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Monday, November 8, 2021
"स्वभाव"
Tuesday, October 19, 2021
"डर"
पाँच साल पहले डोनट में चॉकलेट के साथ लगा कुछ क्रंची सा ..शायद ड्राइफ्रूट का कोई टुकड़ा उसके दाँत में घुसता चला गया और बाइट के साथ तारीफ करने की जगह मुँह इरीटेशन के
कारण खुला रह गया । हैल्थ प्रॉब्लम्स के चलते
हॉस्पिटलस् के आजू-बाजू जिन्दगी गुजारने के बाद भी पता नहीं क्यों वह डेंटिस्ट के पास जाने से डरती है शायद माँ याद
आ जाती है और उस याद के साथ ही उसकी सारी बहादुरी
भी उड़न छू हो जाती है । सो होम रेमीडिज़ ढूंढ़ी गई - क्लोव,
हींग, काली मिर्च और भी न जाने क्या-क्या.., हार कर
नये शहर में डेंटिस्ट ढूंढा गया । एक्सरे के बाद राय मिली
इसका 'रूट ट्रीटमेंट' सही रहेगा , कैविटी नसों तक पहुँच गई । डेंटिस्ट के यहां फ्लॉसिंग के बाद दर्द ठीक हो गया तो खुद की समझदारी ने सिर उठा लिया - 'फ्लॉसिंग किट ढूंढी गई
दिन में दो बार ब्रश करते तो हैं ..,अब फ्लॉसिंग भी किया
करेंगे । अब अपने आप को इतना समझदार समझने में बुराई
भी क्या है ?
पाँच साल बाद…, वही डॉक्टर.., वही बैंगलुरू का इंदिरा नगर
और वही वह …, बुखार और दर्द साथ लिए ।
ऑन लाइन वीडियो कान्फ्रेंसिंग से बात बनती न देख फाइनली क्लीनिक की शरण लेनी पड़ी । तीन-चार घंटे में कभी ये डॉक्टर कभी वो डॉक्टर..ढेर सारे टेस्ट और चार-पाँच सीटिंगस्
का फैसला ।
पुरानी जगह को देख पुराना डर उसके सामने मुँह खोले खड़ा था जिस से डर कर उसने वैसे ही आँखें बंद कर रखी थी जैसे कबूतर बिल्ली को देख कर कर लेता है ।
***
Thursday, September 23, 2021
"अन्तराल"
【चित्र:-गूगल से साभार】
"कोई ढंग की थैली नहीं है तुम्हारे पास ? सामान ढंग से
नहीं डाल सकते ।" तेज और कठोर आवाज में स्नेहा ने तमतमाते हुए सामान पैक करते दुकान वाले को कहा ।
आस-पास आते जाते लोग और दुकानदार को देख कर
ऋतु को बड़ा अजीब लगा उसने धीरे से स्नेहा का हाथ दबाते हुए कहा - "शांत बालिके ! क्यों गुस्सा कर रही हो ? देखो
जरा माँ की तरफ कैसे मुँह उतर गया है उनका ।" स्नेहा के साथ वह भी उन्हें चाची की जगह माँ ही कहने लगी थी ।
उसने उचटती सी दृष्टि ऑटो में बैठी माँ पर डाली और पुनः लिस्ट के सामान की खरीददारी में उलझ गई और ऋतु
उलझ गई पाँच बरस पूर्व के वक्त में…., जब स्नेहा का
स्वभाव बहुत मृदुल हुआ करता था ।
"दीदी ! यह साड़ी कैसी लगी ?"- गुलाबी रंग
की खूबसूरत सी साड़ी को उसके सामने फहराते हुए स्नेहा
का चेहरा दमक रहा था ।
"बहुत खूबसूरत.., ब्लाउज़ पीस तो एकदम यूनिक है ।"- ऋतु ने उसकी खुशी में शामिल होते हुए कहा ।
"फिर ठीक है आज ही उद्घाटन करते हैं ।" -साड़ी समेटती हुई वह बगल वाले घर में घुस गई ।
