Copyright

Copyright © 2026 "आहान"(https://aahan29.blogspot.com) .All rights reserved.

Sunday, January 24, 2021

"गणतंत्र दिवस"

 स्कूल से घर आते बच्चों के  हर्षोल्लास में डूबे 

स्वर-"आज से ग्राउण्ड में जाना है “26 जनवरी" की तैयारी

के लिए"‎...उनका यह उद्घोष घर के बाकी सदस्यों को भी

जोश और उमंग भरे उनके

 स्कूली दिनों  की  याद दिला दिया करता था ।  बच्चों के

साथ वे भी अपने बालमन की स्मृतियों में डूब जाते ।

और फिर आता वह चिरप्रतीक्षित दिन - "26 जनवरी"

मुँह अंधेरे अपनी अपनी स्कूलों की तरफ लकदक करती

यूनिफॉर्म पहने भागते बच्चे उनके साथ पूरी सज-धज

के साथ अध्यापक-अध्यापिका वृन्द , रंग-बिरंगे परिधानों

से सजे लोगों की भीड़ भोर से पहले

ही गलियों को गुलज़ार कर देती । सभी का एक ही

लक्ष्य -  समय रहते उस बड़े से ग्राउण्ड में एकत्रित होना जहाँ गणतन्त्र दिवस के आयोजन को सम्पन्न‎ होना है।

  लाउडस्पीकरों पर बजते पुरानी फिल्मों के देशभक्ति गीत --

 (1)  मेरे देश की धरती………,

(2) अब कोई गुलशन न उजड़े अब वतन 

आज़ाद है …………,

(3)   ए मेरे वतन के लोगों‎…………., 

            ओस भरी सर्दियों में जोश और ओज बढ़ा कर रक्त‎

संचार‎ तीव्र कर देते थे । एक ही ग्राउण्ड पर पहले एक छात्रा

और फिर एक माँ के रूप में जिसका बच्चा भी उसी जगह

छात्र के रूप में सहभागी बने तो मेरे जैसी मांओं के गर्व का

भाव द्विगुणित हो जाना तो बनता ही था। बैण्ड की मधुर

स्वर लहरियों पर ध्वजारोहण पर बजता राष्ट्रगान,

परेड करते एन.सी.सी.कैडेट्स ..,स्कूली बच्चे..और विभिन्न

रंगारंग कार्य‎क्रम जिनकी प्रतीक्षा सबको साल भर रहती ..

उत्सव के समापन के साथ मंत्रमुग्ध

करती छवियां आँखों‎ में भरे भीड़ मानो अगले वर्ष की सर्दियों

तक उन्हीं पलों के लिए प्रतीक्षा‎रत रहती । 

                  बदलते समय के साथ जाने क्यों शिक्षा के

उर्ध्वमुखी समाज में जीते हम लोग कई बार स्वतन्त्रता‎ दिवस

और गणतन्त्र दिवस में भेद करना भूल‎ जाते हैं‎ । बीस वर्ष पूर्व

  क्या‎ बच्चे और क्या बड़े ? साक्षर हो या निरक्षर हर व्यक्ति‎ को जुबानी याद था--

स्वतन्त्रता दिवस --"देश को आजादी मिली थी 

इस दिन, अंग्रेज भारत छोड़ कर अपने देश चले गये थे ।”

गणतन्त्र दिवस --"ये भी नही पता..,इस दिन हमारे देश का संविधान लागू हुआ था ।”

और  संविधान ?

