों पर कलाबाजियाँ खाते शरीर, काँच की शीशियों और काँच की पट्टियों पर व्यायाम​ का प्रदर्शन करते हुए एकाग्रता का उदाहरण पेश करते युवा चेहरे। आग के साथ खतरनाक करतब दिखाते जाँबाज, सुन्दर कन्याओं के इशारों पर दाँतों तले अगुँली दबाने के लिए मजबूर करने वाले पक्षियों के करतब​, हाथी की सूण्ड के सहारे खतरनाक खेल पेश करती परी सी सुन्दर कन्या, सत्यम् शिवम् सुन्दरम् की धुन पर भगवान शिव की आरती करते हाथी सभी कुछ तो संगीत की मधुर धुनों के साथ आलौकिक और अद्भुत था | समय कैसे पंख लगा कर बीता मुझे पता ही नही चला। "शो" की समाप्ति पर मैंने आधी से अधिक खाली पड़ी पंडाल की कुर्सियों को भारी मन से देखा और बाहर​ निकलते हुए भाई के स्वर को सुना जो झल्लाते हुए  कह रहा था कितने मच्छर खा गए। भतीजी का जोश ठण्डा पड़ गया था-"पापा इस से अच्छा था हम मूवी देख आते।“ उनकी बातें सुनकर मुझे फिर याद आया " सर्कस​ का खेमा" जो कभी मैंने पढ़ाया था।

                        घर की तरफ लौटते हुए मैं सोच रही थी की सचमुच दयनीय दशा हो गयी है इस कला की। जिस तरह शानो शौकत और भव्य रूप​ में इस कला को कलाकार मंचित करते हैं उसका प्रतिदान उन्हे मिल ही नहीं पाता ।लोगों का रूझान हमारी इस पुरातन कला से हट गया है। मनोरंजन की दुनिया के इस खेल से कितने प्राणी जुड़े हैं जो इस कला को जीवित रखने के लिए अथक प्रयास करते हैं मगर आज की भागती पीढ़ी की भौतिकवादी संस्कृति में इन सब​ बातों का अर्थ कहाँ? चंद लोग आज भी इस कला से जुड़े है और अपनी रोजी-रोटी के लिए इसे अपनाये हुए हैं मगर अब यह कला लगभग नष्टप्राय: है । जरुरत है इसे पुन: पोषित और संवर्धित करने की ।


                                          ***

Friday, December 24, 2021

"कड़वा सच"

“मुझे नहीं रहना व्यवहारिकता के साथ..,इस के साथ मुझे अच्छी वाइब्स नही आती।” - स्वाभिमान कुनमुनाया ।

“तुम्हारी उच्छृंखलता पर अंकुश लगाने के लिए बहुत जरूरी है तुम्हारा इसके साथ होना…, इसके साथ रह कर कुछ सीखो।” आवेश में परम्परा चीखी ।

“मेरा दम घुटता है इसके साथ ।” स्वाभिमान बहस के

 मूड में था।

“याद रखो ! बिना व्यवहारिकता के तुम्हारा अस्तित्व शून्य है।”दहाड़ते हुए परम्परा ने कहा और आवेश में एक झन्नाटेदार थप्पड़ स्वाभिमान के चेहरे पर जड़ दिया ।

“तुम्हारी इन्हीं हरकतों से नैतिकता पहले ही घर छोड़ चुकी

है…,यही हाल रहा तो एक दिन इसको भी खो दोगी ।”

लड़खड़ा कर गिरते स्वाभिमान को संभालते हुए चेतना ने 

गंभीरता से कहा ।

इस कड़वे सच को सुन व्यवहारिकता इतरा रही थी और परम्परा 

के झुके माथे पर चिन्ता भरी सिकुड़न थी ।


***




Monday, November 8, 2021

"स्वभाव"