"कैसी लग रही हूँ मैं ?"- खनकती मिठास भरी आवाज़ में लम्बा सा सुर खींचती हुई अप्सरा सी स्नेहा शाम को खड़ी मुस्कुरा रही थी ऋतु के आगे । और वह ठगी सी देखती रह गयी उसको।
"न तीज न त्यौहार…,इसको तो बस सजने संवरने
के बहाने चाहिए होते हैं और एक तुम.., बहुत सुन्दर, बहुत सुन्दर कह चने के झाड़ पर चढ़ा देती हो इसे ।" - छत से
कपड़े उतारती उसकी माँ ने आंगन में झांकते हुए कहा।
"कहाँ खो गई दीदी अब चलो भी !" उसकी तन्द्रा
भंग करते हुए स्नेहा ने कुछ पैकेट ऋतु को भी पकड़ा दिये । ऑटो में बैठते हुए माँ की दुख में डूबी आवाज़ कानों में
पड़ी - "लड़की कैसी नीम सी खारी हो गई है तू !" स्नेहा की थोड़ी देर पहले की तल्ख़ी याद करते हुए ऋतु ने माँ को समझाते हुए कहा -"नीम भी बुरा नहीं होता माँ.., आजकल
तो उसकी गुणवत्ता सभी मानते हैं ।"
ऑटो चल पड़ा स्नेहा माँ को जवाब दिये बिना निर्लिप्त भाव से सामान की लिस्ट पर पैसों का हिसाब लगाने में लग गई
और माँ न जाने किस सोच में डूबी हुई ऑटो से बाहर देख
रही थी। ऋतु उस खामोशी में स्नेहा के मृदुलता से खारेपन
के सफर का अन्तराल नापने का प्रयास कर रही थी।
Monday, August 23, 2021
"कटु यथार्थ"
"यहाँ पर तो एक फैमिली रहती थी पहले अभी तो बड़ी
सुनसान लग रही है यह हवेली ।"
बहुत समय के बाद बाहर से लौटे अंशुमन ने अपने दोस्त समीर
से चाय पीते हुए पूछा । वैसे उसे याद तो 'एक फैमिली' की
इकलौती लड़की का नाम भी था और उसके पिता का नाम
भी मगर दोस्त और उसकी पत्नी के आगे बोलना नहीं
चाहता था ।
"पता नही क्या झगड़ा था आपस में परिवार का…,एक दिन
सुबह -सुबह चीख-चिल्लाहट की आवाज़ें आईं । हम लोगों ने
छत से देखा तो चार-पाँच आदमी सामान बाहर फेंकते दिखे
उसके बाद से यह हवेली बंद ही पड़ी है ।" अपने बच्चे को पत्नी
की गोद में देते हुए समीर ने जवाब दिया।
"ऐसे-कैसे कोई किसी के साथ कर सकता है ?
तुमने खामोशी कैसे ओढ़ ली ?" घटनाक्रम जान कर अंशुमन
आवेश में आ गया ।सफाई देते हुए बड़ी गंभीरता से समीर
बोला- "देख सीधी सी बात है हम तो नये आए लोग हैं यहाँ..,,
पूरे मोहल्ले में सब घर बंद थे पता तो सभी को था मगर एक
भी बंदा बाहर नहीं निकला । बाद में सभी ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि आपस में भाई-भाई का झगड़ा था । पता
नहीं कल को वे एक हो जाएँ ,हमें क्यों टांग अड़ानी किसी के
फटे में ।"
हाथ की चाय का आखिरी घूंट अंशुमन को कड़वा
लगा कटु यथार्थ जैसा ।
***
Saturday, August 7, 2021
"टेढ़ी मुस्कुराहट"
सगाई समारोह की गहमागहमी में सांवली सलोनी
पीहू खुश थी अपनी मनपसन्द ड्रेस के साथ ।
आज की स्कूल से छुट्टी का वह पूरा फायदा उठाएगी अपनी पसन्दीदा आइसक्रीम खा कर । फिर से भूख लगेगी तो वही स्ट्राबेरी फ्लेवर वाली आइसक्रीम ही खाएगी मैन्यू देख कर उसने फैसला कर लिया था ।