संविधान--"लिखित और अलिखित परम्परा‎ओं और कानूनों

का वह संकलन, जिससे किसी भी देश का राज-काज

(शासन) चलता हो ।”

                         हम सब इस बार हमारा 72 वां गणतन्त्र

दिवस मना रहे हैं बड़े हर्ष और गर्व का विषय है यह हमारे

लिए‎  मगर  एक सवाल‎ उठता है मन में कि क्या अब भी

पुराने लोगों की तरह जोश और जुनून के साथ हमारे

नौनिहालों में हमारे राष्ट्रीय पर्वो के लिए‎ उत्सुकता का भाव है ? अगर नही में उत्तर मिलता है तो कारण खोजने के साथ समस्या

का समाधान‎ खोजने का उत्तरदायित्व भी हम सबका है । 

--

आप सबको गणतन्त्र दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभ‎कामनाएँ 🙏🌹🙏

जय हिन्द !!!  जय भारत !!!


【चित्र-गूगल से साभार】


Sunday, January 17, 2021

"बुकमार्क सा ख़्वाब"

                       

(This photo has been taken from Google)


 अनवरत भाग-दौड़  भरी दिनचर्या में कभी खुद के पैरों पर खड़े होने

की जद्दोजहद तो कभी सब की अंगुली थाम कारवाँ के साथ चलने 

की मशक्कत में जीवन बीता जा रहा रहा था गाड़िया लुहारों जैसा.. 

आज यहाँ-कल वहाँ ।  मेरे साथ मेरे  हम कदम बन भागते दौड़ते 

तुम ….., कब  मरूभूमि में Oasis की पहचान करना खुद सीख गए 

और कब उनकी उपयोगिता मुझे सीखाते चले गए भान ही नही हुआ । 

  मैंने कभी फुर्सत के पलों में किसी उपन्यास में खुद को

डुबोये एक ख्वाब देखा था इन्द्रधनुषी तितली सा ...जो कल्पित 

होते हुए भी मेरी आँखों में जीवन्त था अपनी पूरी सम्पूर्णता के साथ 

 उस ख्वाब को मैं भूल भी गई थी किसी उपन्यास के बीच दबाये  बुकमार्क की तरह । वहीं ख़्वाब कभी बातों बातों में तुमसे  साझा 

करके भी भूल गई थी ।

   आज वही पुराना उपन्यास और उसमें बुकमार्क सा दबा मेरा ख़्वाब तुमने मेरी खुली हथेली पर रख दिया है…और वह इन्द्रधनुषी 

तितली सा पंख फैलाये मेरी आँखों के सामने साकार है अपनी पूरी जीवन्तता के साथ । थैंक्यू…... !!!  

तुम्हारे नेह की मैं ऋणी रहूँगी युगों… युगों तक ।


***

Thursday, January 7, 2021

'सत्य"

 "सभी लड़कियाँ ध्यान दें ..घर से सीधे स्कूल आए और

सीधे घर जाए । आपस में रंग खेलते या छुट्टी के बाद कहीं

भी मैंने स्कूल की किसी लड़की को देखा तो मुझसे बुरा

कोई नहीं होगा ।

 किसी भी लड़की के पास अगर रंग है तो आज ही 

अपनी क्लास टीचर को या फिर मुझे जमा करा दें ।" 

स्कूल की प्रधानाचार्या ने सख़्ती से प्रेयर-हॉल में छात्राओं

को संबोधित करते हुए कहा ।

पूरे हॉल में ऐसी शांति छाई थी कि कहीं पिन भी गिरे तो

आवाज़ सुनाई दे ।

 "होली के दिनों में हर साल लड़कियों को रोज़ाना यही

भाषण कड़वी दवाई की तरह पिलाया जाता है ।"

अध्यापिकाओं ने प्रेयर- हॉल छोड़ते हुए धीमे से वार्तालाप

जारी रख वातावरण को हल्का करने की कोशिश की ।

नई-नई अध्यापिका पद पर नियुक्त आंकाक्षा को

अनुशासन के नाम पर इतना सख़्त संबोधन पसन्द नहीं

आया। वह खामोशी से धीरे-धीरे स्कूली व्यवस्था समझने

की कोशिश कर रही थी । 

स्टाफ-रूम में सब के बीच से होती हुई वह रजिस्टर

उठा कर अपना पहला पीरियड लेने कक्षा कक्ष की

सीढ़ियों की ओर बढ़ी तो सामने जो दृश्य देखा वह कम से

कम उसके लिए तो अप्रत्याशित ही था- "सामने दो

लड़कियां प्रधानाचार्या की कोप भाजन का शिकार बनी

खड़ी थीं हाथों में गुलाल की पुड़िया थामे ।"