कुछ किस्से , कहानियाँ  और बातें कालजयी होती हैं और वे हर generation के साथ परिस्थितियों के अनुसार सटीक बैठती हैं । अक्सर सुना है generation gap के कारण बहुत सारी चीजें बदल.जाया करती हैं जैसे फैशन और विचार , सोचने -समझने की पद्धति । कई बार भारी परिवर्तन के कारण सांस्कृतिक परिवर्तन भी दिखाई देते हैं मगर संस्कृति की अपनी विशेषता है यह  नए बदलावों  को आत्मसात करती निरन्तर गतिमान रहती है । बेहतर बातें 
कालजयी और सामयिक बातें समय के साथ समाप्त हो जाती हैं ।
                आज मैं एक छोटी सी कहानी आप सब से साझा 
करना चाहूँगी जिसकी ‘सीख‘ मेरे मन को बहुत बार कठिन परिस्थितियों मे भटकने से रोकती है ।
                         एक व्यक्ति प्रतिदिन प्रातःकाल नदी में स्नान करने जाता था एक दिन उसने देखा , एक बिच्छू नदी के जल में डूब रहा है । उस व्यक्ति ने तुरन्त बिच्छू को बचाने के लिए अपनी हथेली उसके नीचे कर दी और बिच्छू को किनारे पर छोड़ने के लिए जैसे ही हथेली को ऊपर किया हथेली की सतह पर उसने डंक मार दिया ।दर्द से तड़प कर व्यक्ति ने जैसे ही हाथ झटका कि बिच्छू पुनः पानी में डुबकी खा गया । उस आदमी ने अपने दर्द को भूलकर अब की बार दूसरे हाथ से उसे बचाने का प्रयास जारी रखा । एक भला मानस 
नदी किनारे बैठा सम्पूर्ण घटनाक्रम को देख रहा था उस से 
रहा नही गया ,वह बोला - “मूर्ख इन्सान ! एक बार के डंक से 
जी नही भरा कि दूसरा हाथ आगे कर दिया ।"
                                   डूबते -उतराते बिच्छू से दूसरी हथेली में डंक खाने के बाद उसको निकालने के लिए प्रयास करते आदमी ने मासूमियत से उत्तर दिया -  “जब यह संकट की घड़ी  में अपने स्वभाव और गुण को नही भूल पा रहा तो मैं इन्सान होकर अपने गुण और स्वभाव का परित्याग कैसे करुं।"

Tuesday, October 19, 2021

"डर"

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पाँच साल पहले डोनट में चॉकलेट के साथ लगा कुछ क्रंची सा ..शायद ड्राइफ्रूट का कोई टुकड़ा उसके दाँत में घुसता चला गया और बाइट के साथ तारीफ करने की जगह मुँह इरीटेशन के 

कारण खुला रह गया । हैल्थ प्रॉब्लम्स के चलते 

हॉस्पिटलस् के आजू-बाजू जिन्दगी गुजारने के बाद भी पता नहीं क्यों वह डेंटिस्ट के पास जाने से डरती है शायद माँ याद

आ जाती है और उस याद के साथ ही उसकी सारी बहादुरी 

भी उड़न छू हो जाती है । सो होम रेमीडिज़ ढूंढ़ी गई - क्लोव,

हींग, काली मिर्च और भी न जाने क्या-क्या.., हार कर 

नये शहर में डेंटिस्ट ढूंढा गया । एक्सरे के बाद राय मिली 

इसका 'रूट ट्रीटमेंट' सही रहेगा , कैविटी नसों तक पहुँच गई । डेंटिस्ट के यहां फ्लॉसिंग के बाद दर्द ठीक हो गया  तो  खुद की समझदारी ने  सिर उठा लिया - 'फ्लॉसिंग किट ढूंढी गई 

दिन में दो बार ब्रश करते तो हैं ..,अब फ्लॉसिंग भी किया 

करेंगे । अब अपने आप को इतना समझदार समझने में बुराई 

भी क्या है ?