"सुनो !" - अचानक अपने पीछे से आवाज सुन पीहू ने पलट कर देखा ।
-" वो अंकल जो सामने खड़े हैं उन्हें बोलो मैं बुला रहा हूँ उनको .., देखो धीरे से कहना कोई सुने नहीं ।"
"आपके हाथ में मोबाईल है ..आप बात क्यों नहीं कर लेते ।"
हाजिर जवाब पीहू का मूड नहीं था संदेश वाहक बनने का।
कुछ देर इधर-उधर अपनी हमउम्र रिश्तेदार लड़कियों के साथ घूम कर वह अपनी फेवरिट आइसक्रीम के साथ इतेफ़ाक से उसी जगह आ खड़ी हुई जहाँ वह परेशान लड़का उन्हीं अंकल के साथ सरगोशी भरी बहस में उलझ रहा था - 'आपने कहा था लड़की बहुत सुन्दर है बस रंग थोड़ा सा दबा है जोड़ी अच्छी लगेगी तुम दोनों की लेकिन यहाँ तो दिन-रात का अन्तर दिख रहा है..आप भी बस पापा ! मैं नहीं पहननाने वाला उसे अंगूठी ।'
- "चुप कर.., बहुत दे रहे हैं वे । तुम दोनों को भी तो भेज रहे है यू.एस.ए. … और क्या चाहिए ।" उनकी बहस सुन कर पीहू हट गई वहाँ से... 'बड़ों की बात नहीं सुननी चाहिए ।' यही सोच कर
लेकिन मन परेशान हो गया सौम्या दीदी के लिए ...अगर कुछ गड़बड़ हो गई तो ? सोचते हुए उसने आइसक्रीम वही रख दी मेज पर ।
थोड़ी देर बाद बाद रिंग सेरेमनी आरम्भ हो गई ।
मंत्रोच्चार के बीच सौम्या दीदी और वही परेशान लड़का मुस्कुराते हुए एक दूसरे को अंगूठी पहना रहे थे।मेहमान और मेज़बान उत्साहित हो कर जोड़ी को सराह रहे थे-- लवली कपल.., मेड फॉर इच अदर…, लाखों में एक...,और बधाई लेने और देने का सिलसिला जारी हो गया ।
पीहू भी एक टेढ़ी मुस्कुराहट के साथ स्ट्राबेरी फ्लेवर की आइसक्रीम के स्टॉल की तरफ बढ़ गई ।
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Tuesday, July 27, 2021
"खुशी"
अपना वजूद भी इस दुनिया का एक हिस्सा है उस पल को
महसूस करने की खुशी , आसमान को आंचल से बाँध
लेने का हौंसला , आँखों में झिलमिल -झिलमिलाते सपने
और आकंठ हर्ष आपूरित आवाज़ - “ मुझे नौकरी मिल गई है , कल join करना है वैसे कुछ दिनों में exam भी हैं…,
पर मैं सब संभाल लूंगी।” कहते- कहते उसकी आवाज
शून्य में खो सी गई ।
मुझे खामोश देख वो फिर चहकी - “ मुझे पता है
आप अक्सर मुझे लेकर चिन्तित होती हो , मैंने सोचा सब
से पहले आप से खुशी बाँटू। “
उसकी बात सुनते हुए मैं सोच रही थी अधूरी पढ़ाई ,
गोद में बच्चा ,घर की जिम्मेदारी और ढेर सारे सामाजिक
दायित्व । ये भी नारी का एक रुप है कभी बेटी , कभी पत्नी
तो कभी जननी । हर रूप में अनथक परिश्रम करती है और
अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए अवसर की तलाश
में रहती है ।अवसर मिलते ही पल्लवित होती है अपनी पूर्ण सम्पूर्णता के साथ।
उसके दमकते चेहरे और बुलन्द हौंसलों को
देखकर मुझे बेहद खुशी हुई और यकीन हो गया कि एक
दिन फिर वह निश्चित रूप सेे इस से भी बड़ी खुशी मुझसे