            कुछ सोचते हुए वह कक्षा में पहुँची तो गुड मॉर्निंग

के कोरम और उपस्थिति रजिस्टर की खाना-पूर्ति के बाद

उसने बोर्ड पर जैसे ही गाँधी जी के राजनीतिक प्रयोग की

चर्चा के लिए  टॉपिक लिखना शुरू किया वैसे ही कक्षा-कक्ष

में एक शरारती आवाज़ ने सरगोशी की - "आज सत्य पिट

रहा है सीढ़ियों के पास।"

आवाज़ वह पहचान गई थी मगर बिना पलटे 

बोर्ड पर लिखते हुए गंभीरता से कहा -

"कोई बात नहीं.., सत्य अमर है क्षणिक नहीं । आवेश में

विवेक सो जाता है कभी-कभी । जब जागेगा तब

जीत सत्य की ही होगी ।" 


***


Monday, December 28, 2020

"गिफ्ट"

 'इस बार जन्म दिन पर पूर्वी ने डॉगी ,फिश या पैरेट में से कुछ मांगा है गिफ्ट में ।" सुहानी ने चाय पीते-पीते राजीव से कहा ।

"ला देना..वह सुमित की तरह जिद्दी और झगड़ालू तो है नहीं.. तुम्हारा लाडला तो वैसे भी खेलता कम और झगड़ता अधिक है उसके साथ ।"

    राजीव ने लैपटॉप की स्क्रीन पर नज़र गड़ाए व्यस्त भाव से कहा ।

 बहुत देखभाल के बाद पूर्वी के लिए सुहानी ने एक तोता पसन्द किया और जन्म दिन पर 

 उसका गिफ्ट उसके सामने रख दिया । साथ ही सुमित को सख़्त हिदायत दी कि वह अपनी शरारतों से बाज आए और बहन और उसके तोते से छेड.-छाड़ न करे ।

        तोते का लोक प्रचलित नाम मिट्ठू रखा गया ।  

मिटठू के आने के बाद पूर्वी भाई की उपस्थिति भूल अपनी ही दुनिया में रम गई । मिटठू को मिर्च खिला कर..कभी हैल्लो.. तो कभी राम-राम बोलना सीखा कर वह बहुत खुश थी.., पढ़ाई के बाद सारा दिन पिंजरे में बंद तोते के आस-पास ही मंडराती रहती । घर में शांति और भाई-बहन के युद्ध-विराम से पति-पत्नी खुश थे ।

कुछ दिन बाद सुहानी ने महसूस किया कि मिट्ठू की मीठी बोली में कर्कशता घुल गई है । सारा दिन की उसकी टें...टें से वह परेशान हो उठी । 

"आज इस मिट्ठू की खबर लेती हूँ" मिट्ठू की चुभती आवाज से त्रस्त हो वह आवेग से उठी और आंगन में आ कर जो दृश्य देखा तो आँखें हैरत से फैल गई -- पिंजरे के पास बैठी पूर्वी बड़े आराम से मिट्ठू के पंखों में पेन की नोंक चुभा रही थी और मिटठू बैचेनी से चीख-चिल्ला रहा था ।

उसने एक चाँटा बेटी के गाल पर रसीद किया और छत पर ले जाकर पिंजरे का द्वार खोल दिया । पूर्वी का रोना सुन उसे गोद में उठा कर राजीव ने छत की सीढ़ियाँ उतरती सुहानी को कड़े स्वर में डॉटा- "बच्ची की खुशी नहीं सुहाई..क्या हुआ.. जो मिट्ठू आजकल टें..टें..कर रहा था । किस बात की सजा दे रही हो बच्ची को..इस तरह का रवैया अपने लाडले के साथ रखती तो कब का सुधर गया होता।"