 पाँच साल बाद…, वही डॉक्टर.., वही बैंगलुरू का इंदिरा नगर 

और वही वह …, बुखार और दर्द साथ लिए ।

 ऑन लाइन वीडियो कान्फ्रेंसिंग से बात बनती न देख फाइनली क्लीनिक की शरण लेनी पड़ी । तीन-चार घंटे में कभी ये डॉक्टर कभी वो डॉक्टर..ढेर सारे टेस्ट और चार-पाँच सीटिंगस् 

का फैसला ।

पुरानी जगह को देख पुराना डर उसके सामने  मुँह खोले खड़ा था जिस से डर कर  उसने वैसे ही आँखें बंद कर रखी थी जैसे कबूतर बिल्ली को देख कर कर लेता है । 

***


Thursday, September 23, 2021

"अन्तराल"

                          

【चित्र:-गूगल से साभार】


"कोई ढंग की थैली नहीं है तुम्हारे पास ? सामान ढंग से

नहीं डाल सकते ।" तेज और कठोर आवाज में स्नेहा ने तमतमाते हुए सामान पैक करते दुकान वाले  को कहा ।

आस-पास आते जाते लोग और  दुकानदार को देख कर

ऋतु को बड़ा अजीब लगा उसने धीरे से स्नेहा का हाथ दबाते हुए कहा - "शांत बालिके ! क्यों गुस्सा कर रही हो ? देखो

जरा माँ की तरफ कैसे मुँह उतर गया है उनका ।" स्नेहा के साथ वह भी उन्हें चाची की जगह माँ ही कहने लगी थी ।

उसने उचटती सी दृष्टि ऑटो में बैठी माँ पर डाली और पुनः लिस्ट के सामान की खरीददारी में उलझ गई और ऋतु

उलझ गई पाँच बरस पूर्व के वक्त में…., जब स्नेहा का

स्वभाव बहुत मृदुल हुआ करता था ।

                    "दीदी ! यह साड़ी कैसी लगी ?"- गुलाबी रंग

की खूबसूरत सी साड़ी को उसके सामने फहराते हुए स्नेहा

का चेहरा दमक रहा था ।

"बहुत खूबसूरत.., ब्लाउज़ पीस तो एकदम यूनिक है ।"-  ऋतु ने उसकी खुशी में शामिल होते हुए कहा ।

   "फिर ठीक है आज ही उद्घाटन करते हैं ।"  -साड़ी समेटती हुई वह बगल वाले घर में घुस गई ।

"कैसी लग रही हूँ मैं ?"-  खनकती मिठास भरी आवाज़ में लम्बा सा सुर खींचती हुई अप्सरा सी स्नेहा  शाम को खड़ी मुस्कुरा रही थी ऋतु के आगे । और वह ठगी सी देखती रह गयी उसको।

              "न तीज न त्यौहार…,इसको तो बस सजने संवरने

के बहाने चाहिए होते हैं और एक तुम.., बहुत सुन्दर, बहुत सुन्दर कह चने के झाड़ पर चढ़ा देती हो इसे ।" - छत से

कपड़े उतारती उसकी माँ ने आंगन में झांकते हुए  कहा।

               "कहाँ खो गई दीदी अब चलो भी !" उसकी तन्द्रा

भंग करते हुए स्नेहा ने कुछ पैकेट ऋतु को भी पकड़ा दिये । ऑटो में  बैठते हुए माँ की दुख में डूबी आवाज़ कानों में

पड़ी  - "लड़की कैसी नीम सी खारी हो गई है तू !" स्नेहा की थोड़ी देर पहले की तल्ख़ी याद करते हुए ऋतु ने माँ को समझाते हुए कहा -"नीम भी बुरा नहीं होता माँ.., आजकल

तो उसकी गुणवत्ता सभी मानते हैं ।"

ऑटो चल पड़ा स्नेहा  माँ को जवाब दिये बिना निर्लिप्त भाव से सामान की लिस्ट पर पैसों का हिसाब लगाने में लग गई

और माँ न जाने किस सोच में डूबी हुई ऑटो से बाहर देख

रही थी। ऋतु  उस खामोशी में स्नेहा के मृदुलता से खारेपन

के सफर का अन्तराल नापने का प्रयास कर रही थी।