बाँट कर मुझे चौंका देगी ।
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Sunday, July 4, 2021
"महिला दिवस"
चार-पाँच औरतें खिलखिलाती हुई होटल में लंच हॉल में घुसी और कोने में व्यवस्थित सीटिंग व्यवस्था पर जा बैठी । शायद "रिजर्व" की तख्ती पर ध्यान देने की फुर्सत नहीं थी किसी के पास । सभी अपने अपने लुक्स पर फिदा थी और एक -दूसरे से ज्यादा सलीकेदार जताने की कोशिश में लगी थी तभी एक वेटर ने टेबल के पास आ कर अदब से सिर झुकाते हुए विनम्रता से कहा-"यह टेबल रिजर्व है मैम ,मैं आप लोगों के लिए दूसरी तरफ व्यवस्था कर देता हूँ ।"
"दूसरी तरफ क्यों ? जो नहीं आए उनके लिए भी तो व्यवस्था कर सकते हो ।" एक महिला ने रौब के साथ वेटर को लगभग झिड़कते हुए कहा ।
स्थिति की गंभीरता देख कर मैनेजर उनको दूसरी तरफ बैठाने की व्यवस्था का निर्देश देकर आगे बढ़ा
ही था कि तीन लड़के और दो लड़कियों का समूह कंधों पर बैग लटकाए बिखरे बालों और अस्त-व्यस्त कपड़ों और लस्त-पस्त हालत में अपनी रिजर्व टेबल की ओर आगे बढ़ा । बैठने से पूर्व उनके चेहरों पर परेशानी और व्यग्रता साफ दिखाई दे रही थी ।
सीटों की अदला-बदली में कुछ पल की भिनभिनाहट जरूर हुई पर अन्तत: सब तरफ शांति थी और हल्के संगीत के साथ माहौल खुशनुमा । उधर महिलाएं दूसरी टेबल पर बैठ कर अपने
बिगड़े हुए मूड को ठीक करने के प्रयास में लगी थीं । ड्रेसस् और मेकअप के बारे में एकबारगी भूल अब उनके चर्चा का विषय टेबल पर बैठे युवक-युवतियों का समूह था ।
"घर में यह 'शो' करेंगे बेचारों को समय ही नहीं मिलता । यहाँ क्या गुलछर्रे उड़ रहे हैं । हम तो ऐसा सोच भी नहीं सकते थे ।" - किसी ने गहरी सांस भरते हुए कहा ।
"सच कहा तुमने आजादी तो इन्हीं के पास है । हमने तो घर-गृहस्थी की चक्की में झोंक दिया खुद
को ।"- दूसरी ने मानो बात पूरी की ।
"यार सेलिब्रेट करने आए हैं छोड़ो ये सब मूड मत ऑफ करो ।" उन्हीं में से एक ने विषय बदलने की कोशिश की ।
पहली टेबल पर किसी प्रोजेक्ट की सक्सेस में आने वाली टेक्निकल प्रॉब्लम्स पर चर्चा के साथ स्टार्टरस की प्लेटें भी साफ हो रही थी शायद भूख अपने चरम पर थी । तभी उनमें से एक लड़की ने माथे पर हाथ मारा - ओ शिट् .., मैं तो भूल गई थी । आधे घंटे में मेरी "वन ऑन वन" है । मैं जाती हूँ ,
तुम लोग लंच इंजॉय करो…,
"ठहर मैं भी चलती हूँ ।" दूसरी ने फ्रेंच फ्राईज़ मुँह में लगभग ठूंसते हुए बैग उठाया ।
"यार इन लोगों का तो हो गया "महिला दिवस"
बस ..,ट्रफिक ना मिले और ये पहुंच जाए टाईम
से ।" - एक लड़के ने चिंता जताई । बाकी दो की आँखों में भी वहीं थी ।
चीयर्स !!! हैप्पी वीमन्स डे !!
दूसरी टेबिल से ठहाका गूंजा । शायद वहाँ खाने से पूर्व ड्रिंक्स आ गईं थीं ।
पहली टेबिल पर खामोशी पसरी थी ।
***