"हाँ..गलती हो गई मुझसे इन दोनों को समझने में..भूल मैंने की है तो सुधारूंगी भी मैं ही ।" सोच में डूबी खाली पिंजरा डस्टबिन के पास रखती सुहानी ने जवाब दिया ।

***





Sunday, December 13, 2020

"व्यवहारिकता"

अक्सर महत्वपूर्ण दस्तावेज या कोई प्रतियोगी परीक्षा का फॉर्म भरते हैं तो एक प्रश्न होता है -- “कोई शारीरिक‎ पहचान”‎ और हम ढूंढना शुरू कर देते हैं‎ माथे पर ,हाथों पर या घुटनों पर लगे चोट के निशान जो प्राय: सभी के मिल ही जाते हैं  । मैं भी ऐसी बातों से अलग नही हूँ बल्कि “बिना देखे चलती है ।” की उपाधि आज भी साथ लेकर ही चलती हूँ । जाहिर सी बात है चोटों के निशान भी ज्यादा ही लिए घूमती हूँ ऐसे में एक घटना अक्सर मेरी आँखों के सामने अतीत से निकल वर्तमान‎ में आ खड़ी होती है जो कभी हँसने को तो कभी इन्सान की सोच पर सोचने को मजबूर कर देती है।

                                           एक बार  किसी जरुरी काम से मैं घर से निकली.. सोचा बेटे के स्कूल से आने से पहले  काम पूरा करके घर आ जाऊँगी। आसमान में बादल थे मगर इतने घने भी नही कि सोचने पर मजबूर करें कि घर से निकलना चाहिए कि नही। मगर वह महिना सावन का ठहरा घर वापसी के दौरान रास्ते में ही झमाझम बारिश

 शुरू गई । सदा अच्छी लगने वाली बारिश उस दिन आनंददायक की जगह कष्टदायक लग रही थी । मुझे घर पहुँचने की जल्दी थी कि बेटा स्कूल से निकल गया तो पक्का भीग रहा होगा और इसी सोच में कदम रूके नही बल्कि तेजी में भागने

 की स्थिति में पहुँच गए  थोड़ी सी दूरी पर घर है पहुँच ही जाऊँगी इसी सोच के साथ । घर से थोड़ी  दूरी पर एक चौराहा था जहाँ ढलान भी था और बीच से क्रॉस करती  नाली भी। वहाँ बारिश

 के पानी का बहाव ज्यादा ही था। मैंने देखा वहाँ एक कोने में हाथों में थैले लिए तीन औरतें भीगती खड़ी हैं। मैं चलते हुए सोच  रही थी --’भीग तो गई अब क्यों खड़ी हैं‎ बेवकूफ कहीं की ।’ मेरी सोच को तेज झटका लगा - धड़ाम.. एक आवाज़ ..

और इसी आवाज के साथ मैं चारों खाने चित्त.. नाली में मेरा पैर अटक गया था ।

 मैं संभलकर खड़ी होने की कोशिश कर ही रही थी  

कि कानों में आवाज  गूंजी

--”ऐ …,जल्दी से आ जाओ! नाली यहाँ पर है।” 

और वे लगभग मेरे आसपास की जगह को फलांगती हुई आगे निकल गईं और अपने छीले हुए घुटने और हथेली के साथ लड़खड़ाती हुई‎  मैं अपने घर की ओर। बारिशों के दौर में सड़कों पर बहते पानी के वेग को देख कर अक्सर मैं उस घटना को  याद करती हूँ तो तय नही कर पाती उन औरतों के व्यवहार को मासूमियत का नाम दूँ या

 समझदारी का ।

---

Tuesday, December 1, 2020

"कुरजां" ।। हाइबन।।

 शीतकाल में साइबेरिया से राजस्थान  में प्रवासी पक्षी साइबेरियन सारस (डेमोइसेल क्रेन) भरतपुर के केवलादेव पक्षी विहार व अन्य अभयारण्यों में सर्दियों में प्रवास के लिए आते हैं । चुरू जिले के तालछापर अभयारण्य  को  प्रवासी पक्षी “कुरजां” की शरणस्थली कहा जाता है । राजस्थानी भाषा में साइबेरियन सारस को कुरजां कहा जाता है ।

                     मरूभूमि की महिलाएँ  कुरजां के साथ सहेली

 जैसा रिश्ता मानती हैं ।यहाँ के लोक गीतों में विरहिणी स्त्री और कुरजां के बीच आपसी संवाद का रूप गीत में ढल कर भावनाओं का निरूपण होता है जिसमें कुरजां पक्षी संदेश वाहक के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन करती है । "कुरजां गीत" अपने वियोग पक्ष के श्रृंगार भावों के साथ राजस्थान के लोक जीवन में रचा बसा हैं ।

          थार रेगिस्तान के जलवायु की खास विशेषता है कि यहाँ सदियों से देसी परिन्दों के अलावा अनेक प्रजातियों के 

प्रवासी पक्षियों का आवागमन बना ही रहता है जो यहाँ 

की जैव विविधता को बनाए रखने में अहम् भूमिका निभाते हैं। लेकिन प्रवासी पक्षियों की प्रजाति में साइबेरियन सारस पर्यटकों के लिए आकर्षण केन्द्र होने के साथ साथ यहाँ के जन मानस का भी अभिन्न अंग है ।सर्दियों में झीलों और तालाबों के

किनारे इन्हें देख कर बरबस ही मुँह से निकल पड़ता है -


झील किनारे ~

तपस में कुरजां

पँख सेकती ।


***

Monday, November 16, 2020

"यादें"【हाइबन】

【 चित्र गूगल से साभार】


कई बार कुछ लम्हें स्थायी रूप से बैठ जाते हैं

 मन के किसी कोने में । सोचती हूँ मन क्या है - हृदय...

जिसकी धड़कन ही जीवन है । बचपन में पढ़ा था कि हर

मनुष्य का हृदय उसकी बंद मुट्ठी जितना होता है । इस छोटे से

अंग में सागर सी गहराई और आसमान सी असीमता है यह

बात बड़े होने के बाद समझ आई ।   

असम का एक मझोला शहर बरपेटा रोड ..वहीं से मुँह

अंधेरे गाड़ी में बैठते सुना कि सुबह तक पहुंच जाएंगे गुवाहाटी ।  कार की खिड़की से नीम अंधेरे में भागते पेड़ों को देखते

देखते कब नींद आई पता ही नहीं चला । आँख खुली तो

लगा पुल से गुजर रहे हैं --

 "उगता सूरज... ब्रह्मपुत्र का सिंदूरी जल और नदी में

बहती छोटी-मझोली जाल लादे नावें और साथ

ही स्टीमर्स की घर्र-घर्र । "

इस अनूठे दृश्य को देख कर मैं मंत्रमुग्ध सी अपलक

अपने लिए निन्तात अजनबी से दृश्य को निहारने में इतनी

मगन हुई कि वह दृश्य  कस कर बाँध लाई अपनी

मन मंजूषा में । आज भी यदा-कदा बंद दृग  पटलों में

वह दृश्य जीवन्त हो उठता है और महसूस होता है कि

मैं वहीं तो हूँ ब्रह्मपुत्र के पुल पर.. और जैसे ही आँखें

खोलूंगी अगले ही पल वहीं दृश्य साकार हो उठेगा --

 

भोर लालिमा~

ब्रह्मपुत्र में जाल

फेंकते मांझी।

***